बहू को अपना दुश्मन समझती रही बेटी, लेकिन माँ की एक बात ने उसकी आँखें खोल दीं!
“कई बार इंसान को लगता है कि घर में उसकी जगह कोई दूसरा ले रहा है। धीरे-धीरे यह भावना उसके मन में असुरक्षा, ईर्ष्या और शिकायत का रूप ले लेती है। लेकिन सच्चाई यह होती है कि रिश्तों में प्यार बँटता नहीं, बल्कि बढ़ता है। बस इसे समझने के लिए सही समय और सही समझ की जरूरत होती है...”
आँगन में रखे झूले पर बैठी शारदा देवी चुपचाप अपने पोते को खेलते हुए देख रही थीं। तभी घर के भीतर से ऊँची आवाजें सुनाई देने लगीं।
“भाभी, मैंने कितनी बार कहा है कि पापा जी की दवाइयाँ इस अलमारी में रखा करो।”
“दीदी, मैं पिछले छह महीने से यहीं रख रही हूँ। पापा जी को भी यहीं से लेने की आदत हो गई है।”
“तो आदत बदल दो।”
यह आवाजें थीं पूजा और उसकी भाभी नेहा की।
शारदा देवी ने गहरी साँस ली।
“फिर शुरू हो गई...” उन्होंने मन ही मन कहा।
पूजा इस घर की बड़ी बेटी थी। विवाह के बाद वह दूसरे शहर में रहने लगी थी। उसके पति सरकारी अधिकारी थे और दो प्यारे बच्चे थे। जब भी छुट्टियाँ मिलतीं, वह मायके चली आती।
शुरू-शुरू में सबको उसका आना बहुत अच्छा लगता था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से उसका व्यवहार बदलने लगा था।
किसी भी काम में वह नेहा की गलती निकाल देती।
कभी कहती, “रसोई ठीक से नहीं संभालती।”
कभी कहती, “मम्मी की देखभाल पहले जैसी नहीं होती।”
कभी कहती, “घर की सजावट बदलने की क्या जरूरत थी?”
नेहा हर बार चुप रह जाती।
वह जानती थी कि बड़ी ननद से बहस करने का कोई फायदा नहीं।
लेकिन उसके मन में दर्द जरूर जमा होता जा रहा था।
शारदा देवी और उनके पति रामप्रसाद जी के दो बच्चे थे—पूजा और रोहित।
रोहित की शादी नेहा से हुई थी।
नेहा पढ़ी-लिखी, समझदार और शांत स्वभाव की लड़की थी।
विवाह के बाद उसने पूरे मन से इस घर को अपना लिया था।
रामप्रसाद जी की दवाइयों से लेकर शारदा देवी की पसंद का खाना तक, हर बात का ध्यान रखती।
कई बार शारदा देवी सोचतीं कि भगवान ने उन्हें बेटी नहीं, दूसरी माँ भेज दी है।
लेकिन यही बात शायद पूजा को अंदर ही अंदर परेशान करने लगी थी।
एक दिन मोहल्ले की किसी महिला ने मजाक में कह दिया—
“अब तो आपकी बहू ही आपकी असली बेटी लगती है।”
उस समय सब हँस दिए थे।
लेकिन पूजा के मन में वह बात कहीं बैठ गई।
उसे लगने लगा कि नेहा के आने से उसका महत्व कम हो गया है।
यही कारण था कि अब वह हर छोटी-बड़ी बात में दखल देने लगी थी।
उस दिन भी वही हुआ।
नेहा ने ड्राइंग रूम के पर्दे बदल दिए थे।
पूजा जैसे ही ड्राइंग रूम में पहुँची, उसकी नज़र नए पर्दों पर पड़ी। उसने भौंहें सिकोड़ते हुए पूछा,
“अरे, ये पर्दे कब बदले गए?”
नेहा मुस्कुराते हुए बोली, “कल ही लगाए हैं दीदी। मम्मी जी को ये रंग बहुत पसंद आया था।”
पूजा ने पर्दों को ध्यान से देखते हुए कहा, “मुझे तो पुराने वाले ज़्यादा अच्छे लगते थे। घर पर वही ज्यादा जँचते थे।”
नेहा ने शांत स्वर में जवाब दिया, “मम्मी जी ने ही कहा था कि इस बार थोड़ा अलग रंग लगा लेते हैं।”
यह सुनकर पूजा कुछ तीखे स्वर में बोली,
“अच्छा! अब मम्मी की पसंद-नापसंद का फैसला भी तुम ही करने लगी हो क्या?”
पूजा की बात सुनकर नेहा का चेहरा उतर गया। वह कुछ कहना चाहती थी, लेकिन रिश्ते की मर्यादा और घर की शांति के लिए चुप रह गई। उसने बिना कुछ बोले अपना काम फिर से शुरू कर दिया।
शारदा देवी सब सुन रही थीं।
उन्हें समझ आ गया था कि अब बात केवल पर्दों या दवाइयों की नहीं रही।
समस्या कहीं और थी।
रात को उन्होंने पूजा को अपने कमरे में बुलाया।
“बेटी, जरा बैठ।”
पूजा मुस्कुराते हुए बैठ गई।
“क्या बात है मम्मी? आपने मुझे अचानक कमरे में क्यों बुलाया?” पूजा ने मुस्कुराते हुए पूछा।
शारदा देवी ने कुछ क्षण उसे ध्यान से देखा, फिर धीरे से बोलीं, “एक बात पूछूँ... सच-सच बताएगी?”
“हाँ मम्मी, पूछिए ना।”
“तू खुश तो है न, बेटी?”
पूजा हल्का-सा हँसी, “अरे मम्मी, ये कैसा सवाल है? मैं बिल्कुल खुश हूँ।”
“नहीं,” शारदा देवी ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “तू मुझसे कुछ छिपा रही है।”
पूजा का चेहरा एकदम गंभीर हो गया।
“मैं... मैं समझी नहीं मम्मी।”
शारदा देवी ने प्यार से उसका हाथ अपने हाथों में ले लिया और बोलीं, “मैं तेरी माँ हूँ पूजा। तेरे चेहरे की मुस्कान और तेरे मन की उदासी, दोनों पहचानती हूँ। पिछले कुछ समय से मैं देख रही हूँ कि तेरे मन में कोई बात है जो तुझे भीतर ही भीतर परेशान कर रही है।”
यह सुनते ही पूजा की झुकी हुई पलकों के पीछे छिपी बेचैनी जैसे अचानक बाहर आने को बेचैन हो उठी।
“तुझे लगता है कि इस घर में तेरी जगह कोई ले रहा है?”
यह सुनते ही पूजा की आँखें भर आईं।
वह कुछ पल तक चुप रही।
फिर बोली—
“मम्मी, पहले हर बात मुझसे पूछी जाती थी। अब हर जगह नेहा है।”
“आपकी दवा, पापा का खाना, घर की खरीदारी, त्योहार की तैयारी... सब कुछ।”
“मुझे लगता है जैसे मैं इस घर में मेहमान बनकर रह गई हूँ।”
इतना कहते-कहते उसकी आवाज भर्रा गई।
शारदा देवी प्यार से मुस्कुराईं।
“पगली लड़की।”
“तुझे पता है जब तू पैदा हुई थी तो मैंने भगवान से क्या माँगा था?”
पूजा ने सिर हिलाया।
“मैंने कहा था कि मेरी बेटी हमेशा मेरी बेटी रहे।”
“और भगवान ने मेरी बात मान ली।”
“आज भी तू मेरी बेटी है।”
“कल भी रहेगी।”
“लेकिन नेहा मेरी बहू है।”
“अगर वह मेरा ध्यान रखती है तो इससे तेरा स्थान कैसे कम हो गया?”
“क्या एक माँ अपने दोनों बच्चों से प्यार नहीं कर सकती?”
पूजा चुप रही।
“तूने कभी सोचा कि नेहा तुझसे कितना सम्मान करती है?”
“हर बार तेरी बात सुनकर चुप हो जाती है।”
“क्योंकि वह रिश्ते को बचाना चाहती है।”
“लेकिन उसके दिल को भी चोट लगती होगी।”
पूजा की आँखों से आँसू बहने लगे।
उसी समय दरवाजे के बाहर खड़ी नेहा की भी आँखें नम हो गईं।
वह पानी देने आई थी।
लेकिन अंदर की बातें सुनकर वहीं रुक गई।
उसे पहली बार पता चला कि शारदा देवी उसके लिए कितना सोचती हैं।
उसे हमेशा लगता था कि सास अपनी बेटी का ही पक्ष लेती हैं।
लेकिन आज उसकी गलतफहमी टूट गई।
अगले दिन घर में सभी लोग एक साथ बैठे थे।
नेहा रसोई में पकौड़े बना रही थी।
तभी पूजा अंदर गई।
नेहा ने सोचा कि फिर कोई कमी निकलेगी।
लेकिन अगले ही पल पूजा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“भाभी... नहीं, मेरी छोटी बहन।”
नेहा ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा।
“मुझसे गलती हो गई।”
“मैंने बिना वजह तुम्हें परेशान किया।”
“मुझे लगा था कि तुम मेरी जगह ले रही हो।”
“लेकिन अब समझ गई हूँ कि रिश्तों में जगह छीनी नहीं जाती।”
“दिल में नई जगह बनती है।”
नेहा की आँखें भी भर आईं। उसने बिना एक पल गंवाए पूजा का हाथ थाम लिया और भावुक होकर बोली,
“दीदी, सच कहूँ तो शादी के बाद से मुझे हमेशा एक बड़ी बहन की कमी महसूस होती थी। मैं चाहती थी कि कोई मुझे प्यार से समझाए, मेरा मार्गदर्शन करे और ज़रूरत पड़ने पर मेरा साथ दे। लेकिन मैं आपकी डाँट और नाराज़गी को ही अपना भाग्य समझ बैठी थी। आज पहली बार महसूस हो रहा है कि मुझे सचमुच अपनी बड़ी बहन मिल गई है।”
इतना कहते ही उसने पूजा को गले लगा लिया।
पूजा की आँखों से भी आँसू बह निकले। उसने प्यार से नेहा के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,
“और मुझे भी आज एक भाभी नहीं, छोटी बहन मिल गई है।”
उसी समय रोहित रसोई के दरवाज़े पर पहुँचा। दोनों को गले मिलते देखकर वह मुस्कुरा पड़ा और मज़ाक में बोला,
“वाह! लगता है आज घर में कोई बहुत बड़ी सुलह हो गई है। अब मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा कि ये वही दीदी और नेहा हैं जो छोटी-छोटी बातों पर बहस कर लिया करती थीं।”
उसकी बात सुनकर दोनों हँस पड़ीं।
शारदा देवी दूर खड़ी यह दृश्य देख रही थीं।
उनकी आँखों में खुशी के आँसू थे।
उन्हें लगा जैसे वर्षों से जमा हुआ कोई बोझ उतर गया हो।
उस दिन घर में सिर्फ पकौड़ों की खुशबू नहीं थी।
रिश्तों की मिठास भी पूरे घर में फैल गई थी।
कई बार परिवार में नया सदस्य आने पर किसी पुराने सदस्य को लगता है कि उसका महत्व कम हो गया है। लेकिन सच्चाई यह है कि परिवार प्यार का वह वृक्ष है जिसमें नई शाखाएँ जुड़ने से पुरानी शाखाएँ कमजोर नहीं होतीं। यदि समय रहते कोई समझदार व्यक्ति स्थिति को संभाल ले, तो रिश्तों में आई कड़वाहट भी फिर से मिठास में बदल सकती है।

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