सीमा की रेखा

 

Husband, wife and elderly father in a tense family discussion at home


कमरे के बीचों-बीच रखी डाइनिंग टेबल पर प्लेटें सजी थीं, लेकिन खाने की खुशबू के बावजूद माहौल में एक अजीब सी कड़वाहट घुली हुई थी।


"मैं अब और नहीं सह सकती, रोहित," नंदिनी ने धीमी लेकिन साफ आवाज़ में कहा। "या तो यह सब बदलेगा… या मैं चली जाऊंगी।"


रोहित का हाथ हवा में ही रुक गया। कौर उसके हाथ में था, लेकिन भूख जैसे गायब हो चुकी थी।


"इतनी सी बात पर घर छोड़ दोगी?" उसने हल्के गुस्से और हैरानी के साथ कहा।


नंदिनी हंसी—एक कड़वी हंसी।

"तुम्हें सच में लगता है यह ‘इतनी सी बात’ है?"


टेबल के दूसरी तरफ बैठे रोहित के पिता, महेंद्र जी, चुपचाप खाना खाते रहे। जैसे यह सब उनके लिए कोई मायने ही नहीं रखता।


असल परेशानी भी वही थे।


महेंद्र जी रिटायर होकर बेटे के साथ रहने आए थे। शुरू में सब ठीक था। लेकिन धीरे-धीरे उनका व्यवहार बदलने लगा।


नंदिनी के हर काम में टोकना—

"रोटी गोल नहीं बनी…"

"बच्चों को ठीक से नहीं संभालती…"

"आजकल की औरतें बस फोन चलाना जानती हैं…"


पहले नंदिनी ने नजरअंदाज किया। फिर समझाने की कोशिश की। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई।


एक दिन उन्होंने नंदिनी के मायके वालों के बारे में भी ताना मार दिया—

"तुम्हारे घर वालों ने तुम्हें कोई संस्कार नहीं दिए क्या?"


उस दिन नंदिनी चुप नहीं रही।

लेकिन रोहित… वो फिर भी चुप रहा।


और यही चुप्पी आज इस मोड़ तक ले आई थी।



रोहित रात भर जागता रहा।


उसे याद आया—

कैसे नंदिनी ने इस घर को अपना समझकर सब कुछ संभाला था।

कैसे उसने उसकी माँ के गुजर जाने के बाद घर की जिम्मेदारी उठाई थी।

कैसे बच्चों की हर छोटी-बड़ी जरूरत का ख्याल रखा था।


और अब… वही नंदिनी इस घर में खुद को ‘अजनबी’ महसूस कर रही थी।


रोहित समझ गया था—

यह लड़ाई किसी एक इंसान की नहीं थी।

यह घर के माहौल की थी।



अगले दिन, जब महेंद्र जी अखबार पढ़ रहे थे, रोहित उनके सामने जाकर खड़ा हो गया।


"पापा, मुझे आपसे बात करनी है।"


महेंद्र जी ने चश्मा नीचे किया।

"हां, बोलो।"


रोहित ने गहरी सांस ली।

"पापा, यह घर हम सबका है। लेकिन इसमें किसी का अपमान नहीं होना चाहिए… खासकर नंदिनी का।"


महेंद्र जी के चेहरे पर हल्की नाराजगी आई।

"तो अब बहू की तरफदारी करोगे तुम?"


"नहीं पापा," रोहित शांत था, लेकिन उसकी आवाज़ मजबूत थी।

"मैं सही की तरफदारी कर रहा हूं।"


कमरे में सन्नाटा छा गया।


"अगर नंदिनी इस घर में खुश नहीं है… तो यह घर घर नहीं रह जाता।"


महेंद्र जी अब पूरी तरह गुस्से में आ गए।

"तो क्या चाहता है? मैं चला जाऊं?"


रोहित कुछ पल चुप रहा।

फिर बोला—


"मैं चाहता हूं कि आप रहें… लेकिन सम्मान के साथ।

और अगर यह संभव नहीं है… तो फिर हमें अलग रहना होगा।"


यह शब्द कहना आसान नहीं था।

लेकिन रोहित ने कह दिया।



महेंद्र जी कुछ देर तक कुछ नहीं बोले।


फिर धीरे से उठे… और अपने कमरे में चले गए।


उस दिन घर में किसी ने खाना नहीं खाया।



शाम को जब रोहित कमरे में गया, तो उसने देखा—

महेंद्र जी अपना सामान समेट रहे थे।


"पापा…"


महेंद्र जी रुके नहीं।

"मैं बोझ नहीं बनना चाहता, रोहित।"


रोहित की आंखें भर आईं।

"आप बोझ नहीं हैं पापा… लेकिन आपका व्यवहार… वह हमें तोड़ रहा था।"


महेंद्र जी ने पहली बार उसकी तरफ देखा।


उनकी आंखों में गुस्सा नहीं था…

बस एक गहरी थकान थी।


"शायद… मैं अकेलेपन से हार गया था," उन्होंने धीमे से कहा।

"तुम्हारी मां के जाने के बाद… मुझे समझ ही नहीं आया कि कैसे जीना है।"


रोहित चुप रहा।


"मैं गलत था," महेंद्र जी ने स्वीकार किया।


यह सुनना आसान नहीं था।

लेकिन जरूरी था।



अगले दिन कोई कहीं नहीं गया।


महेंद्र जी ने अपना बैग वापस रख दिया।


नाश्ते की टेबल पर पहली बार उन्होंने खुद कहा—

"नंदिनी, आज चाय बहुत अच्छी बनी है।"


नंदिनी ने आश्चर्य से उनकी तरफ देखा।

फिर हल्की मुस्कान दे दी।



धीरे-धीरे घर का माहौल बदलने लगा।


महेंद्र जी अब बच्चों के साथ खेलने लगे।

नंदिनी के काम में मदद करने लगे।

और सबसे जरूरी—

बोलने से पहले सोचने लगे।



एक दिन नंदिनी ने रोहित से कहा—

"तुमने उस दिन जो किया… उससे सिर्फ घर नहीं बचा… रिश्ते भी बच गए।"


रोहित मुस्कुराया।

"कभी-कभी दीवार खड़ी करनी पड़ती है… ताकि छत गिरने से बच सके।"


घर अब पहले जैसा नहीं था।


वह उससे बेहतर था।


क्योंकि अब वहां सिर्फ रिश्ते नहीं थे…

बल्कि उनके बीच सम्मान की एक साफ सीमा रेखा भी थी।




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