अपनापन का दीप
शाम ढल चुकी थी। हल्की ठंडक के साथ गली में पीली रोशनी फैल रही थी। ऑफिस से लौटते-लौटते रोहित को आज भी देर हो गई थी। जैसे ही उसने दरवाज़ा खोला, सामने खड़ी सीमा का चेहरा देखकर वह समझ गया—आज कुछ ठीक नहीं है।
सीमा आमतौर पर मुस्कुराकर उसका स्वागत करती थी, लेकिन आज उसका चेहरा उतरा हुआ था।
रोहित ने बैग रखते हुए धीरे से पूछा,
“क्या हुआ? तबीयत ठीक है या किसी से झगड़ा हुआ?”
सीमा ने गहरी सांस ली और बोली,
“आज दोपहर मम्मी जी का फोन आया था…”
“अच्छा! क्या कह रही थीं?” रोहित ने सहजता से पूछा।
“वो कल हमारे पास आ रही हैं… और इस बार कुछ दिनों के लिए नहीं… अब यहीं रहेंगी,” सीमा ने चिंता भरे स्वर में कहा।
रोहित मुस्कुरा दिया,
“अरे, इसमें परेशान होने वाली क्या बात है? घर ही तो है उनका।”
सीमा ने थोड़ी झुंझलाहट से कहा,
“तुम्हें आसान लगता है, लेकिन तुम जानते हो पिछली बार छोटी-सी बात पर कितनी नाराज़ हो गई थीं।”
रोहित थोड़ा गंभीर हो गया। उसने पास बैठते हुए कहा,
“सीमा, एक बात समझो… मम्मी अब अकेली हो गई हैं। पापा के जाने के बाद उनका सहारा हम ही हैं। उन्हें सिर्फ एक चीज़ चाहिए—अपनापन और सम्मान।”
सीमा चुपचाप सुनती रही।
रोहित ने आगे कहा,
“अगर तुम उन्हें यह महसूस करा दो कि इस घर में उनकी अहमियत है, तो सब ठीक हो जाएगा।”
“लेकिन कैसे?” सीमा ने पूछा।
रोहित मुस्कुराया,
“बहुत आसान है… बस थोड़ा दिल से करना होगा।”
अगले दिन सुबह सीमा बहुत जल्दी उठ गई। उसने पूरे घर की अच्छी तरह सफाई करवाई और मम्मी जी के कमरे को बड़े प्यार से सजाया। उनके पसंद की चादर बिछाई, अलमारी में उनके कपड़े करीने से रखे और रोज़मर्रा की ज़रूरी चीज़ें भी पास ही सजा दीं, ताकि उन्हें किसी चीज़ की कमी महसूस न हो।
समय पर दोनों एयरपोर्ट पहुंच गए। जैसे ही मम्मी जी बाहर आईं, रोहित उन्हें देखकर आगे बढ़ा और प्यार से गले लगा लिया। सीमा ने सिर पर पल्लू रखकर आदर से उनके चरण स्पर्श किए।
मम्मी जी की आंखों में खुशी की चमक आ गई। उन्होंने स्नेह से सीमा के सिर पर हाथ रखते हुए कहा,
“खुश रहो बहू…”
घर पहुंचते ही छोटा आरव दौड़ता हुआ आया और दादी के गले से लिपट गया। मम्मी जी ने भी उसे प्यार से सीने से लगा लिया।
उस पल घर का माहौल अपने आप हल्का और खुशहाल हो गया।
सीमा अब हर छोटे-बड़े काम में मम्मी जी से सलाह लेने लगी थी।
“मम्मी जी, आज क्या बनाऊँ?”
“मम्मी जी, ये ठीक रहेगा या ऐसे करूँ?”
उसके इस बदले व्यवहार ने धीरे-धीरे मम्मी जी के दिल को छू लिया। अब उन्हें महसूस होने लगा था कि इस घर में उनकी मौजूदगी की सच में जरूरत है।
एक दिन सीमा मुस्कुराते हुए बोली,
“मम्मी जी, मुझे आपके हाथ के आलू के पराठे बनाना सीखना है।”
मम्मी जी के चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान आ गई।
“अच्छा… तो आज मैं बनाती हूँ, तुम ध्यान से देखना,” उन्होंने प्यार से कहा।
रसोई में उस दिन दोनों साथ खड़ी थीं।
सीमा ध्यान से हर चीज़ सीख रही थी और मम्मी जी उसे अपने अनुभव से छोटी-छोटी बातें समझा रही थीं।
उस पल में सिर्फ पराठे नहीं बन रहे थे…
बल्कि उनके रिश्ते की दूरियाँ भी धीरे-धीरे पिघल रही थीं।
कुछ ही दिनों में घर का माहौल पूरी तरह बदल गया।
अब मम्मी जी खुद ही कई काम संभालने लगी थीं—
आरव को समय पर खाना खिलाना, उसकी देखभाल करना और कभी-कभी रसोई में भी हाथ बंटा देना।
सीमा को भी अब थोड़ा सुकून मिलने लगा था। पहले जहां वह दिनभर काम में थकी रहती थी, अब उसके पास अपने लिए और परिवार के साथ समय बिताने का मौका था।
एक दिन रोहित ने हंसते हुए मज़ाक किया,
“लगता है अब मेरी जगह तुम दोनों की दोस्ती हो गई है।”
उसकी बात सुनकर सीमा और मम्मी जी एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा दीं, और फिर तीनों की हंसी से पूरा घर गूंज उठा।
एक शाम रोहित ऑफिस से लौटते वक्त फिल्म के टिकट लेकर आया। उसने मुस्कुराते हुए सीमा से कहा,
“चलो, आज फिल्म देखने चलते हैं।”
सीमा ने बिना देर किए जवाब दिया,
“मम्मी जी भी चलेंगी तो ही मैं जाऊंगी।”
मम्मी जी ने तुरंत बीच में ही प्यार से कहा,
“अरे नहीं बहू, तुम दोनों जाओ… मैं आरव को संभाल लूंगी।”
सीमा हल्के से मुस्कुरा दी। वह समझ गई थी कि मम्मी जी दिल से चाहती हैं कि दोनों कुछ समय साथ बिताएं।
दीवाली का शुभ समय आ गया था।
घर में चारों ओर रौनक छाई हुई थी—कहीं सफाई चल रही थी, तो कहीं रसोई से बनते पकवानों की खुशबू पूरे घर को महका रही थी। इस बार की दीवाली सच में कुछ खास महसूस हो रही थी, जैसे घर का हर कोना खुशियों से जगमगा उठा हो।
शाम को दीयों की तैयारी के बीच मम्मी जी धीरे-धीरे अपने कमरे में गईं। उन्होंने अलमारी खोली और उसमें से एक पुराना, संभालकर रखा हुआ डिब्बा निकाला। उस डिब्बे में जैसे वर्षों की यादें सजी हुई थीं।
वह डिब्बा लेकर वे सीमा के पास आईं और प्यार से उसे थमाते हुए बोलीं,
“बहू… ये हमारे खानदान का हार है। अब से ये तुम्हारा है… आज दीवाली पर इसे पहनना।”
सीमा एक पल के लिए चुप रह गई। उसकी आंखें भावनाओं से भर आईं। उसने कांपते हाथों से डिब्बा खोला—अंदर रखा वह सुंदर हार सिर्फ गहना नहीं, बल्कि विश्वास और अपनापन का प्रतीक था।
सीमा ने धीरे से हार को अपने माथे से लगाया, फिर झुककर मम्मी जी के पैर छुए।
मम्मी जी ने उसके सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया, और उस पल दोनों के बीच का रिश्ता सिर्फ सास-बहू का नहीं रहा… वह मां-बेटी के स्नेह में बदल चुका था।
दीवाली की रात सब मिलकर दीप जला रहे थे। तभी अचानक दरवाज़े पर गाड़ी रुकने की आवाज आई।
रोहित मुस्कुराया… उसे पता था कौन आया है।
दरवाज़ा खुला—बड़े भैया और भाभी सामने खड़े थे।
भाभी ने आते ही मम्मी जी के पैर छुए,
“माफ कर दीजिए मम्मी…”
मम्मी जी की आंखें भर आईं। उन्होंने दोनों को गले लगा लिया।
उस रात घर में केवल दीपक ही नहीं जले थे,
बल्कि रिश्तों के दिल भी रोशनी से जगमगा उठे थे।
रोहित ने आसमान की ओर देखते हुए मन ही मन सोचा—
“सच में, रिश्तों को निभाने के लिए बड़े-बड़े काम करने की जरूरत नहीं होती…
बस थोड़ा सा सम्मान और सच्चा अपनापन ही उन्हें मजबूत बना देता है।”
सीख:
रिश्तों में प्यार अपने आप नहीं आता, उसे समझ, सम्मान और थोड़ी सी समझदारी से बनाया जाता है।
जहां बुजुर्गों को सम्मान मिलता है, वहां घर अपने आप स्वर्ग बन जाता है।

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