कीमत का सच
बरामदे में रखी लोहे की कुर्सी पर बैठी राधा की आँखें दरवाज़े पर टिकी थीं। शाम ढल रही थी, लेकिन उसके मन में बेचैनी बढ़ती जा रही थी।
अचानक दरवाज़ा खुला।
उसका पति, डॉ. अर्पित, अंदर आया। चेहरे पर थकान थी, लेकिन आँखों में वही पुराना आत्मविश्वास।
“आ गए आप…” राधा ने धीमे से कहा।
“हाँ, आज बहुत काम था…” अर्पित ने बैग रखते हुए जवाब दिया।
राधा कुछ पल चुप रही, फिर बोली— “एक बात पूछूँ?”
“हूँ… पूछो।”
“आप जो करते हैं… वो सही है क्या?”
अर्पित रुक गया।
“क्या मतलब?”
“मतलब… अस्पताल में जो बातें सुनने को मिलती हैं… वो सब झूठ है क्या?”
अर्पित ने हल्की झुंझलाहट से कहा— “राधा, तुम फिर वही शुरू हो गई? ये सब अफवाहें हैं।”
राधा की आँखों में आँसू आ गए— “अफवाहें नहीं हैं अर्पित… लोग कहते हैं कि आप… पैसे के लिए… गलत काम करते हैं…”
“बस!” अर्पित ने तेज़ आवाज़ में कहा—
“मुझे सिखाने की जरूरत नहीं है तुम्हें। मैं डॉक्टर हूँ, मुझे पता है क्या सही है क्या गलत।”
राधा चुप हो गई।
लेकिन उसके मन का डर और गहरा हो गया।
अर्पित शहर का नामी सर्जन था। उसके पास पैसे की कोई कमी नहीं थी। बड़ा घर, गाड़ी, नौकर—सब कुछ था।
लेकिन इस चमक के पीछे एक सच्चाई थी…
वह गैर-कानूनी काम करता था।
गरीब मरीजों के अंग चोरी करना…
बिना बताए ऑपरेशन में “कुछ और” कर देना…
और कभी-कभी… भ्रूण परीक्षण करके बेटियों को खत्म कर देना…
उसके लिए ये सब “काम” था।
और हर काम के पीछे था—पैसा।
राधा कई बार उसे समझाने की कोशिश करती—
“अर्पित, ये सब मत किया करो… ये सही नहीं है… पाप है।”
लेकिन अर्पित हर बार हल्की-सी हँसी के साथ बात टाल देता—
“राधा, तुम भी ना… आज के जमाने में जो सीधा चलता है, वही सबसे पहले कुचला जाता है।
ईमानदारी से सिर्फ पेट भरता है, सपने नहीं पूरे होते… समझी?”
उनकी एक छोटी-सी, बेहद प्यारी बेटी थी—आर्या।
आर्या ही राधा की पूरी दुनिया थी, उसकी हर खुशी का कारण।
हर सुबह राधा बड़े प्यार से उसकी चोटी बनाती, उसे तैयार करके स्कूल भेजती। शाम को जब वह लौटती, तो राधा उसकी हर छोटी-बड़ी बात ध्यान से सुनती। और रात को उसे अपनी गोद में सुलाते हुए मीठी-मीठी कहानियाँ सुनाती।
राधा के लिए उसकी ज़िंदगी का मतलब बस इतना ही था—
“मेरी बेटी मुस्कुराती रहे… बस, सब कुछ ठीक है…”
एक दिन…
आर्या स्कूल से लौटी, लेकिन आज कुछ अलग था।
वो चुप थी।
“क्या हुआ बेटा?” राधा ने पूछा।
“मम्मी… पेट में दर्द हो रहा है…” आर्या ने धीरे से कहा।
राधा घबरा गई।
“अर्पित! जल्दी देखो ना…”
अर्पित ने casually कहा— “कुछ नहीं है, दवा दे दो… ठीक हो जाएगी।”
लेकिन रात तक दर्द बढ़ गया।
आर्या तड़पने लगी।
अब अर्पित भी घबरा गया।
“चलो अस्पताल…”
अस्पताल में जाँच शुरू हुई। मशीनों की बीप-बीप और भागदौड़ के बीच डॉक्टरों के चेहरों पर चिंता साफ झलक रही थी। रिपोर्ट हाथ में आते ही एक सीनियर डॉक्टर धीमे स्वर में बोला—
“सर… मामला थोड़ा गंभीर है… ऑपरेशन करना पड़ेगा, और रिस्क भी है…”
अर्पित कुछ पल के लिए चुप रह गया। सामने अपनी बेटी को उस हालत में देखकर उसका दिल काँप उठा, लेकिन अगले ही क्षण उसने खुद को संभाला।
उसने गहरी साँस ली और दृढ़ आवाज़ में कहा—
“ऑपरेशन मैं खुद करूँगा… मैं अपनी बेटी को कुछ नहीं होने दूँगा…”
उसकी आवाज़ में भरोसा था, लेकिन अंदर कहीं एक डर भी था… जो पहली बार उसे महसूस हो रहा था।
ऑपरेशन थिएटर के बाहर लाल बत्ती जल रही थी। अंदर डॉक्टर अपनी पूरी कोशिश में लगे थे।
समय जैसे थम गया था…
एक-एक मिनट घंटों जैसा लग रहा था।
राधा दरवाज़े के पास खड़ी थी, हाथ जोड़कर बार-बार भगवान से प्रार्थना कर रही थी—
“भगवान… मेरी बच्ची को बचा लो… उसे कुछ मत होने देना… उसकी सारी तकलीफ मुझे दे दो… बस उसे ठीक कर दो…”
उसकी आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे, होंठ काँप रहे थे और दिल में सिर्फ एक ही डर था—
“कहीं मेरी आर्या मुझसे दूर न हो जाए…”
लेकिन…
ऑपरेशन थिएटर का दरवाज़ा खुला।
अर्पित बाहर आया।
उसका चेहरा सफेद पड़ चुका था।
आँखें खाली थीं।
“राधा…”
“क्या हुआ… मेरी आर्या ठीक है ना…?” राधा ने घबराते हुए पूछा।
अर्पित के होंठ काँप रहे थे—
“हम… उसे नहीं बचा पाए…”
राधा की दुनिया वहीं रुक गई।
“नहीं… ये नहीं हो सकता…”
वो अंदर भागी।
आर्या का छोटा सा शरीर… शांत पड़ा था।
जैसे सो रही हो…
लेकिन ये नींद कभी नहीं खुलने वाली थी।
राधा फूट-फूटकर रोने लगी—
“उठो बेटा… देखो मम्मी आई है…”
अर्पित एक कोने में खड़ा था।
आज वो डॉक्टर नहीं था।
बस एक टूटा हुआ पिता था।
तभी…
राधा ने उसकी ओर देखा।
उसकी आँखों में आँसू नहीं थे…
सिर्फ आग थी।
वो धीरे-धीरे उसके पास आई और बोली—
“क्या हुआ डॉक्टर साहब…?”
अर्पित चौंक गया।
“राधा…”
“क्यों रो रहे हो…?” उसकी आवाज़ काँप रही थी—
“निकाल लो ना… अपनी बेटी के भी अंग… बेच दो… अच्छी कीमत मिलेगी…”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
अर्पित के पैरों तले जमीन खिसक गई।
“राधा… ऐसा मत कहो…”
“क्यों ना कहूँ?” वो चीख पड़ी—
“दूसरों के बच्चों के साथ तो यही करते थे ना आप!”
उसके शब्द हथौड़े की तरह गिर रहे थे—
“जब मैं रोकती थी, तब कहते थे—‘किसी को क्या पता चलेगा’…
आज बता दूँ? भगवान को सब पता होता है…”
अर्पित रो पड़ा।
आज पहली बार… सच में।
उसे हर वो चेहरा याद आने लगा…
हर वो माँ… हर वो चीख…
“मैं… मैं क्या बन गया…” उसने खुद से कहा।
उस दिन…
अर्पित ने फैसला लिया।
उसने अपने सारे गलत काम बंद कर दिए।
खुद पुलिस के सामने जाकर सब कबूल किया।
लोगों ने कहा—“पागल हो गया है…”
लेकिन अर्पित जानता था—
ये सज़ा नहीं…
ये प्रायश्चित है।
राधा आज भी अपनी बेटी को याद करती है।
लेकिन अब उसकी आँखों में एक सच्चाई है—
“गलत रास्ते से कमाया गया पैसा… कभी खुशी नहीं देता।”
सीख:
कभी भी लालच के लिए इंसानियत को मत छोड़ो।
क्योंकि कर्मों का हिसाब… एक दिन जरूर होता है।

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