रुकना भी ज़रूरी है
रसोई की खिड़की से आती हल्की हवा में परदे धीरे-धीरे हिल रहे थे, लेकिन घर के अंदर जैसे सब कुछ थमा हुआ था।
आस्था गैस पर खड़ी चाय उबाल रही थी। उबाल ऊपर आकर गिरने को था, फिर भी उसकी नज़र वहीं नहीं थी। उसका ध्यान बार-बार हॉल में बैठे आदित्य पर जा रहा था—लैपटॉप खुला, मोबाइल हाथ में, और चेहरे पर वही एकाग्रता… जो अब उसे अजनबी लगने लगी थी।
"चाय बन गई है," उसने धीमे से कहा।
आदित्य ने सिर उठाए बिना ही जवाब दिया, "बस रख दो, मीटिंग में हूँ।"
आस्था ने कप ट्रे में रखा और धीरे से टेबल पर रख दिया। उसने चाहा कि वह दो सेकंड के लिए उसकी तरफ देखे… बस दो सेकंड। लेकिन स्क्रीन से नज़र हटाने का वक्त शायद उसके पास नहीं था।
वह चुपचाप कुर्सी खींचकर बैठ गई।
कुछ देर बाद उसने पूछा, "आज शाम को कहीं चलेंगे?"
आदित्य ने कीबोर्ड पर उंगलियाँ चलाते हुए कहा, "आज नहीं, बहुत काम है। वीकेंड पर प्लान करते हैं।"
"पिछले तीन वीकेंड से यही सुन रही हूँ," आस्था ने बिना गुस्से के कहा।
आदित्य ने एक पल के लिए स्क्रीन से नजर हटाई, फिर बोला, "आस्था, अभी थोड़ा स्ट्रेस है। ये प्रोजेक्ट खत्म हो जाए, फिर सब ठीक हो जाएगा।"
आस्था मुस्कुराई नहीं। बस हल्का-सा सिर हिला दिया।
उसे समझ में नहीं आता था—हर बार "थोड़ा वक्त" कब "हमेशा" में बदल जाता है।
वह उठी और कमरे में चली गई। अलमारी खोली तो अंदर एक पुराना डिब्बा रखा था। उसने उसे निकाला। उसमें कुछ तस्वीरें थीं—उनके शादी के शुरुआती दिनों की।
एक फोटो में आदित्य हँस रहा था—खुले दिल से, बिना किसी तनाव के। दूसरी में वह सड़क किनारे गोलगप्पे खाते हुए उसे देख रहा था।
आस्था की उंगलियाँ उस फोटो पर ठहर गईं।
"ये आदमी कहाँ चला गया?" उसने खुद से पूछा।
उसी समय बाहर से आदित्य की आवाज आई, "आस्था! वो फाइल कहाँ रखी है?"
वह तुरंत उठी, जैसे उसकी जरूरत सिर्फ चीज़ें ढूँढने तक सीमित हो गई हो।
"टेबल के नीचे ड्रॉअर में है," उसने जवाब दिया।
"ओके," आदित्य ने कहा, और फिर वही सन्नाटा।
दिन यूँ ही बीत गया।
रात को जब आस्था बालकनी में खड़ी थी, तभी फोन बजा। स्क्रीन पर "माँ" लिखा था।
उसने तुरंत कॉल उठाई।
"बेटा, सब ठीक है?" माँ की आवाज में चिंता थी।
आस्था ने जल्दी से कहा, "हाँ माँ, सब ठीक है।"
माँ कुछ सेकंड चुप रहीं, फिर बोलीं, "झूठ मत बोल। तेरी आवाज बता रही है।"
आस्था की आँखें भर आईं। "बस… थोड़ा अकेलापन लगता है।"
"आदित्य ठीक नहीं है क्या?"
"ठीक है… बस बहुत व्यस्त है।"
माँ ने धीरे से कहा, "बेटा, व्यस्त होना और दूर हो जाना… दोनों अलग चीजें होती हैं। ध्यान रखना।"
कॉल कट गया, लेकिन शब्द वहीं रह गए।
अगले दिन आस्था ने तय किया कि वह कुछ नहीं कहेगी। बस देखेगी—कब तक सब ऐसे ही चलता है।
दिन गुजरे। हफ्ते भी।
एक दिन अचानक दरवाजे की घंटी बजी।
आस्था ने दरवाजा खोला—सामने आदित्य का छोटा भाई, रोहन खड़ा था। चेहरे पर घबराहट थी।
"भाभी, जल्दी चलिए… पापा को हॉस्पिटल ले गए हैं।"
आस्था का दिल धड़क उठा। "क्या हुआ?"
"हार्ट की दिक्कत… डॉक्टर ने तुरंत बुलाया है।"
आस्था ने बिना देर किए बैग उठाया। आदित्य अभी भी कमरे में कॉल पर था।
वह उसके पास गई, "आदित्य… पापा—"
"अभी नहीं, आस्था," उसने हाथ से इशारा किया।
इस बार आस्था नहीं रुकी।
"आदित्य!" उसकी आवाज तेज हो गई।
आदित्य चौंका। उसने कॉल म्यूट किया। "क्या हुआ?"
"पापा हॉस्पिटल में हैं। हमें अभी जाना है।"
आदित्य कुछ सेकंड के लिए चुप रह गया।
फिर बोला, "मैं आ रहा हूँ।"
पहली बार उसने लैपटॉप बंद किया… बिना कोई बहाना दिए।
हॉस्पिटल का माहौल भारी था।
आदित्य के पिता बेड पर लेटे थे। ऑक्सीजन लगी हुई थी।
आदित्य ने डॉक्टर से बात की, सारी जानकारी ली। हर काम उसने ठीक से किया—जैसे हमेशा करता था।
लेकिन जब आस्था उसके पास खड़ी थी… वह फिर भी दूर था।
आस्था ने धीरे से कहा, "बस एक बार… मेरे पास बैठ जाओ।"
आदित्य ने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में थकान थी… और एक गहरी उम्मीद भी।
उसने कुछ नहीं कहा, बस उसके पास आकर बैठ गया।
यह छोटा-सा पल था, लेकिन आस्था के लिए बहुत बड़ा।
रात को डॉक्टर ने कहा, "अब हालत स्थिर है। चिंता की बात नहीं है।"
सबने राहत की सांस ली।
आदित्य बाहर कॉरिडोर में बैठा था। पहली बार उसके हाथ में फोन नहीं था।
वह खाली बैठा था… जैसे सोच रहा हो।
आस्था उसके पास आई।
"क्या सोच रहे हो?" उसने पूछा।
आदित्य ने धीरे से कहा, "मैं सब संभाल रहा था… लेकिन शायद सबसे जरूरी चीज ही छूट गई।"
"क्या?" आस्था ने पूछा।
"तुम," उसने सीधा जवाब दिया।
आस्था चुप रही।
आदित्य ने आगे कहा, "मैंने सोचा था, पैसे, करियर… सब ठीक होगा तो जिंदगी खुद ठीक हो जाएगी। लेकिन… जिंदगी इंतज़ार नहीं करती।"
आस्था की आँखों में आँसू आ गए।
"अब?" उसने पूछा।
आदित्य ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
"अब मुझे रुकना सीखना है… सच में जीना सीखना है।"
कुछ दिन बाद, जब सब सामान्य हुआ, आदित्य एक दिन घर जल्दी आया।
उसके हाथ में कोई लैपटॉप नहीं था।
उसने दरवाजा खोला और कहा, "चलो, बाहर चलते हैं।"
आस्था ने हैरानी से पूछा, "कहाँ?"
"पता नहीं," उसने मुस्कुराते हुए कहा, "आज प्लान नहीं है।"
आस्था हँस पड़ी—कई दिनों बाद।
वे दोनों बिना किसी तय जगह के निकल पड़े। सड़क पर चलते हुए, बिना किसी जल्दी के।
आदित्य ने उसका हाथ पकड़ा।
इस बार पकड़ मजबूत नहीं थी… लेकिन सच्ची थी।
चलते-चलते उसने कहा, "मुझे डर लगता था… कि अगर मैं रुक गया, तो पीछे रह जाऊँगा।"
आस्था ने जवाब दिया, "और मुझे डर लगता था… कि अगर तुम नहीं रुके, तो मैं पीछे छूट जाऊँगी।"
दोनों कुछ पल के लिए चुप हो गए।
फिर आदित्य ने कहा, "अब साथ चलेंगे। धीरे… लेकिन साथ।"
आस्था ने सिर उसके कंधे पर रख दिया।
और उस दिन पहली बार… उन्हें कहीं पहुँचने की जल्दी नहीं थी।
क्योंकि उन्हें समझ आ गया था—
जिंदगी मंज़िल से नहीं, साथ चलने से बनती है।

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