चलते रहना ही जीवन है
गाँव के उस पुराने घर के बरामदे में एक लकड़ी की चौकी पड़ी रहती थी। उसी चौकी पर दादाजी शाम को बैठा करते थे। सफेद धोती, हल्का-सा कुर्ता, आँखों पर मोटा चश्मा और चेहरे पर एक अजीब-सी शांति। उम्र ने शरीर को झुका दिया था, मगर मन अब भी सीधा खड़ा था। जो भी घर आता, उनके पास दो मिनट जरूर बैठता। कोई उनके पैर छूता, कोई हाल-चाल पूछता, कोई उनकी बातों में जीवन का सार ढूँढ़ता।
लोग अक्सर कहा करते, “दादाजी, आप तो बहुत भाग्यशाली हैं। देखिए, आपके बेटे-बेटियाँ कितने बड़े-बड़े पदों पर हैं। सब अपने पैरों पर खड़े हैं, परिवार भी जुड़ा हुआ है, नाम भी है, सम्मान भी है।”
दादाजी यह सुनकर बस हल्का-सा मुस्कुरा देते। उनकी मुस्कान में गर्व कम, अनुभव ज्यादा होता था। वह जानते थे कि लोगों को जो दिखता है, वह पूरी कहानी नहीं होती। ऊँचे पदों पर पहुँचे बच्चे, सम्मान से भरा परिवार और बाहर से सजा-संवरा जीवन—यह सब उनकी लंबी तपस्या का परिणाम था। उस तपस्या में भूख भी थी, अपमान भी, तंगी भी, संघर्ष भी, और ऐसे कई मोड़ भी, जहाँ कोई कमजोर इंसान टूट जाता।
दादाजी का नाम रामकिशोर था। बचपन से ही जीवन ने उन्हें नरमी से नहीं, सख्ती से छुआ था। उनके पिता किसान थे। छोटा-सा खेत, बड़ा-सा परिवार और मौसम के भरोसे चलने वाली जिंदगी। कभी फसल अच्छी होती, तो घर में दाल में घी की बूंदें पड़ जातीं। कभी बारिश बिगड़ जाती, तो कई दिनों तक सूखी रोटी और नमक ही सहारा बनते।
रामकिशोर बचपन से समझदार थे। उम्र छोटी थी, मगर आँखें बहुत कुछ समझती थीं। उन्होंने अपने पिता को दिन-रात मेहनत करते देखा था। माँ को आधी रोटी खाकर बच्चों के लिए पूरी थाली सजाते देखा था। उसी घर में उन्होंने सीखा था कि अभाव इंसान को छोटा नहीं बनाता, सोच छोटा बनाती है।
गाँव के स्कूल में वह पढ़ने जाते थे। फटी कॉपी, उधार की किताबें और पैरों में घिसी हुई चप्पल। कई बार तो चप्पल भी नहीं होती थी। लेकिन पढ़ने की लगन ऐसी थी कि धूप हो या बारिश, वह स्कूल पहुँच ही जाते। मास्टर जी कहते, “रामकिशोर, तुममें दम है। अगर मेहनत करते रहे, तो जिंदगी बदल सकते हो।”
यह बात उनके मन में बैठ गई। उन्होंने मेहनत को अपना धर्म बना लिया। सुबह खेत में पिता का हाथ बँटाते, फिर स्कूल जाते, शाम को लौटकर घर के छोटे-मोटे काम करते। रात को ढिबरी की रोशनी में पढ़ते। जब बाकी बच्चे सो जाते, तब भी वह किताब खोले बैठे रहते।
समय धीरे-धीरे आगे बढ़ा। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्हें शहर में छोटी-सी नौकरी मिली। तनख्वाह बहुत ज्यादा नहीं थी, मगर उनके लिए वह सम्मान की पहली सीढ़ी थी। घर में खुशियाँ आईं। माँ की आँखों में चमक आ गई। पिता ने पहली बार बेटे की पीठ थपथपाई और कहा, “बेटा, तूने हमारे संघर्ष को व्यर्थ नहीं जाने दिया।”
शहर जाकर नौकरी करना आसान नहीं था। किराए का कमरा, सीमित वेतन, रोजमर्रा की जद्दोजहद और ऊपर से गाँव के परिवार की चिंता। लेकिन रामकिशोर ने कभी शिकायत नहीं की। वह अपना खर्च कम रखते, बचत ज्यादा करते। अपनी जरूरतें हमेशा सबसे अंत में रखते।
कुछ वर्षों बाद उनकी शादी सावित्री से हुई। सावित्री सरल, धैर्यवान और संस्कारी महिला थीं। वह ज्यादा बोलती नहीं थीं, मगर घर को थामे रखने का अद्भुत गुण उनमें था। रामकिशोर अक्सर कहते, “मैं बाहर की लड़ाइयाँ लड़ता हूँ, और तुम घर के मोर्चे संभालती हो। सच कहूँ, मेरी आधी ताकत तुम हो।”
सावित्री मुस्कुराकर कहतीं, “घर तभी चलता है, जब दोनों एक-दूसरे का सहारा बनें।”
धीरे-धीरे परिवार बढ़ा। पहले बेटा हुआ, फिर बेटी, फिर एक और बेटा, फिर सबसे छोटी बेटी। आय सीमित थी, जिम्मेदारियाँ बढ़ती जा रही थीं। मगर रामकिशोर और सावित्री ने कभी बच्चों को कमी का एहसास नहीं होने दिया। उन्होंने अपने लिए नए कपड़े नहीं खरीदे, मगर बच्चों की किताबें कभी अधूरी नहीं छोड़ीं। त्योहार पर अपने लिए मिठाई कम आई, तो भी बच्चों की मुस्कान पूरी रही।
सावित्री अक्सर बच्चों से कहतीं, “तुम्हारे पिता जी बहुत मेहनत करते हैं। उनकी थकान को समझना सीखो।”
रामकिशोर बच्चों से कहते, “गरीबी कोई शर्म की बात नहीं है। शर्म की बात है मेहनत से भागना।”
घर में अनुशासन था, मगर प्यार भी बहुत था। सुबह सबको समय पर उठना होता। पढ़ाई जरूरी थी। बड़ों का आदर करना जरूरी था। झूठ बोलना सख्त मना था। भोजन की बर्बादी नहीं होती थी। और सबसे जरूरी बात—घर में किसी को उसकी हैसियत से नहीं, उसके व्यवहार से परखा जाता था।
बच्चे बड़े होने लगे। उन्होंने अपने माता-पिता की कठिनाइयों को देखा था। इसलिए उनमें आगे बढ़ने की आग थी। बड़ा बेटा इंजीनियर बनना चाहता था। बड़ी बेटी अध्यापिका। छोटा बेटा प्रशासनिक सेवा में जाना चाहता था। छोटी बेटी डॉक्टर बनना चाहती थी।
रामकिशोर की तनख्वाह इतनी नहीं थी कि वह आसानी से इन सपनों का खर्च उठा सकें। कई बार महीने के अंत तक घर चलाना मुश्किल हो जाता। सावित्री अपने गहनों को बार-बार देखतीं, फिर वापस डिब्बे में रख देतीं। मगर एक दिन जब बड़े बेटे की फीस भरने की बात आई और घर में पैसे कम पड़े, तो उन्होंने चुपचाप अपने कानों की बालियाँ निकाल दीं।
रामकिशोर ने देखा तो दुखी हो उठे। बोले, “यह क्या कर रही हो सावित्री? यह तुम्हारा सहारा है।”
सावित्री ने शांत स्वर में कहा, “गहने अलमारी में अच्छे लगते हैं, लेकिन बच्चों का भविष्य जीवन में अच्छा लगता है।”
उस दिन रामकिशोर की आँखें भर आईं। उन्होंने बालियाँ बेच दीं, फीस भरी, और मन ही मन ठान लिया कि बच्चों को वह मंजिल तक जरूर पहुँचाएँगे।
वर्षों की मेहनत रंग लाई। बड़ा बेटा सचमुच इंजीनियर बन गया। बड़ी बेटी शिक्षिका बनी। छोटा बेटा प्रतियोगी परीक्षा में सफल होकर बड़े पद पर पहुँचा। छोटी बेटी डॉक्टर बन गई। जिस घर में कभी तेल बचाकर दीपक जलता था, वहाँ अब चारों बच्चों की सफलता की रोशनी फैल गई।
समाज ने सम्मान देना शुरू कर दिया। रिश्तेदार, पड़ोसी, परिचित—सब कहते, “रामकिशोर जी, आपने तो कमाल कर दिया। चारों बच्चे इतने अच्छे निकले। आप सच में भाग्यशाली हैं।”
रामकिशोर फिर वही हल्की मुस्कान दे देते। वह जानते थे कि यह भाग्य उतना नहीं था, जितना त्याग, अनुशासन और वर्षों का तप।
समय का पहिया घूमता रहा। बच्चे अपने-अपने काम और परिवार में व्यस्त हो गए। यह स्वाभाविक भी था। हर किसी की अपनी जिम्मेदारियाँ थीं। पहले फोन रोज आते थे, फिर दो दिन में, फिर हफ्ते में, फिर कभी-कभी। त्यौहार पर सब आते, कुछ दिन रुकते, फिर चले जाते। घर फिर शांत हो जाता।
रामकिशोर ने कभी किसी से शिकायत नहीं की। वह कहा करते, “बच्चे उड़ान भरें, यही तो चाहा था। अब उड़ रहे हैं, तो उन्हें आकाश भी चाहिए।”
सावित्री कभी-कभी कहतीं, “फिर भी, बुढ़ापे में साथ की जरूरत होती है।”
रामकिशोर धीमे स्वर में जवाब देते, “हमें उम्मीद रखनी चाहिए, बोझ नहीं बनना चाहिए।”
जब वह साठ वर्ष के हुए, तब नौकरी ने भी साथ छोड़ दिया। सेवानिवृत्ति का समय आ गया। अब रोज सुबह उठकर दफ्तर जाने की जल्दी नहीं थी। अचानक जिंदगी बहुत लंबी लगने लगी। कुछ महीने तो पुराने साथियों से मिलना-जुलना रहा, कुछ कागजी काम रहे, फिर धीरे-धीरे दिन खाली होने लगे।
खाली समय इंसान को अपने भीतर ले जाता है। रामकिशोर कभी बरामदे में बैठते, कभी पुराने कागज देखते, कभी बच्चों की बचपन की कॉपियाँ, कभी फोटो एलबम। सावित्री उनके पास बैठतीं और दोनों पुरानी बातें याद करते।
“याद है, जब बड़े वाले की पहली फीस भरने के लिए हम रात भर जागते रहे थे?” सावित्री पूछतीं।
“हाँ,” रामकिशोर हँसते हुए कहते, “और याद है, छोटी बेटी डॉक्टर बन गई तो तुमने कैसे पूरे मोहल्ले को लड्डू बाँटे थे?”
दोनों हँसते, फिर चुप हो जाते। उस चुप्पी में संतोष भी होता और समय का एहसास भी।
धीरे-धीरे उम्र बढ़ती गई। शरीर अब पहले जैसा साथ नहीं देता था। घुटनों में दर्द रहने लगा। आँखों की रोशनी कमजोर हुई। दवाइयों की संख्या बढ़ने लगी। लेकिन सबसे बड़ा सहारा अब भी सावित्री ही थीं। समय पर दवा, हल्का भोजन, थोड़ी डाँट, थोड़ा प्यार—उन्हीं के कारण जीवन व्यवस्थित था।
रामकिशोर कहा करते, “जब तक तुम हो, मुझे कोई चिंता नहीं।”
सावित्री मुस्कुरा देतीं, “मैं नहीं रहूँगी, तब?”
रामकिशोर तुरंत बात बदल देते। शायद वह उस कल्पना से भी डरते थे।
लेकिन जीवन किसी की तैयारी देखकर नहीं चलता। एक दिन अचानक सावित्री बीमार पड़ीं। पहले लगा, सामान्य कमजोरी है। फिर जाँच हुई। बीमारी गंभीर निकली। बच्चों को खबर दी गई। सब आए। अस्पताल के चक्कर लगे। दवाइयाँ चलीं। प्रार्थनाएँ हुईं। उम्मीद और डर के बीच कई दिन गुजर गए।
सावित्री बिस्तर पर लेटी थीं। चेहरे पर कमजोरी थी, मगर आँखों में वही शांति। उन्होंने एक दिन रामकिशोर का हाथ पकड़कर कहा, “आप टूटना मत। आपने पूरी जिंदगी सबको संभाला है।”
रामकिशोर काँपती आवाज़ में बोले, “तुम ठीक हो जाओ, फिर जो कहोगी वही करूँगा।”
सावित्री ने धीमे से सिर हिलाया। जैसे वह सब समझ रही हों। शायद वह यह भी समझ रही थीं कि अब उनका जाना तय है।
कुछ दिनों बाद वह सचमुच चली गईं।
उस दिन घर में लोग बहुत थे, मगर रामकिशोर पहली बार सचमुच अकेले हो गए थे।
पत्नी के जाने के बाद घर वही था, दीवारें वही थीं, बरामदा वही था, चौकी वही थी—पर सब कुछ बदल गया था। रसोई की आवाजें बंद हो गईं। सुबह की पुकार बंद हो गई। चाय की वह खुशबू बंद हो गई, जो हर दिन उनके कमरे तक पहुँचती थी। अब दवा समय पर कौन देगा, यह चिंता नहीं थी; चिंता यह थी कि हाल पूछने वाला अब कौन होगा।
बच्चे आते रहे, समझाते रहे, कुछ दिन साथ भी रहे। किसी ने कहा, “पिताजी, हमारे साथ चलिए।” किसी ने कहा, “यहाँ अकेले कैसे रहेंगे?” किसी ने कहा, “हम बारी-बारी से आपके पास रहेंगे।”
रामकिशोर सबकी बात सुनते। फिर शांत स्वर में कहते, “मैं अकेला नहीं हूँ। तुम्हारी माँ की यादें यहीं हैं। मैं इन्हें छोड़कर कहाँ जाऊँ?”
बच्चे समझते भी थे, और असहाय भी महसूस करते थे। उनकी अपनी नौकरी, बच्चे, जिम्मेदारियाँ, शहर, समय—सब कुछ उन्हें पूरी तरह साथ रहने से रोकता था। वे जितना कर सकते थे, करते रहे। मगर सच यह था कि बुढ़ापे का अकेलापन किसी व्यवस्था से पूरा नहीं होता।
अब रामकिशोर का साथ थे—बीमारी, दवाइयाँ, चारपाई और यादें।
वह कभी दीवार पर टंगी सावित्री की तस्वीर को देखते रहते। कभी पुराने कागज पलटते। कभी बच्चों के बचपन की बातें याद करते। कभी अपने गाँव के दिन। कभी नौकरी के पहले दिन की घबराहट। कभी पहली तनख्वाह। कभी वह रात, जब घर में अनाज कम था। कभी वह सुबह, जब बेटे का चयन हुआ था। कभी वह दोपहर, जब बेटी ने पहली बार स्कूल में पढ़ाना शुरू किया था। और फिर—उन सबके बीच सावित्री का चेहरा।
उनके जीवन की किताब में धुँधले भी पन्ने थे और उजले भी। धुँधले पन्नों में अभाव, उपेक्षा, दूरी, अकेलापन और बिछोह था। उजले पन्नों में मेहनत, प्रेम, परिवार, संस्कार और उपलब्धियाँ थीं।
कभी-कभी मोहल्ले के बच्चे उनके पास आ बैठते। वह उन्हें छोटी-छोटी बातें बताते।
“बेटा, सुविधा और संस्कार एक चीज नहीं होते।”
“बड़े घर में रहना बड़ी बात नहीं, बड़े दिल से रहना बड़ी बात है।”
“बुजुर्ग पेड़ की तरह होते हैं, फल न भी दें, तो छाया जरूर देते हैं।”
एक दिन पड़ोस की औरत अपनी बहू से कह रही थी, “आजकल बच्चों को संभालने के लिए आया रखनी पड़ती है।”
रामकिशोर ने बात सुनी, मगर कुछ बोले नहीं। शाम को वही औरत उनके पास बैठी, तो उन्होंने धीरे से कहा, “बच्चों को पालना और बच्चों को बड़ा करना, दोनों अलग बातें हैं। खाना कोई भी खिला सकता है, पर संस्कार घर के बड़े ही दे सकते हैं।”
औरत चुप हो गई। बात सीधी थी, मगर गहरी भी।
रामकिशोर अपने पोते-पोतियों से भी यही कहते, “तुम्हारे माता-पिता तुम्हें पढ़ा देंगे, अच्छा जीवन दे देंगे। लेकिन बड़ों के पास बैठोगे, तो जीना सीखोगे।”
एक बार उनके बड़े पोते ने पूछा, “दादाजी, आपने जीवन में सबसे बड़ी बात क्या सीखी?”
रामकिशोर कुछ देर चुप रहे। फिर बोले, “जीवन कटीली पगडंडी है। इसमें समतल भी आता है, चढ़ाई भी आती है, ढलान भी आती है। लेकिन रुकना नहीं चाहिए। चलते रहना चाहिए।”
“अगर बहुत दुख हो तब भी?” पोते ने पूछा।
“तब तो और भी,” उन्होंने कहा, “दुख रुकने से कम नहीं होता, आगे बढ़ने से हल्का होता है।”
पोता उस दिन बहुत देर तक उनके पास बैठा रहा।
समय के साथ रामकिशोर और कमजोर होते गए। चलना कम हो गया। फिर छड़ी आई। फिर सहारे की जरूरत पड़ी। फिर चारपाई ही उनका संसार बन गई। दवाइयों के पत्ते सिरहाने रखे रहते। पानी का गिलास पास रहता। दीवार की घड़ी की टिक-टिक अब कमरे की खामोशी का हिस्सा बन चुकी थी।
लेकिन एक बात आखिरी दिनों तक नहीं बदली—उनकी सोच। उन्होंने कभी अपने भाग्य को कोसा नहीं। कभी बच्चों के लिए कड़वाहट नहीं रखी। कभी अपने संघर्ष का ढिंढोरा नहीं पीटा। वह बस एक बात दोहराते रहे—“कमजोर आदमी भाग्य को दोष देता है। साहसी आदमी संघर्ष करता है। और जो कुछ करना ही नहीं चाहता, वही आलस्य में जीवन गँवा देता है।”
उनकी बातों में कटुता नहीं थी, सत्य था।
एक दिन पूरा परिवार उनके आसपास बैठा था। बेटे, बेटियाँ, बहुएँ, दामाद, पोते, पोतियाँ—सब। रामकिशोर बहुत कमजोर हो चुके थे। साँसें धीमी थीं। आवाज़ बहुत हल्की।
उन्होंने सबको देखा। उनकी आँखें जैसे एक-एक चेहरे को अपने भीतर उतार लेना चाहती थीं।
उन्होंने धीमे से कहा, “मैंने तुम्हें संपत्ति से ज्यादा संस्कार देने की कोशिश की। अगर वह बचा लिया, तो समझना मैं गया नहीं हूँ।”
बड़ी बेटी रो पड़ी। छोटे बेटे ने उनका हाथ पकड़ लिया। पोते-पोतियाँ सुबकने लगे।
रामकिशोर ने फिर कहा, “घर बड़ा कमरों से नहीं होता, अपनेपन से होता है। एक-दूसरे का साथ मत छोड़ना।”
कुछ देर बाद उन्होंने आँखें बंद कर लीं। चेहरे पर अद्भुत शांति थी। जैसे लंबी यात्रा का थका हुआ यात्री अंततः विश्राम में चला गया हो।
उस दिन घर में बहुत रोना हुआ। मगर उस रोने के बीच एक गहरा सम्मान भी था। सब जानते थे कि एक साधारण-सा दिखने वाला आदमी असाधारण जीवन जीकर गया है।
उनके जाने के बाद भी घर में उनकी उपस्थिति बनी रही। बरामदे की चौकी उन्हें याद दिलाती। पुरानी अलमारी उनके कागजों की खुशबू सँभाले थी। दीवार पर टंगी तस्वीर जैसे अब भी कहती थी—“रुकना मत।”
पोते-पोतियाँ जब कभी जीवन की कठिनाइयों से घबराते, तो दादाजी की बातें याद करते। बेटे-बेटियाँ जब अपने बच्चों को अनुशासन सिखाते, तो उन्हें अपने पिता की सख्ती में छिपा प्रेम समझ आता। बहुएँ जब घर को जोड़कर रखने की कोशिश करतीं, तो उन्हें सावित्री का धैर्य याद आता। परिवार के त्योहारों में जब सब एक साथ बैठते, तो लगता दादाजी-दादीजी कहीं न कहीं मुस्कुरा रहे हैं।
धीरे-धीरे सबको यह बात और गहराई से समझ आने लगी कि दादा-दादी केवल परिवार के बुजुर्ग नहीं होते, वे घर की जड़ होते हैं। माँ-बाप जीवन बनाते हैं, पर दादा-दादी उस जीवन में संस्कारों की खुशबू भरते हैं। उनकी कहानियाँ, उनकी डाँट, उनका स्नेह, उनकी सीख—ये सब बच्चों के मन में ऐसी मिट्टी तैयार करते हैं, जिसमें चरित्र उगता है।
आज के समय में बहुत कुछ बदल गया है। घर छोटे हो गए हैं, समय कम हो गया है, सुविधाएँ बढ़ गई हैं। बच्चों की देखभाल के लिए आया, बाई, डे-केयर सब उपलब्ध हैं। यह जरूरत भी हो सकती है, मजबूरी भी। पर एक बात फिर भी सच है—पालन-पोषण केवल शरीर का नहीं होता, मन और संस्कार का भी होता है। और मन की परवरिश सबसे अच्छे से वही कर पाते हैं, जिनके पास जीवन का अनुभव होता है, धैर्य होता है और निस्वार्थ प्रेम होता है।
रामकिशोर और सावित्री अब इस दुनिया में नहीं थे, लेकिन उनकी विरासत घर में अब भी जीवित थी। वह विरासत बैंक बैलेंस नहीं थी। वह जमीन-जायदाद नहीं थी। वह थी—संघर्ष का साहस, दुख में धैर्य, रिश्तों में अपनापन, जीवन में अनुशासन और हर हाल में चलते रहने की सीख।
लोग आज भी उस परिवार को देखकर कहते, “सच में, यह परिवार बहुत भाग्यशाली है।”
और शायद इस बार यह बात सच भी थी।
क्योंकि भाग्यशाली वही परिवार होता है, जिसे ऐसे बुजुर्ग मिले हों, जो अपने जीवन से सिखा जाएँ कि रास्ता चाहे कितना भी कठिन क्यों न हो, इंसान को रुकना नहीं चाहिए।
चलते रहना है।
समय बदलेगा। लोग बदलेंगे। हालात बदलेंगे।
लेकिन जो अपने संस्कार, साहस और सच्चाई नहीं छोड़ता—वही सच में जीवन जीतता है।
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