तीस साल का प्यार
बरसात अभी-अभी रुकी थी। छत से पानी की बूंदें टपक रही थीं और गली में मिट्टी की भीनी खुशबू फैली हुई थी। शाम का धुंधलका धीरे-धीरे पूरे मोहल्ले पर उतर रहा था।
लेकिन वर्मा परिवार के छोटे से घर के अंदर उस समय अलग ही हलचल थी।
रसोई में दाल चढ़ी हुई थी और मीना देवी जल्दी-जल्दी रोटियाँ सेंक रही थीं। तभी उनका पुराना मोबाइल बज उठा।
उन्होंने आटे वाले हाथ धोए और फोन उठाया।
स्क्रीन पर बेटी कृतिका का मैसेज चमक रहा था—
“माँ, इस बार आपकी और पापा की शादी को तीस साल पूरे हो रहे हैं। मैं पैसे भेज रही हूँ। इस बार अपने लिए कुछ अच्छा लेना। हर बार मेरी बात टाल देती हो। पापा के लिए गर्म स्वेटर और अपने लिए सोने की छोटी सी अंगूठी जरूर लेना।”
मैसेज पढ़ते ही मीना देवी कुछ पल के लिए चुप हो गईं।
उनकी नजर सामने बैठे पति देवेंद्र पर गई जो पुराने स्टूल पर बैठकर अपनी टूटी हुई घड़ी ठीक करने की कोशिश कर रहे थे।
देवेंद्र पहले बस अड्डे पर टिकट चेक करने का काम करते थे। तनख्वाह ज्यादा नहीं थी, लेकिन जिम्मेदारियाँ बहुत थीं।
घर किराया, बेटी की फीस, बूढ़ी माँ की दवाई… सब कुछ उसी छोटी सी कमाई में चलता था।
मीना देवी कई बार अपने लिए साड़ी तक नहीं खरीदती थीं ताकि बेटी की किताबें आ सकें।
और देवेंद्र…
वो तो वर्षों से एक ही स्वेटर पहन रहे थे।
कृतिका बचपन से ये सब देखती आई थी।
उसे याद था कैसे उसकी माँ रातभर दूसरों के कपड़ों में फॉल लगाती थीं ताकि अगले दिन उसकी कोचिंग की फीस भर सके।
अब वही कृतिका बैंक में नौकरी करने लगी थी।
उसने पहली बार महसूस किया था कि अब माता-पिता को आराम देना उसकी जिम्मेदारी है।
अगले दिन मीना देवी बाजार जाने की तैयारी करने लगीं। पड़ोस की शांति भाभी भी साथ चल दीं।
उधर देवेंद्र अपने पुराने दोस्त सतीश के साथ बाजार निकल गए।
शाम ढल चुकी थी जब मीना देवी घर लौटीं।
घर के अंदर कदम रखते ही उनकी नजर कमरे के कोने पर पड़ी।
वहाँ एक बड़ा सा नया लकड़ी का आरामकुर्सी रखा था।
मुलायम गद्दी वाला।
“अरे ये कुर्सी किसकी है?”
मीना देवी ने आश्चर्य से पूछा।
देवेंद्र मुस्कुराए।
“तुम्हारी।”
“मेरी?”
“हाँ। तुम्हारे घुटनों में दर्द रहता है न। रोज जमीन पर बैठकर सब्ज़ी काटती हो। इसलिए सोचा इस बार स्वेटर बाद में ले लूँगा।”
मीना देवी की आँखें भर आईं।
“आप भी ना…”
इतने में बाहर से आवाज आई—
“देवेंद्र भैया जरा बाहर आइए।”
देवेंद्र बाहर आए तो दरवाजे के पास नया छोटा सा टीवी रखा था।
सतीश हँसते हुए बोला—
“भाभी लाई हैं आपके लिए। रोज शर्मा जी के घर जाकर क्रिकेट देखते थे न।”
देवेंद्र एकदम चुप रह गए।
उन्होंने मीना की तरफ देखा।
“मतलब तुम अंगूठी नहीं लाई?”
मीना मुस्कुरा दीं।
“और आपने भी तो स्वेटर नहीं लिया।”
दोनों कुछ पल तक एक-दूसरे को देखते रहे। फिर हल्की सी हँसी दोनों के चेहरे पर फैल गई।
तभी मोबाइल पर वीडियो कॉल आने लगी।
कृतिका कॉल कर रही थी।
दोनों घबरा गए।
“अब क्या बोलेंगे?” देवेंद्र फुसफुसाए।
मीना ने धीरे से कॉल उठाई।
स्क्रीन पर कृतिका दिखाई दी।
“तो दिखाइए… क्या खरीदा?”
लेकिन अगले ही पल उसकी नजर पीछे रखी आरामकुर्सी और टीवी पर चली गई।
वो सब समझ गई।
उसकी आँखें नम हो गईं।
“आप दोनों सच में दुनिया के सबसे अलग लोग हो।”
मीना घबरा गईं।
“बेटा… वो…”
लेकिन कृतिका मुस्कुराते हुए बोली—
“मुझे पता था। आप दोनों अपने लिए कुछ नहीं लोगे। हमेशा एक-दूसरे के बारे में सोचोगे।”
देवेंद्र धीरे से बोले—
“अरे पगली… तेरी माँ खुश रहती है तो घर अच्छा लगता है।”
मीना तुरंत बोलीं—
“और ये बिना टीवी के कितने उदास रहते थे।”
तीनों हँस पड़े।
कुछ देर बाद कृतिका बोली—
“आज समझ आता है कि शादी सिर्फ साथ रहने का नाम नहीं होता… बल्कि हर छोटी खुशी दूसरे के लिए छोड़ देने का नाम होता है। आपने मुझे यही सिखाया है।”
मीना की आँखों से आँसू बह निकले।
उसी समय देवेंद्र अंदर गए और एक छोटा सा डिब्बा लेकर आए।
उसमें लाल रंग की काँच की चूड़ियाँ थीं।
“अरे ये कब ली?” मीना हैरान रह गईं।
देवेंद्र मुस्कुराए—
“इतने सालों बाद हमारी सालगिरह है… कुछ तो होना चाहिए।”
मीना शर्म से मुस्कुरा दीं।
उन्होंने धीरे से चूड़ियाँ पहन लीं।
चूड़ियों की खनक पूरे कमरे में गूंज उठी।
मोबाइल स्क्रीन के उस पार बैठी कृतिका अपने माता-पिता को देखती रही।
उस छोटे से घर में उस रात कोई बड़ी पार्टी नहीं थी…
ना महंगे कपड़े…
ना होटल का खाना…
फिर भी वहाँ प्रेम इतना था कि हर चीज़ खूबसूरत लग रही थी।

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