कहने का तरीका
बरामदे में रखी मनी प्लांट की बेल धीरे-धीरे हवा में हिल रही थी, जैसे घर की खामोशी को सहलाने की कोशिश कर रही हो। लेकिन अंदर माहौल कुछ और ही था—तनाव से भरा हुआ।
सुनीता जी रसोई के दरवाज़े पर खड़ी थीं, हाथ में चम्मच और चेहरे पर नाराज़गी साफ दिख रही थी।
“ये क्या तरीका है घर चलाने का? बिना मुझसे पूछे रसोई का पूरा सामान बदल दिया!” उन्होंने ऊँची आवाज़ में कहा।
डाइनिंग टेबल पर बैठे उनके पति राजेश जी ने अखबार से नज़र उठाई और शांत स्वर में बोले,
“अरे भई, क्या हो गया? घर ही तो सजा रही है, अच्छा ही है ना…”
“अच्छा है?” सुनीता जी ने लगभग चिल्लाते हुए कहा, “मेरे इतने सालों से रखे हुए सिस्टम को एक दिन में बदल दिया! मुझे खुद अपनी रसोई में चीज़ें ढूंढनी पड़ रही हैं!”
तभी रसोई से उनकी बहू काव्या बाहर आई। चेहरे पर हल्की झिझक थी, लेकिन आवाज़ में संयम।
“मम्मी जी, मैंने सोचा था कि थोड़ा बदलाव कर दूं, ताकि काम जल्दी हो जाए… और जगह भी साफ-सुथरी लगे।”
“तो क्या मैं गंदगी में रहती थी?” सुनीता जी ने तंज कसते हुए कहा।
काव्या कुछ पल के लिए चुप हो गई। फिर धीरे से बोली,
“नहीं मम्मी जी, मेरा वो मतलब नहीं था…”
राजेश जी ने बीच में ही कहा,
“सुनीता, बात को इतना बढ़ाने की क्या जरूरत है? नई पीढ़ी है, थोड़ा अलग सोचती है…”
“बस! अब आप भी उसकी तरफ हो गए!” सुनीता जी गुस्से में बोलीं और कमरे से बाहर चली गईं।
असल में काव्या की शादी को अभी सिर्फ डेढ़ साल ही हुआ था। शुरुआत में सुनीता जी बड़े प्यार से उसे घर की हर छोटी-बड़ी बात सिखाती थीं—किस समय क्या बनाना है, कौन सा बर्तन कहाँ रखना है, किस चीज़ का कितना ध्यान रखना है। काव्या भी पूरे मन से सब कुछ सीखती थी और हर बात पर खुश होकर “जी मम्मी जी” कहती थी।
लेकिन समय के साथ जैसे-जैसे काव्या ने घर की ज़िम्मेदारियाँ अपने हाथ में लेनी शुरू कीं, वैसे-वैसे सुनीता जी के मन में एक हल्की-सी दर्द पैदा होने लगी। उन्हें महसूस होने लगा कि जिस घर को उन्होंने इतने सालों तक संभाला, अब उसमें उनकी भूमिका धीरे-धीरे कम होती जा रही है। यही एहसास उन्हें भीतर ही भीतर परेशान करने लगा।
अगले दिन सुबह…
सुनीता जी अपने कमरे में कुछ ढूंढ रही थीं।
“हे भगवान! मेरा पुराना गहनों का डिब्बा कहाँ गया?” वो परेशान होकर बड़बड़ा रही थीं।
उन्होंने अलमारी, दराज, यहाँ तक कि बिस्तर के नीचे भी देख लिया, लेकिन डिब्बा कहीं नहीं मिला।
तभी उनका बेटा रोहित अंदर आया।
“क्या हुआ मम्मी? क्या ढूंढ रही हो?”
“क्या बताऊं! इस घर में अब कुछ भी सुरक्षित नहीं है!” सुनीता जी ने गुस्से में कहा।
“मतलब?” रोहित ने पूछा।
“मतलब ये कि तुम्हारी बीवी के आने के बाद से घर का सामान गायब होने लगा है!”
इतना सुनते ही दरवाज़े पर खड़ी काव्या चौंक गई।
“मम्मी जी, आप ये क्या कह रही हैं?” उसकी आवाज़ हल्की कांप रही थी।
“मैं कुछ गलत नहीं कह रही!” सुनीता जी बोलीं, “पहले सब कुछ अपनी जगह पर रहता था, अब कुछ भी नहीं मिलता!”
काव्या ने गहरी सांस ली और धीरे से बोली,
“मम्मी जी, अगर आपको लगता है कि मैं कुछ गलत कर रही हूँ, तो आप सीधे मुझसे कह सकती हैं… लेकिन ऐसे इशारों में बात करना… ये ठीक नहीं है।”
“अब मुझे सिखाएगी?” सुनीता जी ने तुनककर कहा।
तभी राजेश जी भी कमरे में आ गए।
“क्या हुआ फिर से?” उन्होंने पूछा।
रोहित ने पूरी बात बता दी।
राजेश जी ने शांत होकर सुनीता जी से पूछा,
“पहले ये बताओ कि डिब्बा आखिरी बार कहाँ देखा था?”
सुनीता जी थोड़ी देर सोचने लगीं, फिर बोलीं,
“कल शाम… मैंने पूजा के बाद उसे बाहर टेबल पर रखा था…”
राजेश जी मुस्कुराए और बोले,
“तो ज़रा पूजा वाले कमरे में देखो…”
सुनीता जी तुरंत वहाँ गईं… और कुछ ही सेकंड बाद चुपचाप वापस आ गईं। उनके हाथ में वही गहनों का डिब्बा था।
कमरे में सन्नाटा छा गया।
राजेश जी धीरे से बोले,
“देखा? गलती किसी और की नहीं थी…”
सुनीता जी की नजरें झुक गईं। लेकिन उनका अहंकार अभी भी उन्हें रोक रहा था।
काव्या कुछ नहीं बोली। बस चुपचाप रसोई में चली गई।
शाम को…
राजेश जी ने सुनीता जी को समझाते हुए शांत स्वर में कहा—
“देखो सुनीता, घर सिर्फ दीवारों से नहीं बनता… रिश्तों से बनता है। और रिश्ते शब्दों से ही टूटते भी हैं और उन्हीं से जुड़ते भी हैं।”
सुनीता जी चुपचाप उनकी बात सुनती रहीं। उनके चेहरे पर हल्की झिझक और सोच की लकीरें साफ दिखाई दे रही थीं।
राजेश जी ने आगे कहा—
“तुम्हें लगता है कि काव्या तुम्हारी जगह ले रही है… लेकिन सच तो ये है कि वो तुम्हारा सहारा बनना चाहती है, तुम्हारा हाथ बंटाना चाहती है।”
कुछ देर तक कमरे में खामोशी छाई रही।
फिर सुनीता जी धीरे-धीरे उठीं और रसोई की ओर बढ़ गईं।
रसोई में काव्या चुपचाप खाना बना रही थी। उसके चेहरे पर शांति थी, लेकिन मन में हल्की कसक अभी भी बाकी थी।
“काव्या…” सुनीता जी ने धीमी और थोड़ी संकोच भरी आवाज़ में पुकारा।
काव्या ने तुरंत मुड़कर देखा—
“जी मम्मी जी?”
सुनीता जी कुछ पल चुप रहीं, जैसे सही शब्द ढूंढ रही हों। फिर धीरे से बोलीं—
“वो… आज सुबह मैंने जो कहा… उसका मतलब वैसा नहीं था जैसा तुमने समझा…”
काव्या के होंठों पर हल्की मुस्कान आ गई। उसने नरम स्वर में कहा—
“मैं समझ गई मम्मी जी…”
सुनीता जी ने नजरें झुका लीं और थोड़ी रुककर बोलीं—
“और… अगर मेरी बात से तुम्हें दुख पहुँचा हो तो… मुझे माफ कर देना।”
उनकी आवाज़ में अब अहंकार नहीं, बल्कि अपनापन और पछतावा साफ झलक रहा था।
काव्या ने तुरंत आगे बढ़कर कहा—
“अरे नहीं मम्मी जी, आप ऐसा मत कहिए… आप तो मेरी माँ जैसी हैं। आपसे नाराज़ होने का तो सवाल ही नहीं उठता।”
यह सुनकर सुनीता जी की आँखें हल्की नम हो गईं।
उन्होंने धीरे से काव्या के सिर पर हाथ रखा, और उस पल दोनों के बीच की दूरी सच में खत्म हो गई।
उस दिन के बाद घर में बहुत कुछ नहीं बदला…
लेकिन एक चीज़ जरूर बदल गई—बात करने का तरीका।
अब सुनीता जी कुछ भी कहने से पहले सोचती थीं…
और काव्या भी हर बदलाव से पहले उन्हें शामिल करती थी।
सीख:
कभी-कभी समस्या चीज़ों के बदलने से नहीं होती…
बल्कि हमारे सोचने और बोलने के तरीके से होती है।
घर वही रहता है…
बस रिश्तों का नजरिया बदल जाता है।

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