दूसरी सुबह

 

Elderly Indian couple finding companionship and emotional support in later life, sitting together peacefully at home with warm sunlight


संध्या का समय था। हल्की-हल्की धूप अब ढलने लगी थी और आँगन में एक शांत सा सन्नाटा पसरा हुआ था। घर के अंदर एक अजीब-सी वीरानी थी। रामप्रसाद जी खिड़की के पास बैठे बाहर सड़क को देख रहे थे। लोग अपने-अपने काम से लौट रहे थे, बच्चे खेल रहे थे, पर उनके जीवन में जैसे सब कुछ ठहर गया था।


पत्नी के गुज़र जाने के बाद घर अब घर जैसा नहीं लगता था—बस दीवारों का एक ढांचा रह गया था।


दो बेटे थे—रोहित और अमन। दोनों बड़े शहरों में अपनी-अपनी ज़िंदगी में व्यस्त थे। महीने में एक-दो बार फोन कर लेते, बस औपचारिक हालचाल पूछने के लिए।


“पापा, आप अपना ध्यान रखा कीजिए…”

ये वाक्य हर बार सुनने को मिलता, मगर कभी कोई ये पूछने नहीं आया कि “पापा, हम आपके पास आ जाएं?”


रामप्रसाद जी ने भी अब उम्मीद करना छोड़ दिया था।



एक दिन सुबह-सुबह उन्हें चक्कर आया और वे गिर पड़े। पड़ोस की सुनीता जी ने उन्हें देखा और तुरंत अस्पताल ले गईं। डॉक्टर ने बताया—ब्लड प्रेशर बहुत बढ़ गया था, कमजोरी भी थी।


सुनीता जी पिछले कुछ सालों से पड़ोस में रहती थीं। खुद भी अकेली थीं—पति का देहांत हो चुका था और बेटी विदेश में रहती थी।


अस्पताल में उन्होंने रामप्रसाद जी का पूरा ध्यान रखा। दवाई से लेकर खाना तक, हर चीज़ समय पर देती रहीं।


रामप्रसाद जी बार-बार कहते,

“आप इतना क्यों कर रही हैं मेरे लिए?”


सुनीता जी मुस्कुरा कर कहतीं,

“क्योंकि मुझे पता है अकेलापन क्या होता है…”



चार दिन बाद जब रामप्रसाद जी घर लौटे, तो सुनीता जी रोज़ उनका हालचाल लेने आने लगीं। कभी चाय बना देतीं, कभी खाना।


धीरे-धीरे दोनों के बीच एक अपनापन पनपने लगा।


शाम को दोनों साथ बैठकर बातें करते—पुरानी यादें, जीवन के अनुभव, कभी हंसी तो कभी आंखों में नमी।


रामप्रसाद जी को अब इंतज़ार रहने लगा था उस शाम का, जब सुनीता जी आएंगी।



एक दिन सुनीता जी नहीं आईं।


रामप्रसाद जी बेचैन हो गए। उन्होंने खुद जाकर देखा—तो पता चला सुनीता जी को तेज़ बुखार है।


इस बार रामप्रसाद जी ने उनकी देखभाल की। दवाई दी, खिचड़ी बनाई, रात भर जागकर उनका ध्यान रखा।


सुनीता जी ने पहली बार महसूस किया कि कोई है जो उनकी भी चिंता करता है।



कुछ दिनों बाद, दोनों पार्क में बैठे थे।


हल्की हवा चल रही थी।


रामप्रसाद जी ने धीरे से कहा,

“सुनीता जी… क्या आपको नहीं लगता कि हम दोनों एक ही खालीपन से गुजर रहे हैं?”


सुनीता जी चुप रहीं।


“अगर… अगर हम इस खालीपन को साथ मिलकर भर दें तो?”

रामप्रसाद जी ने हिचकिचाते हुए कहा।


सुनीता जी ने उनकी तरफ देखा। उनकी आँखों में सवाल भी था और जवाब भी।


“आप कहना क्या चाहते हैं?” उन्होंने धीरे से पूछा।


रामप्रसाद जी बोले,

“मैं ये कहना चाहता हूँ कि… हम एक-दूसरे का सहारा बन जाएं। साथ रहें… बाकी ज़िंदगी साथ बिताएं।”


कुछ पल की खामोशी रही।


फिर सुनीता जी की आँखों से आँसू बह निकले—

“क्या इस उम्र में ये सही होगा?”


रामप्रसाद जी मुस्कुराए—

“सही और गलत तो लोग तय करते हैं… हमें तो बस ये देखना है कि हमें सुकून किसमें मिलता है।”



दोनों ने शादी करने का फैसला लिया।


जब ये बात उनके बच्चों को पता चली, तो उन्होंने विरोध किया।


“लोग क्या कहेंगे?”

“इस उम्र में ये सब ठीक नहीं है!”


रामप्रसाद जी ने शांत स्वर में कहा—

“जब हमें आपकी ज़रूरत थी, तब आपने नहीं सोचा कि हम कैसा महसूस कर रहे हैं…

आज जब हमने अपने लिए जीने का फैसला लिया है, तो आपको समाज याद आ गया?”


बच्चे चुप हो गए।



कुछ ही दिनों बाद, छोटे से मंदिर में सादगी से दोनों ने शादी कर ली।


कोई बड़ा समारोह नहीं था, बस सच्चा साथ था।



अब घर फिर से घर लगने लगा था।


सुबह चाय की खुशबू, शाम की बातें, और बीच-बीच में हंसी…


रामप्रसाद जी ने एक दिन कहा,

“लगता है जिंदगी ने हमें दूसरी सुबह दी है…”


सुनीता जी मुस्कुराईं—

“हाँ… और इस बार हम इसे अकेले नहीं जी रहे।”



सीख:

उम्र सिर्फ एक संख्या है।

साथ, समझ और अपनापन—ये हर उम्र में ज़रूरी होता है।

और अगर जिंदगी दूसरा मौका दे… तो उसे अपनाने में देर नहीं करनी चाहिए।



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