अब डर नहीं, हक़ मिलेगा
“तुमसे जितना हो सके उतना काम कर लो, बाद में आराम ही करना है…”
सास की यह बात सुनकर सीमा ने अपने सूजे हुए पैरों की तरफ देखा और चुपचाप झाड़ू उठाकर काम में लग गई।
सीमा सात महीने की गर्भवती थी। शरीर थक चुका था, लेकिन घर में उसकी थकान किसी को दिखाई नहीं देती थी।
उसका पति अमित सुबह काम पर चला जाता और देर रात लौटता। सास, सावित्री देवी, हमेशा यही कहतीं—
“हमने भी बच्चे पैदा किए हैं, कोई रानी नहीं थीं हम।”
सीमा चुप रहती… क्योंकि उसे सिखाया गया था कि बहू को सहना चाहिए।
लेकिन धीरे-धीरे यह सहना उसके शरीर और मन दोनों को तोड़ रहा था।
एक दिन सीमा रसोई में खड़ी थी। गैस की गर्मी, शरीर का बोझ और चक्कर… सब मिलकर उसे कमजोर कर रहे थे।
अचानक उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया और वह वहीं गिर पड़ी।
आवाज़ सुनकर पड़ोस की अनीता दौड़कर आई।
“अरे सीमा! क्या हुआ?”
सावित्री देवी बाहर आईं और बोलीं—
“नाटक कर रही है… काम से बचने के लिए।”
अनीता ने गुस्से में कहा—
“नाटक नहीं है ये! हालत देखिए इसकी!”
उन्होंने तुरंत अमित को फोन किया।
अमित घबराहट में तेज़ी से घर के अंदर घुसा। जैसे ही उसकी नज़र फर्श पर पड़ी सीमा पर गई, उसका दिल ज़ोर से धड़कने लगा। वह तुरंत उसके पास पहुँचा और घुटनों के बल बैठ गया।
“माँ, आपने ध्यान क्यों नहीं रखा?” उसकी आवाज़ चिंता और गुस्से से भरी थी।
सावित्री देवी ने बेपरवाही से कहा—
“अरे, इतना भी क्या हो गया… हम भी तो ऐसे ही काम करते थे।”
इस बार अमित खुद को रोक नहीं पाया। उसने सख्ती से कहा—
“बस माँ! हर बार अपनी मिसाल मत दीजिए… सीमा अलग है, और अभी इसकी हालत ठीक नहीं है!”
उसने बिना देर किए सीमा को संभाला और तुरंत अस्पताल ले जाने की तैयारी करने लगा।
डॉक्टर ने चेकअप के बाद गंभीर आवाज में कहा—
“इनका ब्लड प्रेशर काफी बढ़ा हुआ है। ज़्यादा तनाव और लगातार काम करने की वजह से इनकी हालत बिगड़ गई है।”
अमित घबराकर तुरंत बोला—
“डॉक्टर… बच्चा ठीक है ना?”
डॉक्टर ने संयम से जवाब दिया—
“फिलहाल बच्चा सुरक्षित है, लेकिन अगर अब भी ध्यान नहीं रखा गया, तो स्थिति गंभीर हो सकती है।”
यह सुनते ही सीमा की आँखों से आँसू बहने लगे।
उसे दर्द अपने शरीर का कम, और अपनों की बेरुखी का ज़्यादा महसूस हो रहा था।
अस्पताल के कमरे में रात को अमित चुप बैठा था।
सीमा ने धीरे से कहा—
“अमित… अगर मुझे कुछ हो गया तो हमारे बच्चे का क्या होगा?”
अमित की आँखें भर आईं—
“ऐसा कुछ नहीं होगा… मैं हूँ ना।”
सीमा ने पहली बार सीधा सवाल किया—
“लेकिन क्या तुम सच में मेरे साथ हो?”
यह सवाल अमित के दिल में उतर गया।
अगले दिन डॉक्टर ने साफ कहा—
“इन्हें पूरा आराम चाहिए। कोई काम नहीं। मानसिक शांति बहुत जरूरी है।”
घर लौटते समय अमित ने फैसला कर लिया था।
घर पहुँचते ही सावित्री देवी बोलीं—
“अब तो ठीक है ना? चलो, रसोई संभालो…”
अमित ने सख्त आवाज में कहा—
“माँ, अब सीमा कोई काम नहीं करेगी।”
“क्या मतलब?” सावित्री देवी चौंकीं।
“मतलब साफ है। डॉक्टर ने मना किया है… और अब मैं भी मना कर रहा हूँ।”
सावित्री देवी नाराज़ हो गईं—
“बहू के लिए माँ से ऐसे बात करता है?”
अमित ने शांत लेकिन मजबूत आवाज में कहा—
“माँ, ये बहू नहीं… मेरी पत्नी है… और मेरे बच्चे की माँ।”
घर में पहली बार कोई सीमा के लिए खड़ा हुआ था।
सीमा के अंदर कुछ बदल गया।
अब वो डर नहीं रही थी।
उसने भी धीरे से कहा—
“माँजी, मैंने बहुत सहा है… लेकिन अब नहीं। मैं अपने बच्चे के लिए जी रही हूँ… और उसके लिए मजबूत रहूँगी।”
सावित्री देवी चुप हो गईं।
दिन बीतने लगे।
सीमा अब आराम कर रही थी। अमित उसका ध्यान रखता था।
धीरे-धीरे सावित्री देवी का व्यवहार भी बदलने लगा।
एक दिन उन्होंने खुद सीमा के लिए दूध लाकर दिया।
“पी ले… डॉक्टर ने कहा था ना…”
सीमा ने आश्चर्य से उनकी तरफ देखा।
सावित्री देवी नजरें चुराकर बोलीं—
“हमसे गलती हो गई…”
यह पहला कदम था।
कुछ हफ्तों बाद, सीमा ने एक स्वस्थ बेटी को जन्म दिया।
अमित की आँखों में खुशी थी।
सावित्री देवी ने बच्ची को गोद में लिया और धीरे से कहा—
“मुझे माफ कर दे बहू… अब ये गलती दोबारा नहीं होगी।”
सीमा मुस्कुराई।
उस दिन के बाद घर सच में बदल गया।
डर से नहीं… समझ से।
सम्मान से।
सीख:
चुप रहना हमेशा सहनशीलता नहीं होता…
कभी-कभी आवाज उठाना ही सही होता है—अपने लिए, और अपने आने वाले कल के लिए।

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