एक फैसला… जिसने घर को घर बना दिया
बारिश रुक चुकी थी, लेकिन खिड़की के शीशों पर अभी भी पानी की बूंदें अटकी हुई थीं—ठीक वैसी ही जैसे मेरे मन में अटकी हुई कुछ बातें, जो निकलना चाहती थीं लेकिन निकल नहीं पा रही थीं।
मैं बालकनी में खड़ी थी। नीचे सड़क पर लोग अपने-अपने काम में व्यस्त थे, लेकिन मेरा मन अतीत में कहीं उलझा हुआ था।
पीछे से आवाज़ आई—
"सोनल, चाय ठंडी हो जाएगी।"
मैंने मुड़कर देखा। रोहित कप लेकर खड़ा था। चेहरे पर हल्की थकान और आँखों में कुछ अनकहा सा।
मैंने कप लिया, लेकिन कुछ बोली नहीं।
हमारे बीच पिछले कुछ महीनों से सब कुछ ठीक होते हुए भी ठीक नहीं था।
घर बड़ा था, सुविधाएं पूरी थीं, लेकिन एक खालीपन था… जो हर दिन थोड़ा और गहरा हो रहा था।
कुछ महीने पहले…
रोहित के पापा का देहांत हुए दो साल हो चुके थे। उनकी माँ, शारदा जी, गाँव में अकेली रहती थीं।
शुरुआत में रोहित हर हफ्ते उनसे बात करता था, लेकिन धीरे-धीरे काम का बहाना बढ़ता गया… और फोन कम होते गए।
एक दिन रोहित ने मुझसे कहा था—
"सोनल, सोच रहा हूँ माँ को यहाँ बुला लूँ।"
मैं उस वक्त लैपटॉप पर काम कर रही थी। मैंने बिना उसकी तरफ देखे जवाब दिया—
"रोहित, यहाँ पहले ही बहुत काम है। ऑफिस, घर… और फिर माँ आएंगी तो उनकी देखभाल की जिम्मेदारी भी बढ़ जाएगी। गाँव में वो ज्यादा खुश हैं।"
रोहित चुप हो गया।
उसने फिर कभी इस बारे में बात नहीं की।
आज की सुबह…
मैं घर की सफाई कर रही थी। अलमारी के ऊपर रखे एक पुराने बैग को नीचे उतारा।
उसमें कुछ कागज, पुराने फोटो और एक लिफाफा था।
लिफाफे पर लिखा था—
"मेरे बेटे रोहित के लिए"
मेरे हाथ अपने आप कांप गए।
मैंने धीरे से लिफाफा खोला।
अंदर एक चिट्ठी थी…
"बेटा रोहित,
तू जब भी फोन करता है, मैं हमेशा यही कहती हूँ कि मैं ठीक हूँ। लेकिन सच यह है कि अब अकेलापन बहुत सताने लगा है। घर बहुत बड़ा लगने लगा है, और मैं बहुत छोटी…
तेरे पापा के जाने के बाद सब कुछ बदल गया है। रात को डर लगता है। कभी-कभी लगता है कि अगर मैं बीमार पड़ जाऊं तो मुझे देखने वाला भी कोई नहीं होगा।
मैं तुझे परेशान नहीं करना चाहती, इसलिए कभी कुछ नहीं कहती। लेकिन अगर कभी तुझे लगे कि मैं तेरे पास रह सकती हूँ… तो मुझे बहुत अच्छा लगेगा।
तेरी माँ"
मेरी आँखों से आँसू गिरने लगे।
मैं कुर्सी पर बैठ गई।
मैंने क्या किया था?
मैंने सिर्फ अपनी सुविधा के लिए एक माँ को उसके बेटे से दूर रखा था।
तभी फोन बजा।
स्क्रीन पर नाम था—"राहुल (रोहित का दोस्त)"
मैंने फोन उठाया।
"भाभी… रोहित है क्या?"
"नहीं, ऑफिस गए हैं। क्यों?"
राहुल थोड़ी देर चुप रहा, फिर बोला—
"भाभी, आपसे एक बात कहनी थी…"
"हाँ, बोलो।"
"रोहित पिछले महीने गाँव गया था। आंटी जी की तबीयत खराब थी। डॉक्टर ने कहा कि अब उन्हें अकेले नहीं छोड़ना चाहिए।"
मेरा दिल जोर से धड़कने लगा।
"तो…?"
"तो रोहित उन्हें यहाँ लाना चाहता था… लेकिन उसने कहा कि अगर इससे आपके बीच तनाव होगा, तो वो आंटी जी को एक अच्छे वृद्धाश्रम में शिफ्ट कर देगा…"
मेरे हाथ से फोन लगभग छूट गया।
मैंने तुरंत फैसला लिया।
मैं उठी और गेस्ट रूम की तरफ गई।
वो कमरा जिसे मैंने अपना वर्कस्पेस बना रखा था।
मैंने अपनी सारी फाइलें हटाईं… टेबल खाली की… और एक बिस्तर लगवाया।
कमरे में एक छोटी सी पूजा की जगह बनाई।
हर चीज करते वक्त मेरे अंदर एक ही आवाज गूंज रही थी—
"क्या मैं भी कभी बूढ़ी होऊंगी?"
"क्या मेरे बच्चे भी मेरे साथ ऐसा करेंगे?"
शाम का समय…
दरवाजा खुला।
रोहित अंदर आया।
मैंने चाय का कप उसकी तरफ बढ़ाया और कहा—
"कल हम माँ को लेने चलेंगे।"
वो रुक गया।
"क्या…?"
"हाँ, हम उन्हें घर लाएंगे। हमेशा के लिए।"
उसकी आँखों में आंसू आ गए।
"सोनल… तुम सच कह रही हो?"
मैंने सिर हिला दिया।
अगले ही पल वो मुझे गले लगाकर रो पड़ा।
अगले दिन…
हम गाँव पहुँचे।
घर के बाहर ताला लगा था।
पड़ोसी ने बताया—
"शारदा जी मंदिर गई हैं।"
हम मंदिर की तरफ दौड़े।
सीढ़ियों पर वो बैठी थीं।
हाथ में माला… आँखें बंद… और होंठों पर प्रार्थना—
"भगवान, मेरे बेटे को खुश रखना…"
रोहित उनके पैरों में गिर पड़ा—
"माँ!"
उन्होंने आँखें खोलीं… और जैसे ही रोहित को देखा, उनका चेहरा खिल उठा।
फिर उन्होंने मुझे देखा।
मैं उनके पास गई… और उनके हाथ पकड़ लिए—
"माँ, अब आप अकेली नहीं रहेंगी। आप हमारे साथ चलेंगी… अपने घर।"
उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।
कुछ समय बाद…
अब हमारा घर पहले जैसा नहीं रहा।
अब यहाँ सन्नाटा नहीं होता।
सुबह पूजा की आवाज आती है।
रसोई से खुशबू आती है।
शाम को दरवाजा खुलता है तो कोई इंतजार करता मिलता है।
हाँ, हमारी प्राइवेसी थोड़ी कम हुई है…
लेकिन दिल का सुकून बहुत बढ़ गया है।
एक दिन मैंने देखा—
रोहित अपनी माँ की गोद में सिर रखकर सो रहा था।
और शारदा जी उसके बालों में हाथ फेर रही थीं।
उस पल मुझे समझ आया—
घर दीवारों से नहीं बनता… रिश्तों से बनता है।
कहानी का सार:
हम अक्सर अपनी सुविधा के लिए रिश्तों को पीछे छोड़ देते हैं।
लेकिन सच्चाई यह है कि जिन लोगों को हम "जिम्मेदारी" समझते हैं, वही हमारे जीवन की सबसे बड़ी ताकत होते हैं।
बुजुर्ग बोझ नहीं होते… वो हमारे घर की जड़ होते हैं।

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