रिश्ते आदतों से नहीं, सम्मान से बनते हैं
“कई बार हमें लगता है कि जो इंसान पहली नज़र में हमारे स्वभाव से बिल्कुल अलग है, वह हमारे परिवार का हिस्सा कभी नहीं बन सकता। लेकिन रिश्ते समान आदतों से नहीं, बल्कि दिल की अच्छाई, सम्मान और अपनापन से बनते हैं। और जब यह बात समझ आती है, तब हमारी कई धारणाएँ अपने आप बदल जाती हैं...”
रसोई में काम करते हुए मैं बार-बार घड़ी की तरफ देख रही थी। आज बेटी नेहा अपने कॉलेज के एक खास दोस्त को घर लाने वाली थी। पिछले कई महीनों से उसका नाम मेरे कानों में पड़ रहा था।
"मम्मी, आरव बहुत अच्छा लड़का है।"
"मम्मी, आरव ने मेरी बहुत मदद की।"
"मम्मी, आपको आरव जरूर पसंद आएगा।"
जब किसी का नाम बार-बार सुनाई देने लगे तो समझते देर नहीं लगती कि मामला सिर्फ दोस्ती तक सीमित नहीं है।
सच कहूँ तो मैं मन ही मन थोड़ा चिंतित थी। एक-दो बार वीडियो कॉल पर उसे देखा भी था। लंबे बाल, हमेशा हँसता हुआ चेहरा और हर समय मज़ाक करने की आदत। मुझे लगा था कि इतना चंचल लड़का ज़िम्मेदार कैसे हो सकता है।
दरवाज़े की घंटी बजी।
नेहा दौड़कर दरवाज़ा खोलने गई।
अगले ही पल वह एक लंबे से लड़के के साथ अंदर आई।
"मम्मी, ये आरव है।"
मैं कुछ बोलती उससे पहले ही वह झुककर मेरे पैर छू चुका था।
"नमस्ते आंटी।"
"खुश रहो बेटा।"
उसके बाद वह पूरे घर को ऐसे देखने लगा जैसे किसी संग्रहालय में आया हो।
दीवार पर लगी पुरानी तस्वीर देखकर बोला, "वाह आंटी, यह फोटो कितनी सुंदर है। यह आपके विवाह की है क्या?"
मैंने हाँ में सिर हिलाया।
"सच बताऊँ, आजकल ऐसी तस्वीरों में जो अपनापन दिखता है ना, वह मोबाइल कैमरों में नहीं आता।"
उसकी बात सुनकर मैं थोड़ी हैरान हुई।
फिर उसकी नज़र बैठक में रखी पुरानी सिलाई मशीन पर पड़ी।
"अरे! बिल्कुल ऐसी ही मशीन मेरी दादी के पास भी थी। मैं बचपन में उसका पहिया घुमाता रहता था।"
वह लगातार कुछ न कुछ बोलता जा रहा था।
मैंने मन ही मन सोचा, "हे भगवान, यह लड़का चुप भी होता है या नहीं?"
उधर नेहा मेरी मनःस्थिति समझ रही थी।
उसने आँखों से ही आरव को थोड़ा शांत रहने का इशारा किया।
कुछ मिनट वह चुप रहा, लेकिन फिर शुरू हो गया।
कभी घर की तारीफ़, कभी सजावट की तारीफ़, कभी खाने की खुशबू की तारीफ़।
मुझे लगने लगा कि यह लड़का शायद दुनिया का सबसे बड़ा बातूनी इंसान है।
थोड़ी देर बाद हम सब खाने की मेज़ पर बैठ गए।
मैंने हमेशा की तरह नेहा की पसंद की चीज़ें बनाई थीं।
बचपन से उसकी आदत थी कि खाने से पहले वह मेरे हाथ से पहला कौर खाती थी।
आज भी आदतन मैंने रोटी का छोटा सा टुकड़ा तोड़ा और उसकी तरफ बढ़ा दिया।
लेकिन नेहा हल्का सा मुस्कुराई।
"मम्मी, अब मैं छोटी बच्ची नहीं रही।"
बस इतना सुनना था कि मेरा हाथ वहीं रुक गया।
दिल में अचानक एक खालीपन सा महसूस हुआ।
शायद सचमुच बच्चे बड़े हो जाते हैं।
मेरे चेहरे की उदासी शायद दोनों ने देख ली थी।
तभी आरव ने मुस्कुराते हुए कहा,
"आंटी, अगर नेहा बड़ी हो गई है तो क्या हुआ? मैं तो अभी भी बच्चा हूँ। पहला कौर मुझे खिला दीजिए।"
मैं कुछ समझ पाती उससे पहले उसने झट से मुँह खोल दिया।
नेहा हँसने लगी।
मजबूर होकर मैंने उसे कौर खिला दिया।
वह ऐसे खुश हुआ जैसे कोई पाँच साल का बच्चा हो।
"वाह! अब समझ आया कि नेहा आपके हाथ के खाने की इतनी तारीफ़ क्यों करती है।"
मैं भी हँस पड़ी।
फिर उसने अचानक गंभीर होकर कहा,
"आंटी, सच बताऊँ? मेरे बचपन में माँ नौकरी करती थीं। बहुत व्यस्त रहती थीं। उन्होंने हमारे लिए बहुत मेहनत की, लेकिन मुझे उनके हाथ से खाने का मौका बहुत कम मिला। इसलिए जब भी किसी माँ को अपने बच्चे को प्यार से खिलाते देखता हूँ ना, तो बहुत अच्छा लगता है।"
उसकी आवाज़ में छिपी कमी साफ महसूस हो रही थी।
पहली बार मुझे उस लड़के की बातों के पीछे का दिल दिखाई दिया।
खाना खत्म हुआ तो मैं बर्तन समेटने लगी।
आरव भी तुरंत उठ खड़ा हुआ।
"आंटी, मैं मदद कर देता हूँ।"
"नहीं बेटा, रहने दो।"
"क्यों? क्या लड़के बर्तन नहीं उठा सकते?"
मैं उसके जवाब पर मुस्कुरा दी।
उसने बिना किसी दिखावे के प्लेटें उठाईं और रसोई तक पहुँचाने लगा।
उसी समय पड़ोस वाली शर्मा जी आ गईं।
उन्होंने आरव को रसोई में प्लेट रखते देखा तो हँसकर बोलीं,
"अरे बेटा, अभी से घर के काम शुरू कर दिए?"
मैं समझ गई कि उनका इशारा क्या है।
लेकिन इससे पहले कि मैं कुछ कहती, आरव ने मुस्कुराकर जवाब दिया,
"आंटी, घर के काम किसी एक के नहीं होते। जिस घर में खाना सब खाते हैं, वहाँ जिम्मेदारी भी सबकी होनी चाहिए।"
शर्मा जी चुप हो गईं।
मैं भी कुछ क्षण उसे देखती रह गई।
उसकी बात बहुत साधारण थी, लेकिन सोच बहुत अच्छी थी।
थोड़ी देर बाद नेहा अपने कमरे में कुछ लेने चली गई।
मैं और आरव अकेले बैठे थे।
उसने धीरे से कहा,
"आंटी, मैं जानता हूँ कि आप मुझे परख रही हैं।"
मैं थोड़ा असहज हो गई।
वह मुस्कुराया।
"और आपको पूरा हक है। अगर मेरी बेटी होती तो मैं भी यही करता।"
उसके इस जवाब ने मुझे भीतर तक छू लिया।
फिर उसने आगे कहा,
"मैं बस इतना चाहता हूँ कि आप मुझे मेरे कपड़ों, मेरी बातों या मेरे हँसमुख स्वभाव से मत परखिए। मुझे मेरे व्यवहार से पहचानिए।"
उसकी आँखों में ईमानदारी साफ दिखाई दे रही थी।
तभी नेहा वापस आ गई।
वह दोनों साथ बैठे बातें करने लगे।
मैं उन्हें देख रही थी।
दोनों की पसंद अलग थी।
स्वभाव अलग थे।
बोलने का तरीका अलग था।
लेकिन एक चीज़ समान थी—एक-दूसरे के लिए सम्मान।
और शायद यही किसी भी रिश्ते की सबसे मजबूत नींव होती है।
घर से जाते समय आरव ने फिर मेरे पैर छुए।
"आंटी, अगली बार आऊँ तो आपके हाथ का खीर जरूर खाऊँगा। नेहा कहती है कि दुनिया की सबसे अच्छी खीर आप बनाती हैं।"
मैं हँस दी।
"ठीक है, लेकिन अगली बार इतना बोलना मत।"
वह ज़ोर से हँसा।
"कोशिश करूँगा आंटी, लेकिन गारंटी नहीं दे सकता।"
उसके जाने के बाद नेहा मेरे पास आकर बैठ गई।
"तो मम्मी, कैसा लगा आरव?"
मैं कुछ क्षण चुप रही।
फिर मुस्कुराकर बोली,
"सच कहूँ तो पहली बार वीडियो कॉल पर देखकर मुझे लगा था कि यह लड़का बहुत बातूनी है।"
"फिर?"
"फिर आज समझ आया कि कुछ लोग ज़्यादा बोलते ज़रूर हैं, लेकिन उनके दिल भी उतने ही साफ होते हैं।"
नेहा की आँखें चमक उठीं।
मैंने उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरा और कहा,
"सिर्फ तुम्हारी पसंद ही अच्छी नहीं है बेटी... तुम्हारी सोच भी बहुत अच्छी है। और तुम्हारी जैसी सोच वाला यह लड़का मुझे बहुत पसंद आया है।"
मेरी बात सुनकर नेहा मुस्कुरा दी...
और शायद पहली बार, उसके चेहरे पर वही शर्म दिखाई दी जो हर माँ अपनी बेटी के चेहरे पर देखना चाहती है।

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