अक्ल से जीती बहू
गाँव के एक बड़े घर में कमला देवी अपने रोब और सख्त स्वभाव के लिए जानी जाती थीं। उनके घर में उनकी बहू रीमा नई-नई आई थी—सीधी, समझदार और बहुत शांत।
शुरू के कुछ दिन तो सब ठीक चला, लेकिन धीरे-धीरे कमला देवी का असली स्वभाव सामने आने लगा।
“बहू, ये कर… बहू, वो कर…” सुबह से रात तक रीमा काम में लगी रहती।
घर में जब भी कोई मेहमान आता, कमला देवी रीमा को और ज्यादा काम दे देतीं—जैसे उसे परख रही हों।
एक दिन घर में पूजा रखी गई।
कमला देवी ने पूरे मोहल्ले में न्योता दे दिया। करीब 25–30 लोग आने वाले थे।
रीमा सुबह से ही रसोई में लगी थी—सब्जी, पूड़ी, मिठाई, चाय… सब कुछ अकेले संभाल रही थी।
तभी उसने बाहर देखा— कमला देवी अपनी सहेलियों के साथ हँसते-बतियाते बैठी थीं।
रीमा ने सोचा— “अगर मैं अकेले सब करूंगी, तो मैं थक जाऊँगी… और काम भी सही से नहीं होगा।”
उसने एक तरकीब सोची।
रीमा मुस्कुराते हुए बाहर गई और बोली—
“अरे आंटी जी, आप लोग तो इतने अच्छे से बैठे हैं… एक छोटा सा काम कर देंगी तो मुझे बहुत मदद मिल जाएगी।”
सहेलियाँ बोलीं— “हाँ-हाँ बेटा, बोलो क्या करना है?”
रीमा एक बड़ी टोकरी में मटर लेकर आई और बोली— “बस ये मटर छील दीजिए… मैं तब तक आप सबके लिए गरमा-गरम चाय और नाश्ता बना देती हूँ।”
सब खुश हो गईं— “अरे इसमें क्या है! हम कर देंगे।”
कमला देवी दूर से यह सब देख रही थीं। उन्हें थोड़ा गुस्सा भी आया, लेकिन कुछ बोली नहीं।
थोड़ी देर में पूरा मटर छिल गया। रीमा ने सबको चाय-नाश्ता दिया।
सब उसकी तारीफ करने लगीं— “बहू तो बहुत समझदार है।”
कुछ ही देर में रिश्तेदार एक-एक करके आने लगे।
रीमा ने मुस्कुराते हुए सबका स्वागत किया और बड़े ही प्यार से सबको छोटे-छोटे काम सौंपने लगी—
“दीदी, आप ज़रा फल काट दीजिए…”
“भैया, आप ये फूलों की सजावट कर दीजिए…”
“चाची, आप रोटियाँ सेंकने में मेरी मदद कर दीजिए…”
उसने इस तरह से हर किसी को थोड़ा-थोड़ा काम दे दिया कि किसी पर ज़्यादा बोझ भी नहीं पड़ा और सारा काम आसानी से जल्दी पूरा होने लगा।
कमला देवी को यह बिल्कुल पसंद नहीं आया।
उन्होंने अपनी बेटी पूजा को इशारे से अपने कमरे में बुलाया और धीमे लेकिन नाराज़ स्वर में बोलीं—
“देखो ज़रा अपनी भाभी को… खुद तो कुछ करती नहीं है, और पूरे घर में सबको काम बाँट रही है।”
पूजा ने भी हामी भरते हुए कहा— “सही कह रही हो मम्मी, मुझे भी ये बिल्कुल अच्छा नहीं लगा।”
दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा और मन ही मन तय कर लिया कि सही समय आने पर रीमा को इस बात के लिए ज़रूर सुनाएँगी।
शाम को पूजा शुरू हुई। सब कुछ बहुत अच्छे से हो गया।
खाना भी समय पर बन गया। किसी को कोई परेशानी नहीं हुई।
तभी पूजा खत्म होते ही एक अचानक घटना हो गई—
एक रिश्तेदार की सोने की अंगूठी कहीं गायब हो गई।
पूरा घर एकदम से हड़कंप में आ गया। सभी लोग इधर-उधर ढूँढने लगे।
कमला देवी ने तुरंत शक भरे लहजे में कहा— “कोई ना कोई तो ले गया होगा, अंगूठी ऐसे थोड़ी ना गायब हो जाती है!”
तभी पूजा ने धीरे से अपनी माँ के कान में कहा— “मम्मी, मुझे तो रीमा के मायके वालों पर शक हो रहा है…”
पूजा की ये बात रीमा ने सुन ली।
उसके दिल को बहुत ठेस पहुँची, लेकिन उसने खुद को संभाला और शांत स्वर में बोली—
“अगर आप लोगों को शक है, तो बेहतर यही होगा कि सबके सामने सच्चाई साफ कर ली जाए।”
रीमा ने शांत लेकिन दृढ़ आवाज़ में कहा—
“सबके बैग चेक होंगे… और उम्मीद है, कोई भी इसे गलत नहीं समझेगा।”
सबने एक-दूसरे की तरफ देखा, फिर सहमति में सिर हिला दिया।
धीरे-धीरे सबके बैग की तलाशी ली गई, लेकिन कहीं भी अंगूठी नहीं मिली।
तब रीमा ने थोड़ा रुककर सबकी तरफ देखा और बोली—
“जब बाहर से आए सभी लोगों के बैग चेक हो चुके हैं… तो अब घर के लोगों के बैग भी चेक होने चाहिए।”
यह सुनते ही माहौल एकदम शांत हो गया।
कमला देवी और पूजा के चेहरे पर हल्की घबराहट साफ नजर आने लगी।
आखिर में जब अलमारी चेक की गई, तो अंगूठी कमला देवी की साड़ी में मिली।
पूरा घर चौंक गया।
कमला देवी के पास कोई जवाब नहीं था।
रीमा ने शांत और दृढ़ स्वर में कहा—
“माँ जी, गलती किसी से भी हो सकती है…
लेकिन बिना सोचे-समझे किसी पर इल्ज़ाम लगाना सही नहीं होता।”
कमला देवी की आँखें शर्म से झुक गईं।
उन्हें अपनी गलती का गहरा एहसास हो चुका था।
उस दिन के बाद सब बदल गया।
कमला देवी अब रीमा से नरमी से बात करने लगीं। पूजा भी अपनी भाभी की इज्जत करने लगी।
कुछ महीनों बाद, रीमा ने एक प्यारे से बेटे को जन्म दिया।
कमला देवी ने उसकी खूब सेवा की।
अब घर में प्यार था, समझदारी थी— और सबसे जरूरी, एक-दूसरे के लिए सम्मान था।
सीख:
अक्ल और शांति से हर मुश्किल जीती जा सकती है।
रिश्ते लड़ाई से नहीं, समझदारी से संभलते हैं।

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