भरोसे की कीमत
"क्या मैं इस घर का बेटा नहीं हूँ भैया... जो आज पहली बार आपने मेरी बात टाल दी?"
इतना कहते हुए निखिल ने अपनी नज़रें झुका लीं। उसकी आवाज़ में शिकायत कम और दर्द ज़्यादा था।
बड़े भाई अमित कुछ पल तक चुप बैठे रहे। जेब में पैसे थे, लेकिन हाथ जेब तक नहीं जा रहे थे।
तभी रसोई से उनकी पत्नी पूजा बाहर आई और बोली, "हर बार पैसे माँगने की आदत अच्छी नहीं होती निखिल। अब तुम भी बड़े हो गए हो, अपने खर्च खुद संभालना सीखो।"
निखिल ने एक बार अपने भाई की तरफ देखा। उसे उम्मीद थी कि भैया हमेशा की तरह मुस्कुराकर कहेंगे, "अरे, जितने चाहिए ले जा।"
लेकिन इस बार अमित की नज़रें झुकी हुई थीं।
उन्होंने बस इतना कहा, "अभी थोड़ा हाथ तंग है छोटे... बाद में देखेंगे।"
निखिल हल्की मुस्कान बनाकर बोला, "कोई बात नहीं भैया... मैं कहीं और से इंतज़ाम कर लूँगा।"
वह धीरे-धीरे बाहर निकल गया।
दरवाज़ा बंद हुआ तो अमित ने गहरी साँस ली।
पूजा मुस्कुराते हुए बोली, "देखा... ऐसे ही आदत छुड़ानी पड़ती है। नहीं तो सारी ज़िंदगी लोग आपकी अच्छाई का फायदा उठाते रहेंगे।"
अमित ने धीमे स्वर में कहा, "लेकिन निखिल कभी बिना वजह पैसे नहीं माँगता।"
पूजा बोली, "आज ज़रूरत होगी, कल उसकी शादी होगी, फिर बच्चों के खर्च होंगे। कब तक सब उठाओगे? थोड़ा सख्त बनना सीखिए।"
अमित कुछ नहीं बोले।
उन्हें अपने छोटे भाई का उदास चेहरा बार-बार याद आ रहा था।
असल बात यह थी कि निखिल को अगले दिन एक बड़ी कंपनी के इंटरव्यू में जाना था।
उसे फॉर्म की फीस, यात्रा और कुछ ज़रूरी दस्तावेज़ बनवाने थे।
भैया से मना होने के बाद उसने अपनी पुरानी घड़ी बेच दी।
दोस्त से थोड़े पैसे उधार लिए।
और बिना किसी से शिकायत किए इंटरव्यू देने चला गया।
कुछ महीनों बाद पूरे मोहल्ले में एक ही खबर थी।
"निखिल की सरकारी कंपनी में अधिकारी के पद पर नौकरी लग गई है।"
पूरा परिवार खुशी से झूम उठा।
सबसे ज़्यादा खुश अमित थे।
उन्होंने मिठाई बाँटी और हर मिलने वाले से कहा, "मेरा छोटा बहुत मेहनती है।"
पहली तनख्वाह मिलने के बाद निखिल सबसे पहले बाज़ार गया।
उसने अपने भैया के लिए वही महँगी घड़ी खरीदी जिसे अमित कई बार दुकान के बाहर खड़े होकर देखा करते थे, लेकिन कभी खरीद नहीं पाए।
भाभी के लिए सुंदर रेशमी साड़ी ली।
माँ के लिए चश्मा।
पिता के लिए नया कुर्ता।
और ढेर सारी मिठाइयाँ लेकर घर पहुँचा।
अंदर आते ही उसने सबसे पहले भैया के पैर छुए।
फिर मुस्कुराकर बोला, "भैया... आँखें बंद कीजिए।"
अमित ने आँखें बंद कीं।
निखिल ने उनके हाथ में घड़ी रख दी।
"ये आपके लिए।"
अमित हैरान रह गए।
"अरे छोटे... इतनी महँगी घड़ी?"
निखिल हँसकर बोला, "याद है भैया... एक बार आपने दुकान के बाहर खड़े होकर कहा था कि कभी पैसे हुए तो यही घड़ी खरीदूँगा।"
"मैंने उसी दिन तय कर लिया था कि मेरी पहली कमाई से यही घड़ी आपको दूँगा।"
अमित की आँखें भर आईं।
फिर निखिल ने साड़ी निकालकर भाभी की ओर बढ़ाई।
"भाभी... ये आपके लिए।"
पूजा शर्मिंदा होकर बोली, "मेरे लिए भी?"
"क्यों नहीं भाभी? आप भी तो इस घर का हिस्सा हैं।"
उसकी मुस्कान में कोई शिकायत नहीं थी।
सिर्फ अपनापन था।
रात को सब खाना खा रहे थे।
तभी अमित ने धीरे से पूछा, "छोटे... उस दिन पैसे किस काम के लिए चाहिए थे?"
निखिल मुस्कुराया।
"इंटरव्यू के लिए जाना था।"
अमित का हाथ वहीं रुक गया।
"फिर...?"
निखिल ने सहज भाव से कहा, "घड़ी बेच दी थी भैया।"
अमित की आँखें फैल गईं। "और बाकी पैसों का इंतज़ाम?"
निखिल मुस्कुराया, "बाकी दोस्त से उधार ले लिया था। काम ज़रूरी था, इसलिए किसी तरह चला गया।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
पूजा के हाथ से रोटी टूटकर थाली में गिर गई।
उसे अपनी कही हर बात याद आने लगी।
अगर उस दिन निखिल हार मान लेता...
अगर वह इंटरव्यू में ही नहीं जा पाता...
तो शायद आज यह खुशी भी घर में नहीं होती।
उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
वह निखिल के पास आई और बोली,
"मुझे माफ़ कर दो निखिल। मैंने तुम्हें गलत समझा।"
निखिल तुरंत खड़ा हुआ।
"भाभी... बड़े कभी माफ़ी नहीं माँगते।"
"घर में अगर रिश्ते बचाने हैं तो पुराने दुख नहीं गिनते।"
यह सुनकर पूजा रो पड़ी।
उसने निखिल के सिर पर हाथ फेर दिया।
कुछ दिन बाद अमित ने अपने छोटे भाई से कहा,
"आज से इस घर में कभी किसी अपने पर शक नहीं करेंगे।"
निखिल मुस्कुराया,
"भैया, रिश्ते पैसे से नहीं चलते... भरोसे से चलते हैं।"
अमित ने उसे गले लगा लिया।
दोनों भाइयों की आँखों में आँसू थे।
माँ दूर खड़ी भगवान का धन्यवाद कर रही थीं।
पिता की आँखों में गर्व साफ दिखाई दे रहा था।
और पूजा मन ही मन सोच रही थी—
"जिस घर में विश्वास टूट जाता है, वहाँ दौलत भी खुशियाँ नहीं खरीद सकती। लेकिन जहाँ अपनापन बचा रहे, वहाँ छोटी-सी रोटी भी दावत बन जाती है।"
सीख:
अपने लोगों की नीयत पर शक करने से पहले उनके वर्षों के प्रेम, विश्वास और त्याग को याद कर लेना चाहिए। कई बार एक पल का अविश्वास जीवन भर का पछावा बन जाता है। रिश्ते हर बहस जीतने से नहीं, बल्कि एक-दूसरे का विश्वास और सम्मान जीतने से मजबूत होते हैं। जहाँ अपनापन और भरोसा बना रहता है, वहाँ हर मुश्किल आसान हो जाती है।

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