सही के लिए खड़ी एक बहू
दरवाज़े के बाहर खड़ी रश्मि ने गहरी सांस ली… फिर धीरे से घंटी दबाई।
अंदर से हंसी-ठिठोली की आवाज़ें आ रही थीं—नई बहू के स्वागत की तैयारियाँ चल रही थीं। घर रोशनी से जगमगा रहा था, जैसे हर दीवार खुशियों से भरी हो… लेकिन रश्मि के मन में अजीब सा खालीपन था।
दरवाज़ा खुला।
सामने उसकी सास खड़ी थीं।
उन्होंने ऊपर से नीचे तक रश्मि को देखा—
“आ ही गई महारानी… टाइम मिला आपको?”
रश्मि ने हल्की मुस्कान के साथ उनके पैर छुए—
“जी माँ जी…”
“छोड़ो ये सब, अंदर जाओ… मेहमान बैठे हैं। और हाँ, जरा ठीक से रहना, आज नई बहू का पहला दिन है… कोई कमी नहीं होनी चाहिए।”
रश्मि चुपचाप अंदर चली गई।
ड्राइंग रूम में रिश्तेदार बैठे थे, हंसी-मजाक चल रहा था। बीच में नई बहू—निधि—लाल साड़ी में सजी बैठी थी, चेहरे पर झिझक और आँखों में नए सपनों की चमक।
रश्मि को उसे देखकर अपना पहला दिन याद आ गया…
वही साड़ी, वही झिझक, वही उम्मीदें…
“रश्मि! इधर आओ,” सास की आवाज़ आई।
“ये है हमारी बड़ी बहू… घर की सारी जिम्मेदारी संभालती है,” उन्होंने मेहमानों से कहा।
रश्मि ने सबको नमस्ते किया और तुरंत किचन की तरफ बढ़ गई।
रसोई में पहुंचते ही उसने पल्लू ठीक किया और काम में लग गई—चाय बनाना, नाश्ता तैयार करना, प्लेट सजाना…
जैसे उसका होना सिर्फ काम करने तक सीमित हो।
पीछे से ननद की आवाज़ आई—
“भाभी, जरा जल्दी करना… मेहमान इंतज़ार कर रहे हैं।”
“जी…” रश्मि ने धीमे से कहा।
काम करते-करते उसकी नजर खिड़की से बाहर गई… और यादों का दरवाज़ा खुल गया।
चार साल पहले…
रश्मि पहली बार इस घर में आई थी।
दिल में ढेर सारे सपने थे—अपने घर को अपना बनाने के, सबका प्यार पाने के।
पहले कुछ दिन सब ठीक था।
सास मुस्कुराती थीं, ससुर हाल पूछते थे, पति अर्जुन तो जैसे हर वक्त उसके साथ रहते थे।
रश्मि को लगा—उसकी जिंदगी सच में बदल गई है।
लेकिन धीरे-धीरे चीजें बदलने लगीं।
“इतना समय क्यों लगा खाना बनाने में?”
“हमारे घर के तरीके अलग हैं…”
“बहू को ये सब तो आना ही चाहिए…”
छोटी-छोटी बातों पर ताने शुरू हो गए।
रश्मि ने खुद को समझाया—
“नया घर है… सब सीख जाऊंगी।”
वह सुबह सबसे पहले उठती, रात सबसे बाद में सोती।
सबकी पसंद का खाना, सबकी जरूरतों का ख्याल…
लेकिन उसके हिस्से में आया—
सिर्फ “कमियाँ निकालना।”
सबसे ज्यादा तकलीफ तब होती जब अर्जुन कुछ नहीं कहते।
एक दिन रश्मि ने हिम्मत करके पूछा—
“अर्जुन, क्या मैं इतनी गलत हूँ?”
अर्जुन ने फोन से नजर उठाए बिना कहा—
“माँ को खुश रखना मुश्किल नहीं है… बस थोड़ा एडजस्ट कर लो।”
वही शब्द—“एडजस्ट”—रश्मि के कानों में गूंजता रह गया।
कुछ महीनों बाद…
रश्मि को अपने मायके जाने की इच्छा हुई।
उसने सास से कहा—
“माँ जी, मैं दो दिन के लिए घर जाना चाहती हूँ…”
सास ने बिना उसकी तरफ देखे कहा—
“अभी बहुत काम है… बाद में देखेंगे।”
रश्मि चुप रह गई।
कुछ दिन बाद फिर पूछा—
“माँ जी, अब जा सकती हूँ?”
“इतनी जल्दी क्या है? शादी के बाद लड़की का घर यही होता है।”
हर बार वही जवाब।
रश्मि की आँखें भर आतीं… लेकिन वो चुप रहती।
एक दिन उसने अर्जुन से कहा—
“मुझे माँ-पापा की बहुत याद आ रही है…”
अर्जुन ने कहा—
“मैं बात कर लूंगा… तुम टेंशन मत लो।”
लेकिन वो “बात” कभी नहीं हुई।
एक दिन…
रश्मि ने ठान लिया।
उसने सुबह जल्दी उठकर सारा काम निपटाया और तैयार हो गई।
जैसे ही वो बाहर निकलने लगी, सास ने रोक लिया—
“कहाँ जा रही हो?”
“मायके…”
“किससे पूछकर?”
बस… यही सवाल रश्मि के अंदर जमा सारे दर्द को बाहर ले आया।
“क्या अपने माँ-पापा से मिलने के लिए भी इजाजत चाहिए?” उसकी आवाज़ कांप रही थी, लेकिन शब्द मजबूत थे।
घर में सन्नाटा छा गया।
ससुर गुस्से में बोले—
“बहुत जुबान चलने लगी है तुम्हारी!”
रश्मि ने पहली बार आँख उठाकर कहा—
“जुबान नहीं… बस अपने हक की बात कर रही हूँ।”
अर्जुन वहीं खड़ा था… लेकिन कुछ नहीं बोला।
उस दिन रश्मि मायके चली गई।
कुछ दिन बाद अर्जुन उसे लेने आया।
“चलो वापस…”
रश्मि ने शांत स्वर में कहा—
“एक शर्त पर…”
“क्या?”
“मुझे अपने माँ-पापा से मिलने के लिए कभी इजाजत नहीं लेनी पड़ेगी… और कोई उनका अपमान नहीं करेगा।”
अर्जुन चुप रहा।
रश्मि ने कहा—
“अगर ये नहीं हो सकता… तो मैं वापस नहीं आऊंगी।”
वर्तमान में…
“भाभी! चाय तैयार हुई?” ननद की आवाज़ ने रश्मि को वर्तमान में खींच लिया।
“हाँ…” उसने ट्रे उठाई।
जब वो बाहर आई, तो उसकी नजर नई बहू निधि पर पड़ी।
निधि मुस्कुरा रही थी… बिल्कुल वैसे ही जैसे कभी रश्मि मुस्कुराती थी।
रश्मि उसके पास गई और धीरे से बोली—
“अगर कभी लगे कि तुम अकेली हो… तो समझ लेना, तुम अकेली नहीं हो।”
निधि ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।
रश्मि मुस्कुरा दी।
अब बहुत कुछ बदल चुका था।
अर्जुन ने समय के साथ समझना शुरू किया था। वो अब उसके साथ खड़ा होने लगा था।
घर पूरी तरह नहीं बदला था…
लेकिन रश्मि बदल गई थी।
अब वो चुप नहीं रहती थी।
सम्मान से रहती थी… और सम्मान मांगती भी थी।
उसने ट्रे रखते हुए सोचा—
“अच्छी बहू बनने की कोशिश में…
खुद को खो देना जरूरी नहीं होता।”
आज वो सिर्फ इस घर की बहू नहीं थी…
वो अपनी पहचान खुद बना चुकी थी।

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