एक दिन की छुट्टी… जिसने सब बदल दिया
सुबह की हल्की धूप खिड़की से अंदर आ रही थी। लेकिन आज घर का माहौल कुछ अलग था।
ना रसोई से बर्तनों की आवाज़… ना चाय की खुशबू… और ना ही मम्मी की रोज़ वाली आवाज—
“उठ जाओ, देर हो रही है!”
रिया ने आँखें खोलीं और घड़ी की तरफ देखा—
“अरे! 9 बज गए?”
वह घबराकर उठी और अपने भाई अर्जुन को हिलाने लगी—
“उठो अर्जुन! आज मम्मी ने हमें उठाया ही नहीं!”
दोनों जल्दी-जल्दी कमरे से बाहर आए।
हॉल में देखा—मम्मी आराम से सोफे पर बैठी अखबार पढ़ रही थीं। चेहरे पर शांति थी… कोई जल्दी नहीं, कोई चिंता नहीं।
रिया ने हैरानी से पूछा—
“मम्मी, आज आपने हमें उठाया क्यों नहीं? और चाय-नाश्ता भी नहीं बना?”
मम्मी ने अख़बार से नज़र उठाई, हल्की मुस्कान के साथ बोलीं—
“रोज़ मैं ही तुम दोनों को उठाती हूँ, चाय-नाश्ता बनाती हूँ और घर के सारे काम संभालती हूँ… तो आज सोचा, ये सब तुम लोग करके देखो।”
अर्जुन हँसते हुए बोला—
“अरे मम्मी, इसमें क्या बड़ी बात है! खाना बनाना तो बहुत आसान होता है। हम बना लेंगे।”
मम्मी ने बस इतना कहा—
“ठीक है, आज पूरा दिन रसोई तुम्हारी।”
इतना सुनते ही दोनों के चेहरे थोड़े फीके पड़ गए… लेकिन अब पीछे हटने का सवाल ही नहीं था।
तभी पापा भी आ गए और बोले—
“वाह! आज तो मज़ा आएगा। बच्चों के हाथ का खाना मिलेगा।”
अब रिया और अर्जुन रसोई में पहुँच गए।
रिया बोली—
“चलो, पहले चाय बनाते हैं।”
अर्जुन ने गैस जलाई और पानी रखा।
“अब इसमें क्या डालते हैं?”
रिया ने सोचा—
“पानी, दूध, चायपत्ती… और चीनी!”
लेकिन जैसे ही चाय बनी और दोनों ने चखी…
“ये क्या! इतनी कड़वी क्यों है?”
पता चला—चीनी डालना ही भूल गए थे!
दोनों ने एक-दूसरे को देखा और हँस पड़े—
“चलो, पहली गलती माफ!”
अब बारी थी नाश्ते की।
“आज पोहा बनाते हैं,” रिया ने कहा।
अर्जुन ने तुरंत पोहा भिगो दिया… लेकिन इतना ज्यादा पानी डाल दिया कि पोहा पूरी तरह गीला होकर लुगदी जैसा हो गया।
“अब इसका क्या करें?” अर्जुन घबराया।
रिया बोली—
“कुछ नहीं, बस बना देते हैं… शायद ठीक हो जाए।”
किसी तरह पोहा तैयार हुआ।
दोनों ने बड़े गर्व से प्लेट सजाई और मम्मी-पापा को बुलाया—
“आइए, नाश्ता तैयार है!”
पापा ने पहला कौर लिया… और चुप हो गए।
मम्मी ने भी चखा… और मुस्कुरा दीं।
अर्जुन घबराकर बोला—
“कैसा है?”
पापा बोले—
“बहुत… अलग है!”
इतना सुनते ही सब हँस पड़े।
अब दोपहर के खाने की बारी थी।
रिया ने कहा—
“चलो, आज दाल-चावल और आलू की सब्जी बनाते हैं।”
अर्जुन बोला—
“हाँ, ये तो आसान होगा।”
लेकिन जैसे ही दाल कुकर में डाली…
उन्होंने बिना देखे ही मसाले डाल दिए।
कुछ देर बाद कुकर खोला तो दाल बहुत गाढ़ी और अजीब सी लग रही थी।
रिया ने चखा—
“ये इतना मीठा क्यों है?”
अर्जुन ने डिब्बा उठाकर देखा—
“अरे! ये तो चीनी थी… नमक समझकर डाल दी!”
अब दोनों के चेहरे उतर गए।
“अब क्या करें?” रिया ने परेशान होकर कहा।
तभी मम्मी रसोई में आईं।
उन्होंने प्यार से कहा—
“रुको, मैं ठीक कर देती हूँ।”
मम्मी ने थोड़ी देर में सब संभाल लिया।
खाना तैयार हुआ… और इस बार सबने मिलकर खाया।
खाने के बाद रिया और अर्जुन चुपचाप मम्मी के पास आए।
दोनों ने उनके पैर छुए और बोले—
“मम्मी, हमें माफ कर दो। हमें लगता था कि खाना बनाना आसान है… लेकिन आज समझ आया कि ये कितना मेहनत वाला काम है।”
मम्मी ने प्यार से उनके सिर पर हाथ रखा—
“कोई बात नहीं, सीखने से ही सब आता है।”
अर्जुन बोला—
“अब से हफ्ते में एक दिन रसोई हमारी होगी।”
रिया ने मुस्कुराकर कहा—
“और हम सही से सीखेंगे भी!”
पापा ने हँसते हुए कहा—
“बस, अगली बार नमक और चीनी का फर्क जरूर समझ लेना!”
घर में हँसी गूंज उठी…
और उस दिन के बाद, सिर्फ खाना ही नहीं…
रिश्तों में भी एक नई समझ और मिठास आ गई। ❤️

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