एक छोटी-सी मुस्कान का बड़ा कर्ज
रसोई में खड़ी सुनीता चुपचाप सब्ज़ी काट रही थी। चाकू की आवाज़ ही जैसे उस सन्नाटे को तोड़ रही थी। उसके चेहरे पर थकान साफ झलक रही थी… लेकिन आँखों में एक आदत-सी बन चुकी सहनशीलता थी।
सुनीता इस घर की बहू थी। शादी को चार साल हो चुके थे। उसने इस घर को हमेशा अपना समझकर अपनाया… लेकिन उसे कभी वो अपनापन नहीं मिला जिसकी उसे उम्मीद थी।
उसकी सास, शारदा देवी, स्वभाव से सख्त थीं। बात-बात पर टोकना, छोटी-छोटी गलतियों पर नाराज़ होना… ये सब रोज़ की बात थी।
“सुनीता, ये दाल इतनी पतली क्यों बनाई है?”
“इतना नमक कौन डालता है?”
“तुम्हें कोई काम ठीक से आता भी है या नहीं?”
ऐसी बातें सुनते-सुनते सुनीता अब चुप रहना सीख चुकी थी।
एक पुरानी याद...
उस दिन घर में हलचल थी। शारदा देवी की छोटी बेटी रीमा अपने मायके आने वाली थी।
सुनीता सुबह से ही तैयारियों में लगी हुई थी—रीमा की पसंद का खाना, उसकी पसंद की मिठाई, कमरा साफ करना… सब कुछ।
शाम को जैसे ही रीमा आई, शारदा देवी का चेहरा खिल उठा।
“आ गई मेरी बेटी! कितनी दुबली हो गई है तू!”
उन्होंने उसे गले से लगा लिया।
सुनीता पास ही खड़ी मुस्कुरा रही थी… लेकिन उसके दिल में हल्की-सी चुभन उठी।
क्या कभी मुझे भी ऐसे गले लगाया गया है?
उसने खुद से सवाल किया… और फिर चुपचाप रसोई में चली गई।
एक छोटा-सा हादसा...
रात का समय था। सभी लोग खाना खा चुके थे।
अचानक शारदा देवी को चक्कर आया और वो गिर पड़ीं।
“माँ!” रीमा घबरा गई।
सुनीता दौड़कर आई। उसने तुरंत शारदा देवी को संभाला, पानी पिलाया और नीरज (अपने पति) को डॉक्टर बुलाने के लिए कहा।
डॉक्टर ने आकर कहा—
“इनका ब्लड प्रेशर बहुत बढ़ गया है। इन्हें आराम की बहुत जरूरत है और तनाव से दूर रखना होगा।”
उस रात सुनीता ने एक पल के लिए भी आँख नहीं झपकी। वो बार-बार उठकर सास का हाल देखती, दवा देती, पानी पिलाती।
रीमा भी थी… लेकिन धीरे-धीरे वो थककर सो गई।
सुनीता ही पूरी रात जागती रही।
अगले कुछ दिनों में सुनीता ने पूरी जिम्मेदारी संभाल ली।
समय पर दवा, हल्का खाना, सैर… हर चीज़ का ध्यान रखती।
एक दिन शारदा देवी ने देखा—
सुनीता उनके पैरों की मालिश कर रही थी।
“तुम सोई नहीं अभी तक?” उन्होंने धीमे से पूछा।
“आपको दर्द हो रहा था… इसलिए सोचा थोड़ा आराम मिल जाए,” सुनीता ने मुस्कुराकर कहा।
उस दिन पहली बार शारदा देवी चुप हो गईं… बिना कुछ कहे।
एक एहसास...
कुछ दिन बाद शारदा देवी की तबीयत ठीक होने लगी।
एक दोपहर वो अपने कमरे में बैठी थीं, जब उनकी नजर दरवाजे पर पड़ी।
सुनीता चुपचाप उनके लिए दलिया लेकर आ रही थी।
उसके चेहरे पर कोई शिकायत नहीं थी… कोई नाराज़गी नहीं… बस एक सच्ची चिंता।
तभी शारदा देवी को अचानक एक बात याद आई—
जब वो बीमार थीं… तब उनकी बेटी सो गई थी…
लेकिन बहू पूरी रात जागती रही थी।
उनकी आँखें भर आईं।
शाम को जब सुनीता रसोई में काम कर रही थी, तभी पीछे से आवाज आई—
“सुनीता…”
सुनीता ने पलटकर देखा—शारदा देवी खड़ी थीं।
“जी माँ?”
कुछ पल के लिए शारदा देवी चुप रहीं… जैसे शब्द ढूँढ रही हों।
फिर धीरे से बोलीं—
“आज खाना मैं बनाऊंगी… तुम बैठ जाओ।”
सुनीता चौंक गई—
“नहीं माँ, आप आराम कीजिए… मैं कर लूंगी।”
शारदा देवी ने पहली बार उसके सिर पर हाथ रखा—
“बहुत कर लिया तुमने… अब थोड़ा मुझे भी करने दो।”
सुनीता की आँखें नम हो गईं।
पहली बार ‘बहू’ नहीं, ‘बेटी’...
अगले दिन घर का माहौल बदला-बदला सा था।
रिश्तेदार बैठे थे और हल्की-फुल्की बातचीत चल रही थी। तभी शारदा देवी ने मुस्कुराते हुए सुनीता की ओर देखा और सबके सामने बोलीं—
“ये मेरी बहू नहीं… मेरी बेटी है।”
सुनीता के हाथ जैसे वहीं थम गए। उसने धीरे से सिर उठाकर शारदा देवी की ओर देखा।
उसकी आँखों में हैरानी भी थी… और एक अनकही खुशी भी।
सिर्फ एक शब्द था, लेकिन उस एक शब्द ने उसके चार साल के सारे दर्द, सारी शिकायतें जैसे पल भर में हल्की कर दीं।
उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आ गई… और आँखें अपने आप नम हो गईं।
कहानी का सार:
कभी-कभी रिश्तों में दूरी नफरत से नहीं…
गलतफहमियों और अनदेखी से पैदा होती है।
और कई बार…
एक सच्ची देखभाल, एक छोटा-सा त्याग…
रिश्तों को पूरी तरह बदल देता है।
👉 अगर हम दूसरों से अपनापन चाहते हैं…
तो पहले हमें खुद भी दिल से अपनाना सीखना होगा।

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