बेटी का आना

 

Emotional Indian family moment with woman holding bag of gifts and money, expressing guilt and realization in a modest home


आंगन में शाम की हल्की धूप उतर रही थी। हवा में ठंडक थी, लेकिन घर के अंदर माहौल कुछ भारी-सा था।


रीना रसोई में खड़ी बर्तन धो रही थी, लेकिन उसके चेहरे पर थकान और चिड़चिड़ापन साफ दिख रहा था। हर प्लेट के साथ जैसे उसकी झुंझलाहट भी टकरा रही थी।


तभी उसके पति अजय ने कमरे से आवाज लगाई—

“सुनो रीना, कल सुबह राधा आ रही है… स्टेशन से लेने जाना है मुझे।”


रीना के हाथ रुक गए। उसने धीरे से मुड़कर देखा, फिर बिना कुछ कहे वापस बर्तन धोने लगी। लेकिन उसके चेहरे के भाव बदल चुके थे।


कुछ देर बाद वह खुद ही बड़बड़ाने लगी—

“अभी आने का समय मिला है उसे… बच्चों की फीस भरनी है, राशन का खर्चा बढ़ा हुआ है… ऊपर से पिताजी की दवाइयां… और अब मेहमानदारी भी करो…”


अजय चुप रहा। वह जानता था कि रीना का स्वभाव कैसा है। घर की जिम्मेदारियों का बोझ उसे अंदर ही अंदर कठोर बना चुका था।


अगले दिन सुबह अजय स्टेशन गया और अपनी छोटी बहन राधा को लेकर घर लौटा।


राधा के चेहरे पर वही मासूम मुस्कान थी, लेकिन आंखों में हल्की थकान भी थी।


“भैया…”

उसने जैसे ही अजय को देखा, उसकी आंखें भर आईं।


घर पहुंचते ही उसने रीना के पैर छुए—

“कैसी हैं भाभी?”


रीना ने हल्की-सी मुस्कान दी—

“ठीक हूं… तुम बताओ।”


राधा समझ गई थी… सब कुछ पहले जैसा नहीं रहा।


उस दिन घर में सब सामान्य था, लेकिन एक अजीब-सी दूरी बनी रही।

रीना ने खाना बनाया, सबने खाया… पर उस खाने में अपनापन कम और औपचारिकता ज्यादा थी।


मां का मन था कि बेटी के लिए उसकी पसंद का हलवा बनाए, लेकिन रीना के तेवर देखकर वह चुप रह गई।


राधा ने भी कुछ नहीं कहा।

बस मुस्कुराती रही… जैसे सब समझ रही हो।


रात को वह देर तक छत पर बैठी रही।

चांद को देखती रही… और शायद अपने बचपन को याद करती रही।


अगली सुबह उसने जल्दी उठकर अपना बैग पैक किया।


अजय ने हैरानी से पूछा—

“अरे इतनी जल्दी? एक-दो दिन और रुक जाती…”


राधा मुस्कुरा दी—

“भैया, बस मन था… मिल लिया, अब अच्छा लग रहा है।”


जाते-जाते उसने बस इतना कहा—

“अपना और भाभी का ध्यान रखना…”


और चली गई।


घर फिर से पहले जैसा हो गया…

खामोश… अपने काम में व्यस्त।


शाम को जब अजय कमरे में गया तो उसकी नजर एक बैग पर पड़ी।


“अरे ये तो राधा का बैग है…”

उसने तुरंत रीना को बुलाया।


रीना ने बैग खोला…

अंदर कुछ कपड़े थे, बच्चों के लिए छोटे-छोटे खिलौने… और एक लिफाफा।


लिफाफा खोलते ही उसके हाथ कांप गए।


उसमें कुछ पैसे थे… और एक कागज।


अजय ने कागज पढ़ना शुरू किया—


“भैया,

ये कुछ कपड़े और खिलौने बच्चों के लिए हैं…

और थोड़े पैसे मां-पिताजी के लिए…


मैं जानती हूं, अगर सामने देती तो आप मना कर देते…

इसलिए चुपचाप रखकर जा रही हूं।


हमेशा आपसे लिया है…

पहली बार कुछ दे रही हूं…

मना मत करना।


आपकी छोटी बहन,

राधा।”


अजय की आवाज भर्रा गई।

उसकी आंखों में आंसू आ गए।


वह धीरे से बोला—

“मेरी छोटी बहन… कितनी बड़ी हो गई…”


रीना वहीं खड़ी थी।

उसके हाथ अब भी कांप रहे थे।


उसे याद आ रहा था…

कल उसने कितनी बातें कही थीं…

कितना सोचा था उसने राधा के बारे में…


और राधा…

वो तो चुपचाप सबके लिए उपहार छोड़ गई।


रीना की आंखों से भी आंसू बहने लगे।


वह धीरे से बैठ गई…

और पहली बार उसे अपने शब्दों का बोझ महसूस हुआ।


अजय छत की तरफ देख रहा था।


उसके मन में एक ही बात घूम रही थी—


“बेटियां मायके आकर क्या ले जाती हैं…?

वो तो बस अपने हिस्से का प्यार लेने आती हैं…

और जाते-जाते चुपचाप अपना सब कुछ छोड़ जाती हैं…”


घर में सन्नाटा था…

लेकिन उस सन्नाटे में एक गहरी सीख छुपी थी।




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