माँ का सहारा
बरसात के बाद की ठंडी सुबह थी। आँगन में भीगी मिट्टी की खुशबू फैली हुई थी। पूजा अपने कमरे में चुपचाप बैठी थी, हाथ में अपने पापा की पुरानी घड़ी लिए हुए।
उसकी आँखों में आँसू थे।
“पापा होते तो सब कितना आसान होता…” उसने धीरे से खुद से कहा।
तभी उसकी माँ, सुशीला जी, कमरे में आईं और उसके पास बैठ गईं।
“क्या हुआ बेटा? आज फिर उनकी याद आ रही है?” माँ ने प्यार से पूछा।
पूजा ने सिर झुका लिया।
“माँ… आरव का मुंडन संस्कार अगले हफ्ते है… सब तैयारियाँ करनी हैं… लेकिन समझ नहीं आ रहा कहाँ से शुरू करूँ। पापा होते तो सब खुद संभाल लेते…”
सुशीला जी ने उसका हाथ पकड़ा और बोलीं,
“बेटा, पापा नहीं हैं… पर उनका भरोसा तो है ना। और मैं हूँ तुम्हारे साथ।”
पूजा का पति, अमित, काम के सिलसिले में दूसरे शहर गया हुआ था। ऐसे में घर की सारी जिम्मेदारियाँ अकेले पूजा के कंधों पर आ गई थीं।
वह अंदर ही अंदर घबरा रही थी—
मेहमानों का इंतज़ाम
पूजा की तैयारियाँ
बच्चों का ध्यान
सब कुछ एक साथ संभालना उसके लिए मुश्किल होता जा रहा था।
आखिरकार उसने अपनी माँ से कहा—
“माँ, अगर आप आ जातीं, तो मुझे बहुत सहारा मिल जाता…”
सुशीला जी कुछ पल के लिए चुप रहीं, फिर धीमे स्वर में बोलीं—
“बेटा, मैं आना तो चाहती हूँ… लेकिन अब मेरी तबीयत पहले जैसी नहीं रही। अकेले सफर करना मेरे लिए आसान नहीं है…”
यह सुनकर पूजा की आँखें नम हो गईं। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे।
उसी समय पूजा की 14 साल की बेटी नेहा धीरे-धीरे उसके पास आई और बोली—
“मम्मी… आप चिंता क्यों कर रही हो? नानी को हम ले आएंगे।”
पूजा ने हैरानी से उसकी तरफ देखा—
“तुम? कैसे?”
नेहा हल्के से मुस्कुराई और बोली—
“हाँ मम्मी, मैं और राहुल दोनों जाएंगे। आप चिंता मत करो, हम नानी का पूरा ध्यान रखेंगे।”
पूजा कुछ पल के लिए चुप रह गई। उसे बच्चों की बात पर भरोसा तो था, लेकिन मन में डर भी था। इतने छोटे बच्चे… इतना लंबा सफर…
लेकिन नेहा की आँखों में आत्मविश्वास साफ झलक रहा था।
शुरू में सभी को थोड़ी घबराहट हुई, पर बच्चों की हिम्मत देखकर सबका मन मजबूत हो गया।
आखिरकार तय हुआ कि—
नेहा और राहुल ही अपनी नानी को लेने जाएंगे।
ट्रेन का सफर अब तक बिल्कुल ठीक चल रहा था।
नेहा पूरी जिम्मेदारी के साथ अपनी नानी का ख्याल रख रही थी—
वह समय पर उन्हें दवा देती, पानी पिलाती और आराम करने के लिए कहती रहती।
लेकिन रात होते-होते अचानक नानी की तबीयत बिगड़ गई।
उन्हें चक्कर आने लगे और उनका शरीर ढीला पड़ने लगा।
नेहा एक पल के लिए घबरा गई, उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा…
लेकिन उसने खुद को संभाला और हिम्मत नहीं हारी।
उसने तुरंत अपनी माँ को फोन लगाया—
“मम्मी… नानी ठीक नहीं हैं…”
यह सुनते ही पूजा का दिल जैसे बैठ गया।
ट्रेन के डिब्बे में बैठे यात्रियों में से एक सज्जन तुरंत आगे आए। वे पेशे से डॉक्टर थे। उन्होंने स्थिति को समझते हुए बिना देर किए नानी की नब्ज़ देखी, पानी के छींटे मारे और अपनी मेडिकल किट से जरूरी प्राथमिक उपचार दिया।
कुछ ही क्षणों में उन्होंने शांत स्वर में कहा,
“घबराओ मत बेटा… ज्यादा चिंता की बात नहीं है। कमजोरी और थकान की वजह से इन्हें चक्कर आया है। थोड़ी देर आराम करेंगी तो बिल्कुल ठीक हो जाएँगी।”
डॉक्टर की बात सुनकर नेहा के चेहरे पर फैला डर धीरे-धीरे कम हो गया। उसने गहरी सांस ली और नानी का हाथ थाम लिया।
उस पल नेहा ने दिल से एक बात महसूस की—
डर कितना भी बड़ा क्यों न हो, हिम्मत उससे हमेशा एक कदम आगे होती है।
जब सब घर पहुँचे, पूजा खुद को रोक नहीं पाई। वह दौड़कर अपनी माँ के गले से लिपट गई।
“माँ… आप ठीक हो ना?” उसकी आवाज़ काँप रही थी।
सुशीला जी ने उसके सिर पर हाथ फेरा और हल्की मुस्कान के साथ बोलीं—
“हाँ बेटा, मैं बिल्कुल ठीक हूँ… क्योंकि अब मुझे संभालने के लिए सिर्फ तुम ही नहीं, तुम्हारे बच्चे भी हैं।”
पूजा ने आँसू भरी आँखों से नेहा की तरफ देखा।
आज उसे अपनी बेटी में सिर्फ एक मासूम बच्ची नहीं, बल्कि एक समझदार और जिम्मेदार इंसान नजर आ रहा था।
सीख:
उस दिन पूजा ने एक बात समझी—
👉 पिता का जाना जिंदगी को कठिन जरूर बनाता है…
👉 लेकिन परिवार का साथ हर मुश्किल को आसान बना देता है…
और सुशीला जी ने कहा—
“जिस घर में बच्चे जिम्मेदारी समझने लगते हैं… वहाँ कोई भी कमी ज्यादा देर तक नहीं रहती।”

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