अब और नहीं!

 

Indian woman standing up against domestic violence in a tense family confrontation


ठंडी हवा में उड़ती धूल जैसे पुराने दर्द की परतों को छेड़ रही थी, और उसी घर के अंदर एक रिश्ता धीरे-धीरे अपनी आख़िरी सीमा तक पहुँच चुका था।


काव्या खिड़की के पास खड़ी थी। नीचे सड़क पर लोग अपने-अपने काम में व्यस्त थे, लेकिन उसके मन में जैसे सब कुछ रुक गया था।


शादी को अभी आठ महीने हुए थे।


शुरुआत में सब कुछ ठीक लगा था। आदित्य पढ़ा-लिखा, समझदार और हंसमुख लगता था। शादी के बाद कुछ दिन तो उसने काव्या का बहुत ख्याल भी रखा।


लेकिन धीरे-धीरे उसका असली स्वभाव सामने आने लगा।


आदित्य का गुस्सा बहुत तेज था।


इतना तेज कि छोटी-सी बात पर भी वह अपना आपा खो बैठता था।


पहली बार जब उसने काव्या पर हाथ उठाया था, तो वजह सिर्फ इतनी थी कि चाय में चीनी थोड़ी कम थी।


काव्या हैरान रह गई थी।


उसे यकीन ही नहीं हुआ कि जिस इंसान के साथ उसने पूरी जिंदगी बिताने का फैसला किया है, वही इंसान उसे इस तरह चोट पहुंचा सकता है।


उस दिन के बाद आदित्य ने माफी भी मांगी थी।


“मुझसे गलती हो गई… गुस्से में था,” उसने कहा था।


और काव्या ने भी सोच लिया—चलो, एक बार की बात है।


लेकिन वो एक बार कभी एक बार नहीं रहा।


धीरे-धीरे हर हफ्ते, फिर हर दूसरे दिन, और फिर लगभग रोज़ की बात हो गई।


कभी खाने को लेकर, कभी घर के काम को लेकर, कभी उसके पहनावे को लेकर… कोई भी वजह काफी थी।


और हर बार वही सिलसिला—गुस्सा, हाथ उठाना, और फिर माफी।


घरवालों का रवैया भी कुछ अलग नहीं था।


सास कहती—

“पति है, थोड़ा बहुत तो चलता है।”


ननद समझाती—

“भैया का स्वभाव ऐसा ही है, तुम प्यार से समझाया करो।”


ससुर हमेशा चुप रहते।


काव्या को धीरे-धीरे समझ आ गया था कि इस घर में उसकी आवाज़ की कोई कीमत नहीं है।


वह कई बार अपने मायके जाने के बारे में सोचती, लेकिन फिर खुद को रोक लेती।


“शादी निभानी होती है,” यही सोचकर वह हर बार चुप हो जाती।


लेकिन इंसान की सहने की भी एक सीमा होती है।


और वो सीमा धीरे-धीरे खत्म हो रही थी।


एक दिन आदित्य के कुछ दोस्त घर आए हुए थे।


काव्या ने पूरे मन से सबका स्वागत किया। चाय बनाई, नाश्ता तैयार किया, सबके साथ हँसकर बात भी की।


उसके चेहरे पर मुस्कान थी, लेकिन दिल के अंदर दर्द छिपा हुआ था।


जब दोस्त चले गए, तब घर में फिर वही खामोशी छा गई।


आदित्य कमरे में आया।


उसके चेहरे पर गुस्सा साफ दिख रहा था।


“बहुत हँस रही थी ना तुम उनके साथ?” उसने ताना मारा।


काव्या चौंक गई—

“मैं तो बस… मेहमान थे, इसलिए—”


उसकी बात पूरी होने से पहले ही आदित्य ने जोर से उसका हाथ पकड़ लिया।


“बहुत खुलकर बात करने लगी हो तुम!”


इस बार काव्या का हाथ छुड़ाते हुए दिल भी जैसे भर गया।


“मैंने क्या गलत किया?” उसने पहली बार पलटकर पूछा।


बस इतना सुनना था कि आदित्य का गुस्सा और बढ़ गया।


उसने काव्या को धक्का दिया।


काव्या पीछे की ओर लड़खड़ा गई।


और उसी पल… कुछ बदल गया।


अबकी बार वह रोई नहीं।


अबकी बार वह चुप नहीं रही।


वह तुरंत उठी, और पूरी ताकत से बोली—


“बस! बहुत हो गया!”


उसकी आवाज़ इतनी तेज थी कि पूरे घर में गूंज गई।


सास, ससुर और ननद तुरंत बाहर आ गए।


“क्या हुआ?” सास ने घबराकर पूछा।


काव्या बाहर आई।


उसकी आँखों में आँसू नहीं थे… आग थी।


“आज के बाद अगर इन्होंने मुझ पर हाथ उठाया, तो मैं भी चुप नहीं रहूँगी,” उसने साफ शब्दों में कहा।


घर वाले हैरान रह गए।


“ये कैसी बातें कर रही हो बहू?” सास बोली।


काव्या ने सीधे उनकी तरफ देखा—

“मम्मी जी, जब आपका बेटा मुझे मारता था, तब आपको ये ‘पति-पत्नी का मामला’ लगता था। आज मैंने आवाज़ उठाई, तो आपको गलत लग रहा है?”


ससुर नजरें झुका कर खड़े रहे।


ननद चुप थी।


काव्या आगे बोली—

“मैंने शादी इज्जत के लिए की थी, अपमान के लिए नहीं। अगर इन्हें गुस्सा आता है, तो ये अपनी माँ-बहन पर हाथ क्यों नहीं उठाते? सिर्फ मुझ पर ही क्यों?”


पूरा घर शांत हो गया।


आदित्य पहली बार निरुत्तर था।


उसके पास कोई जवाब नहीं था।


काव्या ने आखिरी बार कहा—

“या तो ये अपने गुस्से पर काबू करना सीखें… या फिर मैं अपने लिए दूसरा रास्ता चुन लूँगी।”


इतना कहकर वह अंदर चली गई।


उस रात घर में कोई आवाज़ नहीं आई।


अगले दिन भी माहौल भारी था।


आदित्य पहली बार काव्या से नजरें नहीं मिला पा रहा था।


उसे समझ आ गया था कि अब बात पहले जैसी नहीं रही।


काव्या अब डरने वाली नहीं थी।


दिन बीतते गए।


धीरे-धीरे आदित्य का व्यवहार बदलने लगा।


अब वो गुस्सा करता भी, तो खुद को रोक लेता।


कई बार वह कमरे से बाहर चला जाता, ताकि बात बढ़े नहीं।


एक दिन उसने खुद काव्या से कहा—

“मैं सच में बदलने की कोशिश कर रहा हूँ…”


काव्या ने शांत स्वर में कहा—

“कोशिश नहीं… आदत बदलनी होगी।”


आदित्य ने सिर झुका लिया।


वक्त के साथ चीज़ें सच में बदलने लगीं।


अब घर में चीखने-चिल्लाने की आवाज़ कम हो गई थी।


रिश्ते में पहली बार एक सम्मान आ रहा था।


क्योंकि अब काव्या ने खुद को खोया नहीं था…


बल्कि खुद को पहचान लिया था।


और जब इंसान खुद की कीमत समझ लेता है,

तब दुनिया भी उसे उसी नजर से देखने लगती है।




No comments

Note: Only a member of this blog may post a comment.

Powered by Blogger.