दिल की रोशनी
घर में शादी का माहौल था। आँगन में हल्दी की खुशबू, दीवारों पर सजी रंग-बिरंगी लड़ियाँ और रसोई से आती पकवानों की महक—सब कुछ उत्सव में डूबा हुआ था। रिश्तेदारों की चहल-पहल से घर जैसे जिंदा हो उठा था।
लेकिन इस भीड़ और खुशियों के बीच, पूजा के मन में एक अजीब सी खालीपन था।
आज उसके छोटे भाई की शादी थी। सब खुश थे… पर वो नहीं।
कारण था—उसका अपना मन, उसकी अपनी सोच।
पूजा की शादी पाँच साल पहले हुई थी। परिस्थितियों ने उसे जल्दी बड़ा बना दिया था। पिता के गुजर जाने के बाद घर की जिम्मेदारी उसी पर आ गई थी। माँ की तबीयत भी ठीक नहीं रहती थी। ऐसे में जब अरविंद का रिश्ता आया—स्थिर नौकरी, समझदार स्वभाव—तो बिना ज्यादा सोचे शादी तय कर दी गई।
अरविंद उससे आठ साल बड़े थे। शांत, गंभीर और कम बोलने वाले।
और पूजा?
वो तो हँसती-खिलखिलाती, गाने-नाचने वाली लड़की थी।
शादी के बाद जिंदगी चलती रही… पर दिल नहीं जुड़ा।
अरविंद ने कभी कोई कमी नहीं छोड़ी, लेकिन पूजा को हमेशा लगता—"कुछ तो कमी है…"
और आज… उसकी छोटी बहन रिया अपने पति के साथ आ रही थी।
रिया की शादी प्यार से हुई थी। उसका पति करण—मजाकिया, मिलनसार, हर पल हँसाने वाला।
बस, यही तुलना पूजा के मन में चुभती रहती थी।
दरवाज़े पर जैसे ही आहट हुई, रिया की चहकती हुई आवाज़ गूँज उठी—
"दीदीईई!"
अगले ही पल वो दौड़ती हुई आई और पूजा से लिपट गई। उसकी बाँहों की गर्माहट में अपनापन छलक रहा था।
"अरे… कितनी बदल गई हो तुम!" उसने थोड़ा पीछे हटकर पूजा को ऊपर से नीचे तक देखा और फिर हँसते हुए बोली,
"और मेरा छोटा-सा भांजा कहाँ है?"
रिया के पीछे-पीछे करण भी अंदर आया। चेहरे पर वही हल्की शरारती मुस्कान और आँखों में उत्साह—
"नमस्ते दीदी!" उसने हाथ जोड़ते हुए कहा,
"आज तो आपके आने से घर की रौनक ही दोगुनी हो गई… अब तो पार्टी जमकर होगी!"
पूजा ने होंठों पर हल्की-सी मुस्कान लाने की कोशिश की और बोली—
"हाँ… अब तुम लोग आ गए हो, तो मस्ती तो होगी ही…"
शाम ढलते-ढलते घर में संगीत की महफ़िल सज गई। रोशनी से जगमगाता आँगन, ढोलक की थाप और हँसी की गूंज—पूरा माहौल जैसे जश्न में डूब गया था।
करण ने आते ही माहौल अपने हाथ में ले लिया। कभी कोई मज़ेदार किस्सा सुनाता, तो कभी गाना गुनगुनाने लगता। उसकी हाज़िरजवाबी पर सब ठहाके लगा रहे थे। देखते ही देखते, लोगों की भीड़ उसी के आसपास जमा हो गई—जैसे वही इस महफ़िल की जान हो।
और अरविंद?
वो थोड़ी दूर, एक कोने में शांति से बैठे थे। गोद में बेटे को खिलाते हुए, बीच-बीच में सबको देखकर हल्की-सी मुस्कान दे देते। न कोई शोर, न कोई दिखावा—बस अपने छोटे से संसार में मग्न।
इसी बीच, कुछ औरतों की धीमी फुसफुसाहट पूजा के कानों तक आ गई—
“देखो ना, पूजा के पति कितने चुप रहते हैं…” “हाँ, थोड़ा खुलकर भी तो रह सकते हैं… ऐसे भी क्या संकोच…”
उनकी बातें भले धीमी थीं, लेकिन हर शब्द जैसे सीधे पूजा के दिल में उतर रहा था।
उसका मन अचानक भारी हो गया… जैसे किसी ने भीड़ के बीच उसे अकेला खड़ा कर दिया हो।
"दीदी, डांस करो ना!"
भाई ने उत्साह से उसका हाथ पकड़ लिया।
पूजा धीरे से उठी, लेकिन उसकी आँखें भीड़ में किसी को ढूंढ रही थीं—अरविंद को।
"आप भी आइए ना…" उसने हल्के से कहा, जैसे उम्मीद अभी बाकी हो।
अरविंद ने दूर खड़े-खड़े ही मुस्कुराकर सिर हिला दिया—
"तुम करो… मैं यहीं ठीक हूँ।"
उनका ये जवाब सुनकर पूजा के चेहरे की हल्की मुस्कान जैसे ठहर गई। दिल में एक दर्द सी उठी—काश वो भी साथ आते…
तभी करण हँसते हुए आगे बढ़ा—
"अरे दीदी, इतना क्यों सोच रही हैं? मैं हूँ ना आपका डांस पार्टनर!"
उसने हाथ बढ़ाया, और आसपास खड़े लोगों ने भी तालियाँ बजाकर माहौल को और हल्का कर दिया।
संगीत तेज हुआ… और पूजा ने कदम बढ़ा दिए।
वो नाच रही थी—पूरे दिल से, पूरे जोश के साथ… जैसे पुराने दिनों की वही बेफिक्र लड़की फिर लौट आई हो।
लेकिन हर मुस्कान के पीछे, हर ठुमके के साथ… दिल के किसी कोने में एक हल्की सी अधूरी सी चाह बनी रही—
"काश… आज ये पल मैं उनके साथ जी पाती…"
थोड़ी देर बाद माहौल और भी खुशनुमा हो गया। हँसी-मज़ाक के बीच किसी ने आवाज लगाई,
“अरे, अब अरविंद जी भी कुछ सुनाएँ!”
एक के बाद एक सबने ज़ोर देना शुरू कर दिया।
पूजा का दिल एकदम धक से रह गया।
वो मन ही मन घबरा उठी—
"ये क्या गाएँगे…? इन्हें तो कभी गुनगुनाते भी नहीं देखा…"
उसने हल्की चिंता भरी नज़र से अरविंद की तरफ देखा।
पहले तो अरविंद ने टालने की कोशिश की, लेकिन सबके बार-बार कहने पर वो धीरे से उठे।
चेहरे पर वही शांत भाव… लेकिन आँखों में एक अलग सी चमक थी।
पूरा आँगन जैसे एक पल में शांत हो गया।
और फिर… उन्होंने गाना शुरू किया—
"तुम जो साथ हो, तो हर रास्ता आसान लगे,
तेरे बिना ये दिल जैसे वीरान लगे…"
उनकी आवाज़ ऊँची नहीं थी…
पर उसमें एक अजीब सी सच्चाई थी,
एक गहराई… जो सीधे दिल में उतरती चली गई।
हर शब्द जैसे महसूस किया हुआ था,
जैसे वो सिर्फ गा नहीं रहे थे… जी रहे थे।
पूजा पहली बार उन्हें इतने ध्यान से देख रही थी।
आज वो वही शांत, कम बोलने वाले अरविंद नहीं लग रहे थे…
आज उनकी खामोशी बोल रही थी।
गाना खत्म होते ही कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया…
और फिर अचानक पूरा आँगन तालियों से गूंज उठा।
लेकिन पूजा के अंदर जो हुआ…
वो इन तालियों से कहीं ज्यादा गहरा था।
उसके दिल में जैसे कुछ पिघलने लगा था…
कुछ ऐसा, जिसे उसने सालों से महसूस ही नहीं किया था।
रात को छत पर, दोनों बहनें साथ बैठी थीं।
हवा ठंडी थी… और बातें गहरी।
रिया ने धीरे से पूछा—
"दीदी… आप खुश हो ना?"
पूजा ने नजरें झुका लीं—"हाँ… बस… ठीक ही है।"
रिया मुस्कुराई नहीं।
"दीदी, सच बताओ… क्या आपने जीजाजी को दिल से अपनाया है?"
पूजा चौंक गई।
कुछ देर चुप रही… फिर बोली—
"हम दोनों बहुत अलग हैं रिया… वो समझदार हैं, अच्छे हैं… लेकिन…"
"लेकिन वो वैसे नहीं हैं जैसे तुम चाहती थीं?"
पूजा ने सिर हिला दिया।
रिया ने गहरी सांस ली—
"दीदी… हर चमकती चीज खुशियाँ नहीं देती।"
पूजा ने उसकी ओर देखा।
रिया आगे बोली—
"करण बहुत अच्छा है… सबको हँसाता है… लेकिन कभी-कभी मुझे लगता है, वो मुझे समझता ही नहीं।"
"बच्चा रोता है, तो भी दोस्तों में व्यस्त रहता है… मेरी थकान उसे दिखती ही नहीं…"
पूजा हैरान थी।
रिया की आँखें हल्की नम थीं—
"और जीजाजी… वो कम बोलते हैं, लेकिन आपको समझते हैं। आपका हर काम, हर सपना… उन्होंने हमेशा साथ दिया है।"
"आप जो आज भी अपने शौक जी पा रही हो… वो उनकी वजह से है।"
पूजा के मन में जैसे कोई आईना साफ हो गया।
एक-एक बात याद आने लगी—
अरविंद का हर वक्त साथ देना… बिना कहे जरूरत समझ लेना… हर जिम्मेदारी चुपचाप निभाना…
और वो?
बस कमी ढूंढती रही।
सुबह की हल्की सुनहरी धूप खिड़की से होकर कमरे में फैल रही थी। हवा में एक नई ताजगी थी… और शायद वही ताजगी आज पूजा के मन में भी उतर आई थी।
आज सब कुछ अलग लग रहा था—वही घर, वही लोग… लेकिन नजर बदल गई थी।
पूजा धीरे से रसोई में गई। उसने अपने हाथों से चाय बनाई—ध्यान से, जैसे हर उबाल में कोई एहसास घुल रहा हो। कप में चाय डालते वक्त उसके होंठों पर हल्की मुस्कान थी।
वो चाय लेकर कमरे में आई। अरविंद तैयार हो रहे थे। पूजा ने बिना कुछ कहे उनके सामने कप बढ़ा दिया और पास ही बैठ गई।
आज पहली बार वो उनके इतने करीब बैठी थी… बिना किसी झिझक के।
वो उनसे छोटी-छोटी बातें करने लगी—घर की, शादी की तैयारियों की, बेवजह की भी… लेकिन हर बात में अपनापन था।
अरविंद उसे ध्यान से देख रहे थे। उनके चेहरे पर हल्की हैरानी थी।
"सब ठीक है ना, पूजा?" उन्होंने नरम आवाज में पूछा।
पूजा ने उनकी ओर देखा… आँखों में एक नई चमक थी।
वो कुछ नहीं बोली—बस हल्के से मुस्कुरा दी।
और उस मुस्कान में, शायद पहली बार… एक सच्चा “अपनापन” था।
शाम ढलते ही घर में शादी की तैयारियाँ अपने पूरे रंग में थीं। आँगन में सजी लाइटें टिमटिमा रही थीं, और हर तरफ़ हँसी-खुशी का माहौल था।
पूजा ने अलमारी से अपनी पीली साड़ी निकाली और तैयार होकर आईने के सामने खड़ी हो गई। फिर उसने मुस्कुराते हुए एक कुर्ता-पायजामा निकाला और अरविंद की ओर बढ़ा दिया।
“ये पहन लीजिए…”
अरविंद ने कुर्ते को देखकर हल्का सा आश्चर्य जताया—
“ये मेरा है?”
पूजा ने धीमे से मुस्कुराते हुए कहा—
“हाँ… आज हम दोनों मैचिंग पहनेंगे।”
अरविंद कुछ पल उसे देखते रह गए। उनकी आँखों में एक अलग ही चमक थी, जैसे वो इस बदलाव को महसूस कर रहे हों।
“आज तुम कुछ अलग लग रही हो… क्या बात है?” उन्होंने नरम आवाज़ में पूछा।
पूजा ने धीरे से दरवाज़े की तरफ देखा, फिर उनके पास आकर अपना सिर उनके कंधे पर टिका दिया।
“आपने कल कहा था ना… अगर मैं ‘हाँ’ कहूँ, तो बात और हो जाएगी…”
वो हल्का सा ठहरी, फिर मुस्कुराकर बोली—
“तो… आज मेरी ‘हाँ’ है।”
नीचे रंग-बिरंगी रोशनियाँ झिलमिला रही थीं, हर कोना जगमगा रहा था।
लेकिन असली उजाला तो अब पूजा के दिल में उतर आया था।
जहाँ अब न कोई तुलना थी, न कोई कमी का एहसास…
सिर्फ अपनापन था, सच्चा और सुकून देने वाला।

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