तुलना का बोझ

 

Indian housewife silently working in kitchen while facing family comparison and emotional stress


रीमा चुपचाप रसोई में खड़ी चाय बना रही थी। गैस की धीमी आंच पर उबलती चाय के साथ उसके मन में भी कई बातें उबल रही थीं। तभी बाहर से उसकी सास, कमला देवी की आवाज आई—


“अरे सुनो रीमा, जरा जल्दी करना… नेहा कितनी फुर्ती से काम कर लेती है, तुमसे तो एक चाय भी समय पर नहीं बनती।”


रीमा ने हल्की सी “जी मम्मी जी” कहा और फिर चुप हो गई।


ये कोई नई बात नहीं थी।


रीमा इस घर में आठ साल पहले आई थी। शुरू-शुरू में वह हर काम बहुत मन लगाकर करती थी। उसे लगता था कि धीरे-धीरे सब उसे समझेंगे, उसकी मेहनत को सराहेंगे। लेकिन ऐसा कभी हुआ ही नहीं।


हर दिन कोई ना कोई कमी निकाल दी जाती थी।


कभी सब्ज़ी में नमक ज्यादा, कभी चाय फीकी, कभी सफाई में कमी… और इन सबके बीच एक ही बात बार-बार दोहराई जाती—


“तुमसे अच्छा तो कोई भी कर ले।”


रीमा चुपचाप सब सहती रही।


फिर एक दिन इस घर में छोटे बेटे की शादी हुई और नई बहू नेहा आई।


नेहा हंसमुख थी, बातें अच्छी करती थी और सबसे जल्दी घुल-मिल गई। कमला देवी को जैसे वही बहू पसंद आ गई थी।


अब हर बात में तुलना शुरू हो गई।


“देखो नेहा कितनी समझदार है…” “नेहा तो बिना कहे काम कर देती है…” “नेहा जैसी बहू किस्मत वालों को मिलती है…”


और हर बार इन तारीफों के पीछे छुपा होता था रीमा के लिए ताना।


रीमा अब पहले से ज्यादा चुप रहने लगी थी।


एक दिन की बात है—


घर में मेहमान आने वाले थे। रीमा सुबह से ही रसोई में लगी हुई थी। उसने सब कुछ तैयार कर लिया—खाना, मिठाई, नाश्ता…


तभी नेहा ने आकर कहा, “दीदी, आप बैठ जाओ… मैं मिठाई परोस देती हूं।”


नेहा ने बस मिठाई प्लेट में सजाकर बाहर रख दी।


मेहमान आए, खाना खाया और कमला देवी ने मुस्कुराते हुए कहा— “मिठाई हमारी छोटी बहू ने बनाई है… बहुत स्वादिष्ट है।”


रीमा वहीं खड़ी रह गई।


उसने कुछ नहीं कहा।


उस दिन पहली बार उसके मन में एक सवाल उठा— “क्या मेरी मेहनत कभी किसी को दिखेगी?”


लेकिन जवाब कहीं नहीं था।


समय धीरे-धीरे आगे बढ़ता गया।


कुछ साल बाद हालात बदलने लगे।


नेहा के दो बच्चे हो गए। जिम्मेदारियां बढ़ गईं। रातों की नींद उड़ गई। दिनभर बच्चों और घर के बीच भागदौड़ शुरू हो गई।


अब नेहा पहले जैसी नहीं रह पाती थी।


कई बार काम अधूरा रह जाता, कई बार थकान से वह चिड़चिड़ी हो जाती।


एक दिन कमला देवी ने गुस्से में कहा— “नेहा, तुम पहले जैसी क्यों नहीं रही? पहले तो सब संभाल लेती थी, अब कुछ भी नहीं होता तुमसे।”


नेहा चुप हो गई।


उसी समय उसे रीमा याद आई।


वही रीमा… जो सालों तक सब कुछ अकेले संभालती रही… बिना शिकायत, बिना आराम।


नेहा की आंखें भर आईं।


उसे पहली बार एहसास हुआ— जिसे वह हमेशा “सामान्य” समझती थी, वो असल में बहुत बड़ी जिम्मेदारी थी।


उधर रीमा अब इस घर में नहीं थी।


लगातार तुलना और अपमान से तंग आकर वह अपने पति और बच्चों के साथ अलग रहने चली गई थी।


अब घर में सब कुछ था—सुविधाएं, लोग… लेकिन एक कमी साफ महसूस होती थी।


“शांति” की कमी।


एक दिन नेहा ने धीरे से कमला देवी से कहा— “मम्मी जी… दीदी बहुत अच्छा काम करती थीं ना…”


कमला देवी कुछ पल के लिए चुप हो गईं।


शायद उन्हें भी एहसास हुआ… लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।


कभी-कभी हम किसी की मेहनत को तब समझते हैं, जब वो हमारे सामने नहीं रहती।


तुलना करना आसान होता है, लेकिन किसी की जगह खुद खड़े होकर देखना बहुत मुश्किल।


रिश्ते शब्दों से नहीं, समझ और सम्मान से चलते हैं।


जहां तुलना होती है, वहां धीरे-धीरे अपनापन खत्म होने लगता है… और जब तक एहसास होता है, तब तक अक्सर बहुत कुछ हाथ से निकल चुका होता है।



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