छांव का एहसास
सुबह की हल्की-सी ठंडक खिड़की से अंदर आ रही थी। लेकिन घर के अंदर माहौल बिल्कुल गर्म था।
“बस अब और नहीं… मैं थक चुकी हूं!”
रीना ने तेज आवाज़ में कहा और हाथ में पकड़ा तौलिया सोफे पर पटक दिया।
उसका पति, विकास, चुपचाप उसे देख रहा था।
“हर चीज़ मुझे ही संभालनी पड़ती है—घर, बच्चे, खाना, ऑफिस… आखिर मैं इंसान हूं या मशीन?” रीना की आवाज़ भर्रा गई।
विकास ने धीरे से कहा,
“मैं भी तो मदद करता हूं, रीना…”
“मदद?” रीना हंस पड़ी, “तुम्हें मदद कहते हैं बच्चों को स्कूल छोड़ देना? बाकी सब मैं करूं?”
कोने में खड़े दोनों बच्चे चुपचाप ये सब देख रहे थे। उनके चेहरों पर डर साफ दिख रहा था।
विकास कुछ कहना चाहता था, लेकिन चुप रह गया। उसने बस इतना कहा—
“अगर मम्मी होतीं… तो शायद सब आसान होता…”
ये सुनते ही रीना अचानक शांत हो गई।
कमरे में सन्नाटा छा गया।
अतीत की परछाइयां...
रीना की सास, यानी विकास की मां, एक साल पहले गुजर गई थीं।
जब वो जिंदा थीं, तब रीना को उनका हर काम खटकता था।
“मम्मी जी, आपसे अब कुछ होता नहीं… बस बैठे-बैठे हुक्म चलाती रहती हैं…”
रीना कई बार ये बात उनके सामने ही कह देती थी।
सास चुप रह जाती थीं… बस हल्की मुस्कान दे देती थीं।
लेकिन सच ये था कि वही “कुछ नहीं करने वाली” सास ही घर का सहारा थीं।
सुबह बच्चों को उठाना…
उनके टिफिन तैयार करना…
स्कूल से आने के बाद उन्हें खाना खिलाना…
और सबसे बड़ी बात—घर में उनकी मौजूदगी।
रीना ऑफिस जाती थी, लेकिन उसे कभी चिंता नहीं होती थी।
क्योंकि उसे पता था—“मम्मी जी हैं ना…”
एक छोटी-सी घटना...
एक बार रविवार को रीना ने बहुत मेहनत से खाना बनाया—पूरी, पनीर, हलवा।
जब उसने सास को खाना दिया, तो उन्होंने धीरे से कहा,
“बहू, मुझे ये सब भारी लगेगा… थोड़ी खिचड़ी बना दे।”
बस, यही बात रीना को चुभ गई।
“इतना सब बनाया है… और आपको खिचड़ी चाहिए! मैं कोई नौकरानी हूं क्या?”
वो गुस्से में रसोई में गई और बर्तन पटकते हुए खिचड़ी बनाने लगी।
उस दिन सास ने मुश्किल से दो निवाले खाए थे।
आज की सच्चाई...
दरवाजे की घंटी बजी।
रीना ने दरवाजा खोला—स्कूल से बच्चे आ गए थे।
“मम्मा, आज आप घर पर थीं ना?” छोटे बेटे ने मासूमियत से पूछा।
रीना ने उसे गले लगा लिया।
उसकी आंखों में आंसू आ गए।
अब उसे हर दिन डर लगता था—
बच्चे घर पर अकेले रहेंगे…
कुछ गलत हो जाएगा…
कोई दरवाजा खुला रह गया तो?
एक दिन तो सच में ऐसा हुआ—
दरवाजा खुला रह गया था और बच्चे अंदर सो रहे थे।
उस दिन रीना और विकास की बहुत बड़ी लड़ाई हुई।
आखिरकार रीना ने नौकरी छोड़ दी।
अब वो घर पर रहती थी।
लेकिन अजीब बात ये थी कि—
अब काम कम नहीं हुआ था…
बल्कि जिम्मेदारी और बढ़ गई थी।
एक दिन शाम को बालकनी में बैठी रीना सोच रही थी—
“जब मम्मी जी थीं… तब मुझे कभी डर नहीं लगता था…”
“वो काम करें या ना करें… लेकिन उनका होना ही बहुत था…”
उसकी आंखों से आंसू बहने लगे।
उसी समय उसकी बेटी पास आकर बोली,
“मम्मा, दादी होतीं तो अच्छा होता ना?”
रीना ने बेटी को सीने से लगा लिया।
आज पहली बार उसने दिल से महसूस किया—
बुजुर्ग सिर्फ काम करने के लिए नहीं होते…
उनका होना ही घर की सबसे बड़ी सुरक्षा होता है…
वो उस पेड़ की तरह होते हैं… जो फल ना दे, फिर भी छांव जरूर देता है…
रीना ने आसमान की तरफ देखा और धीमे से कहा—
“मम्मी जी… मुझे माफ कर दीजिए…
मैं आपको समझ नहीं पाई…”
उस दिन के बाद रीना बदल चुकी थी।
अब वो हर बुजुर्ग में अपनी सास को देखने लगी थी…
और हर रिश्ते की कीमत समझने लगी थी।

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