अधूरी सी मुस्कान

 

Indian mother holding adopted baby girl with family in emotional home moment


रीता लगभग 41 साल की एक गृहिणी थी। उसका घर बड़ा था, परिवार भी अच्छा-खासा था। पति की अच्छी नौकरी थी, पैसों की कोई कमी नहीं थी। तीन बेटे थे—बड़ा कॉलेज में, दूसरा बारहवीं में और सबसे छोटा आठवीं में पढ़ता था।


बाहर से देखने पर सब कुछ बिल्कुल परफेक्ट लगता था।


लेकिन रीता के भीतर कुछ था… जो हमेशा अधूरा-सा महसूस होता।


वह रोज़ सुबह उठती, सबके लिए नाश्ता बनाती, घर संभालती, पति और बच्चों की ज़रूरतों का ध्यान रखती—सब कुछ ठीक चलता था। फिर भी, दिन के किसी न किसी पल में उसके दिल में एक खालीपन उतर आता।


कभी वह खिड़की के पास बैठ जाती, कभी पुराने एल्बम निकालकर देखने लगती… और कभी बिना वजह उसकी आँखें नम हो जातीं।


उसके पति अजय कई बार पूछ चुके थे,

“रीता, तुम ठीक तो हो ना? कुछ परेशान हो क्या?”


रीता हर बार मुस्कुरा कर टाल देती,

“नहीं, बस यूँ ही… सब ठीक है।”


लेकिन सच यह था कि उसे खुद नहीं पता था कि उसे क्या चाहिए।


धीरे-धीरे बच्चे बड़े होते गए।

अब उन्हें माँ की ज़रूरत पहले जैसी नहीं रही।


बड़ा बेटा अपने दोस्तों और करियर में व्यस्त था,

मंझला मोबाइल और पढ़ाई में,

और छोटा भी अब अपने ही दायरे में सिमटने लगा था।


पहले जो बच्चे हर छोटी बात पर “माँ-माँ” करते थे,

अब वही कभी-कभी पूरे दिन उससे बात भी नहीं करते थे।


रीता को यह बदलाव चुभता था…

पर वह कुछ कह भी नहीं पाती थी।


एक दिन शाम को उसने देखा—तीनों बेटे और अजय हॉल में बैठकर हँस रहे थे, क्रिकेट मैच देख रहे थे।


वह भी पास जाकर बैठ गई।


लेकिन कुछ देर बाद उसे महसूस हुआ…

वह वहाँ होते हुए भी जैसे वहाँ नहीं थी।


उसकी बातों में किसी की खास दिलचस्पी नहीं थी।


वह चुपचाप उठकर किचन में चली गई।


उस रात वह देर तक सो नहीं पाई।


अचानक उसके मन में एक विचार आया…


“क्या मेरे जीवन में कुछ कमी है?”


कई दिनों तक वह इसी सवाल से जूझती रही।


फिर एक सुबह, उसने हिम्मत करके अजय से कहा—


“क्या आप मेरी एक बात मानेंगे?”


अजय ने अखबार रखते हुए कहा,

“तुमने कब कहा और मैंने मना किया? बोलो।”


रीता थोड़ी झिझकी… फिर बोली—

“मैं एक बच्ची गोद लेना चाहती हूँ।”


अजय कुछ पल के लिए चुप रह गया।


“बच्ची? लेकिन क्यों, रीता? हमारे तीन-तीन बच्चे हैं…”


रीता की आँखें भर आईं,

“बस… कारण मत पूछिए। मुझे लगता है… मेरी ज़िंदगी में कुछ अधूरा है। शायद एक बेटी उस खालीपन को भर दे।”


अजय ने पहली बार उसकी आँखों में वह दर्द देखा, जिसे वह सालों से छुपा रही थी।


उसने धीरे से कहा,

“अगर इससे तुम्हें खुशी मिलती है… तो मुझे कोई आपत्ति नहीं।”


जब बच्चों को यह बात बताई गई, तो वे हैरान तो हुए, लेकिन उन्होंने भी मना नहीं किया।


कुछ ही हफ्तों बाद, रीता एक नन्ही-सी बच्ची को घर ले आई।


सिर्फ डेढ़ महीने की थी वह…

छोटी-सी, मासूम, और बेहद प्यारी।


जैसे ही रीता ने उसे गोद में लिया, उसकी आँखों से आँसू बहने लगे—

लेकिन ये आँसू दुख के नहीं… सुकून के थे।


उसने बच्ची का नाम रखा—"आर्या"।


घर का माहौल बदलने लगा।


जहाँ पहले सन्नाटा रहता था, अब वहाँ किलकारियाँ गूंजने लगीं।


रीता का दिन अब आर्या के साथ बीतता—उसे नहलाना, खिलाना, सुलाना…


वह फिर से माँ बन गई थी…

लेकिन इस बार कुछ अलग एहसास के साथ।


धीरे-धीरे तीनों बेटे भी आर्या से जुड़ने लगे।


बड़ा बेटा उसे गोद में लेकर पढ़ाई करता,

मंझला उसके लिए खिलौने लाता,

और छोटा तो हर समय उसके पास ही रहता।


अजय भी ऑफिस से आते ही सबसे पहले आर्या को देखने जाता।


एक दिन घर में छोटा-सा समारोह रखा गया।


सभी रिश्तेदार और पड़ोसी आए हुए थे।


सबके मन में एक ही सवाल था—

“जब तीन बेटे हैं, तो बेटी क्यों गोद ली?”


रीता ने सबके सामने मुस्कुराते हुए कहा—


“आज मैं आप सबके ‘क्यों’ का जवाब देना चाहती हूँ…”


सभी शांत हो गए।


रीता ने आगे कहा—


“मेरे पास सब कुछ था—पैसा, परिवार, तीन अच्छे बेटे… लेकिन फिर भी मेरे दिल में एक खालीपन था। मैं खुद को अपने बच्चों में ढूंढ़ती थी… पर कहीं ना कहीं मैं खुद को नहीं देख पाती थी।”


वह थोड़ी रुकी, फिर बोली—


“बेटी सिर्फ एक संतान नहीं होती…

वह माँ का एक हिस्सा होती है।

उसमें माँ का बचपन, उसकी भावनाएँ और उसकी छाया होती है।”


सब ध्यान से सुन रहे थे।


“मैं यह नहीं कहती कि बेटे कम हैं…

वे मेरे गर्व हैं।

लेकिन बेटी… बेटी घर की संवेदना होती है, अपनापन होती है।”


रीता की आवाज़ थोड़ी भर्रा गई—


“आज के समय में लोग बेटी होने से डरते हैं…

कई जगह तो उसे जन्म लेने से पहले ही मार दिया जाता है।

लेकिन मैं मानती हूँ—जहाँ बेटी नहीं होती, वहाँ कुछ ना कुछ अधूरा जरूर रह जाता है।”


पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा।


अजय ने गर्व से रीता की ओर देखा।


और उसी पल…

रीता के चेहरे पर जो मुस्कान थी,

वह अब पूरी थी—


बिल्कुल पूरी।



No comments

Note: Only a member of this blog may post a comment.

Powered by Blogger.