बहू का सम्मान
पूरे आंगन में रिश्तेदारों की भीड़ लगी थी, लेकिन घर के एक कोने में बैठी राधा की ओर किसी की नजर तक नहीं जा रही थी।
घर में खुशियों का माहौल था। बड़े बेटे रोहित की बेटी की सगाई थी। दूर-दूर से रिश्तेदार आए थे। आंगन रंग-बिरंगी झालरों से सजा हुआ था। रसोई से तरह-तरह के पकवानों की खुशबू आ रही थी। हर कोई तैयारियों में व्यस्त था।
लेकिन इस पूरे घर में एक इंसान ऐसा भी था, जो हर काम में सबसे आगे होने के बावजूद सबसे पीछे कर दिया गया था। वह थी राधा।
राधा इस घर की बड़ी बहू थी। पंद्रह साल पहले जब वह इस घर में आई थी, तब उसके सपनों की कोई कमी नहीं थी। उसने सोचा था कि यह घर ही उसका संसार होगा। वह सबका दिल जीत लेगी और सब उसे अपनी बेटी जैसा प्यार देंगे।
लेकिन समय के साथ उसकी पहचान सिर्फ एक जिम्मेदार बहू बनकर रह गई।
सुबह सबसे पहले उठना, सबके लिए खाना बनाना, मेहमानों की सेवा करना, बच्चों का ध्यान रखना, बुजुर्गों की दवा देना और घर के हर छोटे-बड़े काम को संभालना उसकी आदत बन गई थी। किसी को उससे शिकायत नहीं थी, क्योंकि शिकायत का मौका ही नहीं मिलता था।
फिर भी तारीफ कभी नहीं मिली।
अगर कोई काम अच्छा होता तो लोग कहते, "अरे, यह तो उसका फर्ज है।"
और अगर छोटी-सी भी गलती हो जाती, तो वही सबसे बड़ी चर्चा बन जाती।
उसकी सास कमला देवी अक्सर लोगों के सामने अपनी छोटी बहू निशा की तारीफ करती थीं।
"देखो हमारी छोटी बहू कितनी मॉडर्न है। कितनी स्मार्ट है। हर किसी से खुलकर बात करती है।"
राधा वहीं खड़ी मुस्कुरा देती।
उसे पता था कि उसकी तुलना हमेशा किसी न किसी से की जाएगी।
उसने कभी जवाब देना नहीं सीखा था।
इधर सगाई की तैयारियां जोरों पर थीं।
कमला देवी ने रिश्तेदारों के सामने कहा, "सजावट का पूरा जिम्मा निशा संभाल रही है। आजकल नई पीढ़ी को ऐसी चीजें अच्छी आती हैं।"
राधा वहीं खड़ी थी।
असलियत यह थी कि सजावट का सामान भी उसी ने खरीदा था। फूल भी उसी ने मंगवाए थे। मेहमानों के कमरे भी उसी ने तैयार किए थे। लेकिन किसी ने उसका नाम लेना जरूरी नहीं समझा।
राधा चुपचाप रसोई में चली गई।
उधर निशा अपनी सहेलियों के साथ फोटो खिंचवाने में व्यस्त थी।
तभी घर के बाहर कई महंगी गाड़ियां आकर रुकीं।
लड़के वालों का परिवार तय समय से पहले पहुंच गया था।
सब लोग उनका स्वागत करने दौड़े।
मिठाई परोसी गई। ठंडे पेय दिए गए।
कुछ देर बाद लड़के के पिता ने मुस्कुराते हुए कहा,
"हमने आपकी बहुत तारीफ सुनी है। खासकर घर के खाने की। अगर अनुमति हो तो आज होटल का खाना छोड़कर घर का बना खाना ही खाना चाहेंगे।"
कमला देवी मुस्कुराईं।
"अरे क्यों नहीं?"
उन्होंने तुरंत कैटरिंग वाले को बुलाने के लिए फोन किया।
लेकिन अगले ही पल उनके चेहरे का रंग उड़ गया।
कैटरिंग वाले ने फोन नहीं उठाया।
बार-बार कोशिश की गई।
आखिर काफी देर बाद जवाब मिला।
"माफ कीजिए, हमारे किचन में अचानक आग लग गई। आज आपकी बुकिंग पूरी नहीं हो पाएगी।"
कमला देवी के पैरों तले जमीन खिसक गई।
करीब पचास मेहमान।
इतने सारे रिश्तेदार।
और घर में तैयार खाना सिर्फ परिवार के लिए।
अब क्या होगा?
रिश्तेदारों में कानाफूसी शुरू हो गई।
"इतने बड़े घर में यह कैसी व्यवस्था है?"
"पहले से तैयारी नहीं करनी चाहिए थी क्या?"
कमला देवी के माथे पर पसीना आ गया।
निशा घबरा गई।
"मम्मी जी... मैं इतने लोगों का खाना नहीं बना सकती।"
घर के पुरुष भी परेशान हो गए।
हर होटल में फोन किया गया।
कहीं से भी तुरंत खाना मिलने की उम्मीद नहीं थी।
तभी राधा धीरे से आगे आई।
"माँ जी... अगर आप कहें तो मैं कोशिश कर सकती हूँ।"
कमला देवी ने उसकी ओर देखा।
"इतने लोगों का खाना?"
"जी। अगर घर के सब लोग थोड़ा-थोड़ा साथ दे दें तो हो जाएगा।"
कुछ लोगों ने मन ही मन हँसी उड़ाई।
"इतना आसान समझ रखा है क्या?"
लेकिन अब दूसरा रास्ता भी नहीं था।
राधा ने बिना समय गंवाए काम शुरू कर दिया।
उसने सबसे पहले रसोई का पूरा सामान देखा।
फिर जल्दी-जल्दी सूची बनाई।
किसी को सब्जी काटने भेजा।
किसी को आटा गूँथने।
किसी को मसाले निकालने।
बच्चों को प्लेटें लगाने का काम दिया।
घर की कामवाली को सफाई की जिम्मेदारी दी।
हर किसी को पहली बार समझ आया कि राधा सिर्फ खाना नहीं बनाती, पूरे घर को व्यवस्थित करना भी जानती है।
दो घंटे तक रसोई में किसी युद्ध जैसी स्थिति रही।
लेकिन राधा के चेहरे पर घबराहट नहीं थी।
वह हर काम मुस्कुराकर कर रही थी।
धीरे-धीरे रसोई से ऐसी खुशबू आने लगी कि मेहमान खुद पूछने लगे,
"क्या बन रहा है?"
कुछ देर बाद खाने की मेज सज गई।
गरमा-गरम पूरी।
शाही पनीर।
दाल मखनी।
मिक्स वेज।
जीरा पुलाव।
दही बड़े।
कचौड़ी।
हरी चटनी।
खीर।
गुलाब जामुन।
सब कुछ घर में मौजूद सामान से तैयार किया गया था।
लड़के वालों ने खाना शुरू किया।
पहला निवाला खाते ही सब एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
"वाह..."
"कमाल का स्वाद है।"
"इतना स्वादिष्ट खाना हमने बहुत दिनों बाद खाया है।"
लड़के की दादी ने मुस्कुराते हुए कहा,
"जिस घर की रसोई इतनी प्रेम से चलती हो, उस घर की बेटी जरूर सुखी रहेगी।"
पूरा माहौल बदल गया।
जो लोग कुछ देर पहले व्यवस्था की कमी पर बातें कर रहे थे, वही अब खाने की तारीफ करते नहीं थक रहे थे।
लड़के के पिता ने पूछा,
"यह सब किसने बनाया है?"
कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।
कमला देवी की नजर राधा पर गई।
राधा अभी भी रसोई में खड़ी सबके लिए गरम पूरियां तल रही थी।
उसके माथे पर पसीना था।
हाथ आटे से भरे थे।
लेकिन चेहरे पर संतोष था।
कमला देवी खुद रसोई में गईं।
उन्होंने पहली बार सबके सामने राधा का हाथ पकड़ा।
उसे बाहर लेकर आईं।
भावुक आवाज में बोलीं,
"जिस बहू को मैं हमेशा साधारण समझती रही... आज उसी ने हमारे पूरे परिवार का सम्मान बचाया है।"
सभी लोग तालियां बजाने लगे।
कमला देवी की आंखों से आँसू बह निकले।
"आज तक मैं इसकी मेहनत को इसका कर्तव्य समझती रही। कभी इसकी कीमत नहीं समझी। लेकिन आज महसूस हुआ कि घर की सबसे मजबूत नींव वही होती है, जो सबसे कम दिखाई देती है।"
राधा कुछ बोल नहीं पाई।
इतने वर्षों में पहली बार उसे लगा कि उसकी मेहनत किसी ने देखी है।
सगाई का कार्यक्रम खुशी-खुशी पूरा हुआ।
जब आखिरी मेहमान भी विदा हो गए, तब कमला देवी राधा के कमरे में पहुँचीं।
उन्होंने अपनी अलमारी से एक पुरानी चाबी निकाली।
"यह घर की तिजोरी की चाबी है।"
राधा हैरानी से उन्हें देखने लगी।
"माँ जी... यह मुझे क्यों?"
कमला देवी मुस्कुराईं।
"क्योंकि जिस इंसान पर पूरे परिवार की जिम्मेदारी भरोसे से छोड़ी जा सके, उससे बड़ा धन कोई नहीं होता। आज से घर के हर बड़े फैसले में सबसे पहले तुम्हारी राय ली जाएगी। सम्मान माँगने से नहीं मिलता, अपने कर्मों से कमाया जाता है... और तुमने वह सम्मान बहुत पहले कमा लिया था। देर सिर्फ हमें समझने में लगी।"
राधा की आँखों से आँसू बह निकले।
उसने चाबी अपने माथे से लगाई और सास के गले लग गई।
उस दिन पूरे परिवार ने पहली बार महसूस किया कि घर को बड़ा महंगे सामान या ऊँची हैसियत नहीं बनाती, बल्कि वह इंसान बनाता है जो बिना किसी स्वार्थ के हर रिश्ते को दिल से निभाता है।
सीख: किसी इंसान की सादगी, चुप्पी या विनम्रता को उसकी कमजोरी मत समझिए। अक्सर सबसे शांत रहने वाला व्यक्ति ही परिवार की सबसे बड़ी ताकत होता है। सम्मान वही रिश्ता मजबूत करता है, जिसे वर्षों की मेहनत भी कभी नहीं दिला पाती।

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