बचत का सम्मान
आँगन में रखे पुराने नीम के पेड़ की छाँव आज कुछ अलग ही सुकून दे रही थी, लेकिन घर के अंदर माहौल हल्का-सा तनाव भरा था।
पूजा चुपचाप रसोई में सब्ज़ी काट रही थी। उसके चेहरे पर शांति थी, लेकिन मन में कई बातें चल रही थीं। तभी उसकी ननद काजल अंदर आई।
“भाभी, ये नया बैग कब लिया आपने? बहुत सुंदर है!” काजल ने उत्साह से पूछा।
पूजा मुस्कुराई, “अरे कुछ खास नहीं, बस मार्केट में सस्ता मिल गया, तो ले लिया।”
काजल ने बैग को हाथ में लेकर देखा, “सस्ता? लगता तो काफी महंगा है।”
पूजा हल्के से बोली, “दिखने में है, पर है नहीं… बस थोड़ा समझदारी से लिया है।”
काजल बोली, “मुझे भी ऐसा ही चाहिए भाभी, अगली बार जाओ तो मेरे लिए भी ले आना, मैं पैसे दे दूंगी।”
इतना सुनते ही उनकी सास सरोज जी कमरे में आ गईं।
“किस बात के पैसे?” उन्होंने थोड़ा तेज़ स्वर में पूछा।
काजल ने कहा, “माँ, भाभी के बैग जैसा मुझे भी चाहिए, तो मैं पैसे दे रही थी।”
सरोज जी का चेहरा बदल गया, “अरे, भाभी-ननद में भी अब पैसों का हिसाब होने लगा? पूजा, तुम अपनी ननद से पैसे लोगी?”
पूजा कुछ बोलती, उससे पहले ही काजल बोली, “माँ, इसमें क्या गलत है? मैं खुद ले रही हूँ, तो पैसे देना तो बनता है ना।”
सरोज जी ने बात काट दी, “नहीं, ये सब मुझे पसंद नहीं। घर के रिश्तों में पैसों का लेन-देन ठीक नहीं होता।”
पूजा चुप हो गई। उसने पैसे वापस कर दिए और बात वहीं खत्म हो गई।
कुछ दिन बाद…
काजल फिर मायके आई थी। इस बार उसके हाथ में एक सुंदर साड़ी थी।
पूजा ने देखा और बोली, “वाह काजल, साड़ी तो बहुत प्यारी है! कहाँ से ली?”
काजल ने हंसते हुए कहा, “बस भाभी, ऑनलाइन ऑर्डर की थी। आपको पसंद आई?”
पूजा ने सिर हिलाया, “बहुत अच्छी है, मैं भी सोच रही थी ऐसी ही साड़ी लेने की।”
काजल बोली, “तो ले लीजिए ना भाभी, ज्यादा महंगी भी नहीं है।”
पूजा ने कहा, “मुझे ऑनलाइन इतना समझ नहीं आता, तुम अगली बार आओ तो मेरे लिए भी ऑर्डर कर देना, मैं पैसे दे दूंगी।”
काजल ने तुरंत कहा, “अरे भाभी, पैसे की क्या बात है…”
लेकिन तभी सरोज जी फिर आ गईं।
“अब क्या हो रहा है?” उन्होंने पूछा।
काजल ने बताया, “माँ, भाभी को साड़ी पसंद आई है, तो मैं उनके लिए ऑर्डर कर दूंगी।”
सरोज जी ने तुरंत कहा, “अरे, पैसे की क्या ज़रूरत है? घर में इतना हिसाब क्यों रखती हो तुम लोग?”
पूजा ने धीरे से कहा, “माँ जी, मैं अपने लिए ले रही हूँ, तो पैसे देना सही है।”
सरोज जी ने ताना मारते हुए कहा, “बहुत हिसाब रखने लगी हो तुम… घर का खर्चा भी ऐसे ही बचाती हो क्या?”
पूजा ने कुछ नहीं कहा, लेकिन उसके मन को ठेस लगी।
शाम को जब उसका पति राहुल घर आया, तो पूजा चुप थी।
राहुल ने पूछा, “क्या हुआ? आज कुछ परेशान लग रही हो।”
पूजा ने धीरे से सारी बात बता दी।
राहुल ने ध्यान से सुना और फिर बोला,
“देखो पूजा, तुम घर संभालती हो, खर्च चलाती हो, और बचत भी करती हो… ये कोई छोटी बात नहीं है।”
पूजा ने पूछा, “पर क्या उस बचत पर मेरा हक है?”
राहुल मुस्कुराया,
“बिल्कुल है। जो तुम समझदारी से बचाती हो, वो तुम्हारी मेहनत है। जैसे मैं बाहर काम करता हूँ, वैसे ही तुम घर के अंदर काम करती हो।”
इतने में सरोज जी भी वहीं आ गईं। उन्होंने सब सुन लिया था।
राहुल ने उनकी तरफ देखते हुए कहा,
“माँ, जब आप घर संभालती थीं, तब भी तो आप बचत करती थीं… और उसी से हम सबकी ज़रूरतें पूरी होती थीं। तो आज पूजा वही कर रही है, तो गलत कैसे?”
सरोज जी कुछ पल चुप रहीं।
फिर धीरे से बोलीं,
“शायद मैं गलत सोच रही थी… मुझे लगा घर में पैसे का हिसाब रिश्तों को कमजोर कर देता है… लेकिन अब समझ आया कि समझदारी से खर्च करना और बचाना भी एक जिम्मेदारी है।”
उन्होंने पूजा की तरफ देखा और कहा,
“मुझे माफ कर देना बहू, मैंने तुम्हें गलत समझा।”
पूजा की आँखों में हल्की नमी आ गई, लेकिन चेहरे पर संतोष था।
उसने कहा,
“माँ जी, रिश्ते समझ से चलते हैं… और जब समझ आ जाए, तो सब ठीक हो जाता है।”
सीख:
घर संभालने वाली स्त्री सिर्फ खर्च नहीं करती, वो बचत करके परिवार को मजबूत भी बनाती है। और उस बचत पर उसका पूरा अधिकार होता है।

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