सास नहीं, मां का साया

 

Caring Indian mother-in-law helping her sick daughter-in-law sit in warm sunlight, showing love and family support in a traditional home


दोपहर की हल्की धूप आंगन में उतर रही थी। हवा में ठंडक थी, लेकिन घर के अंदर एक अलग ही सुकून भरा माहौल था।


कविता अपने कमरे में बिस्तर पर लेटी हुई थी। उसके माथे पर हल्का बुखार था और शरीर में दर्द की वजह से वह बहुत कमजोर महसूस कर रही थी। आंखें बंद थीं, लेकिन नींद नहीं आ रही थी।


तभी दरवाज़ा धीरे से खुला।


उसकी सास, शारदा जी, अंदर आईं। उनके हाथ में पानी का गिलास और दवाई थी।


“बहू, उठो थोड़ा… दवाई ले लो,” उन्होंने प्यार से कहा।


कविता ने आंखें खोलीं और धीरे से उठने की कोशिश की, लेकिन कमजोरी के कारण वह ठीक से बैठ भी नहीं पा रही थी।


शारदा जी तुरंत उसके पास बैठ गईं और उसे सहारा देकर बैठाया।


“इतनी तबीयत खराब है, पहले क्यों नहीं बताया?” उन्होंने हल्की चिंता के साथ पूछा।


कविता धीमे से बोली, “सोचा ठीक हो जाएगा… आपको परेशान नहीं करना चाहती थी।”


शारदा जी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,

“परेशानी कैसी बहू? तुम इस घर की बेटी जैसी हो।”


कविता की आंखें हल्की-सी नम हो गईं।


दवाई लेने के बाद शारदा जी बोलीं,

“चलो, थोड़ी देर बाहर धूप में बैठते हैं। अच्छा लगेगा।”


उन्होंने कविता को धीरे-धीरे सहारा देकर आंगन में लाकर कुर्सी पर बैठाया। फिर अंदर जाकर उसके लिए अदरक वाली चाय और उसके पसंदीदा नमकीन लाईं।


चाय की खुशबू से कविता के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।


“आपको कैसे पता कि मेरा मन चाय का कर रहा था?” उसने पूछा।


शारदा जी मुस्कुरा दीं,

“इतने सालों में इतना तो समझ ही गई हूं।”


दोनों साथ बैठकर चाय पीने लगीं।


तभी सामने वाले घर की सीमा आंटी ने यह सब देखा और मुस्कुराते हुए आवाज लगाई,

“अरे शारदा जी, आज तो आप बहू की पूरी सेवा कर रही हैं!”


शारदा जी हंसते हुए बोलीं,

“अरे भई, तबीयत खराब है उसकी, तो देखभाल तो करनी ही पड़ेगी।”


सीमा आंटी थोड़ी हैरानी से बोलीं,

“हमारे जमाने में तो ऐसा नहीं होता था। सास तो कभी आराम नहीं करने देती थी।”


शारदा जी ने कप नीचे रखते हुए कहा,

“तो क्या हम भी वही दोहराएं जो पहले होता आया है?”


सीमा आंटी चुप हो गईं।


शारदा जी आगे बोलीं,

“अगर बहू इस घर को अपना मानकर सब कुछ संभालती है, तो उसकी तबीयत खराब होने पर उसका ख्याल रखना भी तो हमारा फर्ज है।”


कविता यह सब सुन रही थी। उसके दिल में अपनी सास के लिए और भी सम्मान बढ़ गया।


कुछ देर बाद शारदा जी उसे अंदर ले आईं और बोलीं,

“तुम आराम करो, मैं रसोई संभाल लेती हूं।”


कविता बोली,

“नहीं मां, मैं कर लूंगी…”


शारदा जी ने प्यार से उसे रोकते हुए कहा,

“अभी नहीं… अभी तुम सिर्फ आराम करोगी।”


कविता चुपचाप लेट गई।


शाम होने लगी।


थोड़ी देर बाद कविता की नींद खुली तो उसने देखा कि शारदा जी चुपचाप उसके कमरे में आईं और उसके माथे पर हाथ रखकर तापमान देख रही थीं।


“अब थोड़ा ठीक लग रहा है?” उन्होंने पूछा।


कविता ने मुस्कुराते हुए कहा,

“हां मां… अब काफी अच्छा लग रहा है।”


शारदा जी ने राहत की सांस ली।


अगले दिन कविता की तबीयत काफी बेहतर हो गई थी। वह रसोई में काम करने लगी।


तभी शारदा जी अंदर आईं और बोलीं,

“अरे, अभी क्यों काम कर रही हो? आराम करो थोड़ा और।”


कविता मुस्कुराकर बोली,

“अब मैं ठीक हूं… और वैसे भी, आपने जो मेरा ख्याल रखा… उसका थोड़ा सा तो कर्ज उतारना बनता है।”


शारदा जी ने तुरंत कहा,

“रिश्तों में कर्ज नहीं होता बहू… सिर्फ प्यार होता है।”


कविता की आंखें भर आईं। वह आगे बढ़ी और अपनी सास के गले लग गई।


दरवाजे पर खड़ी सीमा आंटी यह सब देख रही थीं।


उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा,

“सच में शारदा जी… आपने तो सास-बहू के रिश्ते की परिभाषा ही बदल दी।”


शारदा जी ने जवाब दिया,

“नहीं बहन जी… बस थोड़ा सा नजरिया बदल दिया है।”


आंगन में हल्की धूप फिर से फैल रही थी…

लेकिन इस बार उस धूप में सिर्फ गर्माहट नहीं,

बल्कि रिश्तों की सच्ची मिठास भी घुली हुई थी।




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