नेकी का असली साथ
घर के आंगन में हल्की हवा चल रही थी, लेकिन माहौल में एक अजीब-सी खामोशी थी। दीवार पर लगी घड़ी की टिक-टिक साफ सुनाई दे रही थी।
सविता जी सोफे पर बैठी थीं और बार-बार दरवाज़े की ओर देख रही थीं। तभी उनकी बहू प्रिया रसोई से बाहर आई।
“मम्मी जी, आप कुछ परेशान लग रही हैं?” प्रिया ने पूछा।
सविता जी ने गहरी सांस ली, “परेशान तो नहीं… लेकिन रोहन फिर बिना बताए कहीं चला गया। आज भी घर में रहना चाहिए था, लेकिन उसे तो बस दूसरों की ही चिंता रहती है।”
प्रिया हल्का-सा मुस्कुराई, लेकिन उस मुस्कान के पीछे नाराज़गी छिपी थी।
“आप सही कह रही हैं मम्मी जी। मैं भी बहुत परेशान हो चुकी हूं इनकी आदतों से। घर से ज्यादा बाहर के लोगों के लिए समय है इनके पास।”
सविता जी ने उसकी तरफ देखा, “क्या हुआ फिर से?”
प्रिया ने धीरे-धीरे अपनी बात शुरू की—
“कल ही की बात है, मैंने सोचा था कि हम दोनों कहीं बाहर जाएंगे। काफी समय हो गया था साथ में वक्त बिताए। लेकिन तभी इनके दोस्त दीपक का फोन आ गया—उसकी बहन की तबीयत खराब थी, तो ये तुरंत उसके साथ अस्पताल चले गए।”
“और परसों… मोहल्ले के गुप्ता जी को पैसों की जरूरत थी। बिना कुछ सोचे ₹3000 दे आए। मैंने मना भी किया था, लेकिन मेरी एक नहीं सुनी।”
“ऑफिस में भी यही हाल है—हर दिन किसी न किसी के लिए खाना ले जाते हैं। कोई भूखा है, किसी के घर में दिक्कत है… जैसे सारी जिम्मेदारी इन्होंने ही उठा रखी हो।”
प्रिया की आवाज़ में अब झुंझलाहट साफ थी।
“मम्मी जी, आज के समय में लोग ऐसे इंसान को समझदार नहीं, बेवकूफ कहते हैं। लोग बस फायदा उठाते हैं।”
सविता जी ने शांति से उसकी पूरी बात सुनी। फिर धीरे से बोलीं—
“बेटा, रोहन बिल्कुल अपने पिताजी पर गया है। वो भी ऐसे ही थे—दूसरों के लिए हमेशा तैयार।”
“लेकिन मम्मी जी…” प्रिया कुछ कहना चाहती थी।
सविता जी ने उसे रोकते हुए कहा—
“मैं समझती हूं तुम्हारी बात। लेकिन किसी की मदद करना कभी गलत नहीं होता। जब हम किसी का सहारा बनते हैं, तो जिंदगी भी किसी न किसी रूप में हमें उसका फल जरूर देती है।”
“और रोहन अपनी जिम्मेदारियों से भागता तो नहीं है ना? घर का ख्याल रखता है, तुम्हारा भी।”
प्रिया चुप हो गई। उसके पास कोई जवाब नहीं था, लेकिन मन अब भी पूरी तरह नहीं माना था।
कुछ दिन बीत गए…
एक दिन रोहन ऑफिस के काम से दूसरे शहर गया हुआ था। घर में सिर्फ सविता जी, प्रिया और दोनों बच्चे थे।
अचानक सविता जी को सीने में तेज दर्द होने लगा। उनका चेहरा पीला पड़ गया।
“प्रिया… सांस लेने में तकलीफ हो रही है…” उन्होंने मुश्किल से कहा।
प्रिया के हाथ-पैर कांपने लगे।
“मम्मी जी! आपको क्या हो गया?”
घबराकर उसने तुरंत एंबुलेंस को फोन किया।
उसका दिमाग काम नहीं कर रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे, किसे बुलाए।
तभी उसे रोहन की बातें याद आईं—“जरूरत पड़ने पर लोग ही काम आते हैं।”
प्रिया ने तुरंत पड़ोस के गुप्ता जी को फोन किया।
गुप्ता जी बिना देर किए आ गए। उनके साथ और भी दो-तीन पड़ोसी आ गए।
किसी ने एंबुलेंस आने तक सविता जी को संभाला, तो किसी ने जरूरी सामान तैयार किया।
अस्पताल पहुंचते ही प्रिया हैरान रह गई—
वहां रोहन का दोस्त दीपक पहले से मौजूद था।
“रोहन ने मुझे पहले ही बता दिया था कि अगर कभी जरूरत पड़े तो मैं तुरंत आ जाऊं,” दीपक ने कहा और सारी औपचारिकताएं खुद संभाल लीं।
डॉक्टरों ने बताया—मामूली हार्ट अटैक है, लेकिन समय पर इलाज मिल गया, इसलिए खतरा टल गया।
प्रिया की आंखों से आंसू बहने लगे—इस बार डर के नहीं, बल्कि राहत के।
दीपक की पत्नी अस्पताल में रुक गई और प्रिया को बच्चों के पास भेज दिया।
जब प्रिया घर पहुंची, तो उसने देखा—
बच्चे पड़ोस की शर्मा आंटी के घर थे। उन्होंने बच्चों को खाना भी खिला दिया था।
इतने में गुप्ता जी भी वहां आ गए और बोले—
“बेटा, ये कुछ पैसे रख लो… अस्पताल में काम आ जाएंगे। चिंता मत करो, हम सब हैं तुम्हारे साथ।”
प्रिया कुछ बोल ही नहीं पाई।
जिसे वो “फालतू मदद” समझती थी… वही आज उसका सहारा बन गई थी।
अगले दिन रोहन भी वापस आ गया।
दो दिन बाद सविता जी घर लौट आईं।
घर का माहौल फिर से सामान्य होने लगा, लेकिन प्रिया के अंदर बहुत कुछ बदल चुका था।
वह चुपचाप रोहन के पास आई और बोली—
“मुझे माफ कर दो… मैं तुम्हें समझ नहीं पाई।”
रोहन ने हैरानी से पूछा, “क्यों? क्या हुआ?”
प्रिया की आंखें भर आईं—
“तुम सही थे… किसी की मदद कभी बेकार नहीं जाती। अगर तुम लोगों के लिए हमेशा खड़े नहीं होते… तो शायद आज कोई हमारे लिए खड़ा नहीं होता।”
रोहन हल्का-सा मुस्कुराया।
सविता जी पास खड़ी सब सुन रही थीं। उन्होंने दोनों को देखा और संतोष से मुस्कुरा दीं।
घर में एक सुकून फैल गया था—
अब प्रिया को समझ आ गया था कि
नेकी कभी अकेली नहीं जाती… वो लौटकर जरूर आती है, कई हाथों का सहारा बनकर।

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