थकान की कीमत
अलार्म की आवाज़ बंद करते हुए कविता ने धीरे से आँखें खोलीं। घड़ी में सुबह के 5 बजे थे… लेकिन उसका शरीर जैसे उठने से इंकार कर रहा था। रात को उसे सोते-सोते 2 बज गए थे।
कारण भी वही पुराना था—घर में मेहमान।
उसकी ननद रचना अपने पूरे परिवार के साथ आई थी। उनके आने का मतलब था—पूरे घर की जिम्मेदारी कविता के कंधों पर।
सुबह से लेकर रात तक रसोई में खड़े-खड़े उसने सबके लिए खाना बनाया, चाय बनाई, बच्चों की फरमाइशें पूरी कीं… और जब सब खा-पीकर सो गए, तब उसने अकेले ही पूरी रसोई साफ की।
थकान इतनी थी कि बिस्तर पर गिरते ही नींद आ गई।
कविता ने करवट बदली और सोचा—
“बस आज थोड़ी देर और सो लूं…”
लेकिन जब दोबारा आँख खुली तो घड़ी में 7:30 बज रहे थे।
वह घबरा गई।
“आज तो फिर सुनना पड़ेगा…” उसने मन ही मन सोचा।
जल्दी-जल्दी तैयार होकर वह रसोई की तरफ बढ़ी। जैसे ही वह दरवाजे के पास पहुँची, अंदर से आवाज़ें आने लगीं।
“माँ, आपने भाभी को बहुत सिर पर चढ़ा रखा है…” रचना कह रही थी।
“हाँ, देखो ना अभी तक सो रही हैं। हमारे घर में तो बहुएं सूरज निकलने से पहले उठ जाती हैं,” सास ने ताने मारते हुए कहा।
“और संस्कार? लगता है मायके से कुछ सीखा ही नहीं…”
कविता वहीं रुक गई।
उसका दिल जैसे बैठ गया।
वह सोचने लगी—
“क्या सच में मेरी कोई कीमत नहीं? क्या मेरी मेहनत किसी को दिखाई नहीं देती?”
आँखों में हल्की नमी आ गई… लेकिन उसने खुद को संभाला और अंदर चली गई।
उसे देखते ही दोनों चुप हो गईं।
कविता ने बिना कुछ कहे अपने लिए चाय बनाई और जाने लगी।
तभी सास ने तेज आवाज़ में कहा—
“कहाँ जा रही हो? नाश्ता कौन बनाएगा?”
कविता ने पहली बार पलटकर देखा।
आज उसकी आँखों में झिझक नहीं, ठहराव था।
“माँ जी, आज मैं आराम करूंगी,” उसने शांत लेकिन दृढ़ आवाज़ में कहा।
“क्या मतलब?” सास चौंक गईं।
“मतलब ये कि मैं भी इंसान हूँ। कल पूरे दिन और रात तक मैंने काम किया… लेकिन आज सुबह थोड़ी देर हो गई तो मेरे संस्कारों पर सवाल उठाए गए।”
रचना बीच में बोली—
“तो क्या गलत कहा हमने?”
कविता ने उसकी ओर देखा और बोली—
“गलत ये था कि आपने मेरी मेहनत नहीं देखी… सिर्फ मेरी एक गलती देखी।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
“मैंने कभी शिकायत नहीं की… लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि मुझे दर्द नहीं होता,” कविता की आवाज़ हल्की भर्रा गई।
तभी पीछे से ससुर जी की आवाज़ आई—
“बिल्कुल सही कह रही है बहू।”
तीनों ने मुड़कर देखा।
वो दरवाजे पर खड़े थे।
“तुम दोनों को शर्म आनी चाहिए,” उन्होंने सख्त लहज़े में कहा।
“बहू सुबह से रात तक काम करती है… और तुम लोग बैठकर सिर्फ कमी निकालती हो।”
सास और रचना चुप थीं।
“अगर यही व्यवहार तुम्हारी बेटी के साथ उसकी ससुराल में हो, तो कैसा लगेगा?” उन्होंने सास की ओर देखते हुए पूछा।
सास की आँखें झुक गईं।
“और रचना, तुम…” उन्होंने बेटी की ओर देखा,
“पहले खुद देखो कि तुम अपने घर में क्या करती हो, फिर भाभी पर उंगली उठाओ।”
रचना के चेहरे पर शर्म साफ दिखाई दे रही थी।
“आज के बाद इस घर में कोई भी बहू का अपमान नहीं करेगा,” ससुर जी ने साफ शब्दों में कहा।
इतना कहकर वो बाहर चले गए।
कमरे में भारी खामोशी छा गई।
कुछ देर बाद रचना धीरे-धीरे कविता के पास आई।
“भाभी… मुझे माफ कर दीजिए,” उसने सिर झुकाकर कहा।
कविता ने उसकी ओर देखा… उसकी आँखों में सच्चाई थी।
“मुझसे गलती हो गई… मैंने आपकी मेहनत को समझा ही नहीं।”
सास भी आगे बढ़ीं।
“बहू, मुझे भी माफ कर दो… मैंने तुम्हारे संस्कारों पर सवाल उठाया, जबकि गलती मेरी सोच में थी।”
कविता की आँखों में आँसू आ गए।
लेकिन इस बार ये दर्द के नहीं… राहत के आँसू थे।
उसने दोनों को गले लगा लिया।
उस दिन के बाद घर का माहौल बदल गया।
अब काम बाँटा जाने लगा… और सबसे बड़ी बात—
अब कविता की मेहनत को “फर्ज़” नहीं, “सम्मान” समझा जाने लगा।
सीख:
किसी के काम को उसकी जिम्मेदारी समझना आसान है…
लेकिन उसकी मेहनत को समझना ही असली इंसानियत है।

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