ससुराल में एक-दूसरे का सहारा
“बहू, आज फिर इतनी देर तक मंदिर में बैठी थी? घर का काम छोड़कर सहेलियों के साथ बातें करने से क्या मिलेगा?”
कमला देवी ने जैसे ही राशी को मंदिर से लौटते देखा, तुरंत ताना मार दिया।
राशी ने हाथ में पकड़ी पूजा की थाली नीचे रखी और धीमे से बोली, “माँजी, देर नहीं हुई। पूजा करके बस दो मिनट बैठी थी।”
“दो मिनट?” कमला देवी ने मुंह बनाते हुए कहा, “तुम्हारे ये दो मिनट ही घर के काम में घंटा बन जाते हैं।”
राशी ने कुछ नहीं कहा।
वह जानती थी कि जवाब देने से बात और बढ़ेगी।
गांव के छोटे से घर में रहने वाली राशी सीधी-सादी और शांत स्वभाव की महिला थी। पति मोहन, दो बच्चे, सास-ससुर, देवर और ननद—यही उसकी पूरी दुनिया थी।
सुबह सूरज निकलने से पहले उठना, चूल्हा जलाना, सबके लिए चाय बनाना, नाश्ता तैयार करना, बच्चों को स्कूल भेजना, ससुर जी की दवाई देना, सास की पसंद का खाना बनाना, कपड़े धोना और फिर दोपहर के खाने की तैयारी करना—राशी की जिंदगी इन्हीं कामों के बीच गुजरती थी।
उसने कभी अपने लिए कुछ नहीं मांगा था।
बस सोमवार के दिन मंदिर जाना उसे अच्छा लगता था।
मंदिर में गांव की दो-चार सहेलियां मिल जातीं। कोई घर की बात करती, कोई बच्चों की, कोई अपने दुख-सुख सुनाती।
वही एक घंटा राशी के लिए जैसे पूरी दुनिया से मिलने वाला आराम था।
लेकिन कमला देवी को यह भी पसंद नहीं था।
राशी अक्सर सोचती—
“क्या घर संभालने वाली बहू को अपने लिए थोड़ा सा समय भी नहीं मिल सकता?”
लेकिन फिर मां की बात याद आ जाती—
“बेटी, ससुराल में हर बात का जवाब देना जरूरी नहीं होता। कभी-कभी चुप रहना ही घर बचा लेता है।”
और राशी चुप हो जाती।
कुछ महीने बाद राशी के चचेरे ससुराल वाले परिवार में एक बड़ा धार्मिक कार्यक्रम रखा गया।
शहर में रहने वाली उसकी चचेरी सास शारदा देवी ने पूरे परिवार को बुलाया था।
राशी अपने पति, बच्चों और सास-ससुर के साथ शहर पहुंची।
घर बहुत बड़ा था।
साफ-सुथरा कमरा, चमकता फर्श, सुंदर पर्दे और हर चीज अपनी जगह पर।
राशी को लगा—
“शहर में रहने वालों की जिंदगी तो कितनी आरामदायक होगी।”
लेकिन उसकी यह सोच सिर्फ कुछ घंटों में बदल गई।
शारदा देवी की बहू रावी शहर की एक कंपनी में नौकरी करती थी।
सुबह पांच बजे ही रावी उठ गई।
सबसे पहले उसने चाय बनाई।
फिर बच्चों को उठाया।
बच्चों का नाश्ता बनाया।
पति का टिफिन तैयार किया।
सास-ससुर के लिए नाश्ता बनाया।
ससुर जी की चाय अलग और सास की दवाई अलग रखी।
फिर बच्चों की स्कूल बस का समय देखकर उन्हें तैयार किया।
इधर रावी का अपना टिफिन मेज पर रखा हुआ था।
लेकिन उसे खाने का समय नहीं मिला।
राशी ने देखा कि रावी ने सिर्फ आधा गिलास पानी पिया और जल्दी से तैयार होकर ऑफिस निकल गई।
राशी से रहा नहीं गया।
उसने पूछा, “रावी, तुमने नाश्ता नहीं किया?”
रावी मुस्कुराई।
“दीदी, ऑफिस पहुंचकर कुछ खा लूंगी।”
राशी ने हैरानी से रावी की तरफ देखते हुए पूछा,
“लेकिन रोज ऐसे ही?”
रावी ने कुछ पल चुप रहकर कहा—
“रोज नहीं दीदी… लगभग रोज।”
राशी का दिल भर आया।
“इतना सब करने के बाद ऑफिस भी जाना पड़ता है?”
रावी हंस पड़ी।
“दीदी, नौकरी करती हूं ना। इसलिए शायद सबको लगता है कि मैं बहुत मजबूत हूं।”
राशी उसकी बात समझ नहीं पाई।
“मजबूत?”
रावी ने धीमे से कहा—
“हां। क्योंकि अगर मैं थकने की बात करूं तो कहा जाता है कि नौकरी छोड़ दो। और अगर नौकरी छोड़ दूं तो कहा जाएगा कि आजकल की लड़कियां अपने पैरों पर खड़ी नहीं होना चाहतीं।”
राशी चुप हो गई।
रावी ने मुस्कुराते हुए कहा—
“सच कहूं दीदी, गांव हो या शहर… बहू के हिस्से में जिम्मेदारियां हमेशा ज्यादा आती हैं।”
राशी के मन में अपनी सास की बातें घूमने लगीं।
उसे पहली बार लगा कि जिस परेशानी को वह सिर्फ अपनी जिंदगी की समस्या समझती थी, वह तो न जाने कितनी बहुओं की कहानी है।
शाम को रावी ऑफिस से लौटी।
उसके हाथ में ऑफिस का बैग था और दूसरे हाथ में सब्जियों का थैला।
राशी ने सोचा—
“अब तो यह आराम करेगी।”
लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
दरवाजे पर पहुंचते ही रावी ने जूते उतारे, बैग रखा और सीधे रसोई में चली गई।
उसने साड़ी ठीक की और सब्जियां काटने लगी।
राशी भी उसके पीछे रसोई में पहुंच गई।
“रावी, पहले बैठ जाओ।”
रावी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया,
“नहीं दीदी, पहले खाना बना लूं। सबको भूख लगी होगी।”
तभी शारदा देवी की आवाज आई—
“रावी! खाना कितनी देर में बनेगा? मुझे समय पर खाना चाहिए, पता है ना?”
रावी ने जवाब दिया—
“माँजी, बस दस मिनट।”
शारदा देवी फिर बोलीं—
“तुम्हें ऑफिस से आते ही घर का काम करने में भी इतना समय लग जाता है। पहले के जमाने में बहुएं इतना काम करके भी शिकायत नहीं करती थीं।”
राशी ने रावी की तरफ देखा।
रावी चुप थी।
उसके चेहरे पर थकान साफ दिखाई दे रही थी।
तभी राशी की सास कमला देवी भी रसोई में आ गईं।
उन्होंने कहा—
“जीजी, आप सही कहती हो। आजकल की बहुओं को थोड़ा भी काम ज्यादा लगने लगता है।”
रावी ने सिर झुका लिया।
राशी से रहा नहीं गया।
उसने रावी के हाथ से चाकू ले लिया।
“बस।”
रावी ने हैरानी से पूछा, “क्या हुआ दीदी?”
राशी ने मुस्कुराकर कहा—
“आज खाना मैं बनाऊंगी।”
रावी ने हैरानी से राशी की तरफ देखते हुए कहा,
“लेकिन दीदी…”
राशी ने मुस्कुराते हुए रावी की बात बीच में ही रोक दी और कहा,
“कोई लेकिन नहीं। तुम पहले बैठो और थोड़ा आराम करो।”
राशी ने रावी के हाथ में एक गिलास पानी दिया।
“पहले यह पी।”
रावी ने पानी लिया।
फिर राशी ने कहा—
“और बैठकर आराम से पांच मिनट सांस ले।”
रावी की आंखें भर आईं।
उसने धीरे से पूछा—
“दीदी, आपको मेरी चिंता क्यों हो रही है?”
राशी मुस्कुराई।
“क्योंकि मैं भी बहू हूं।”
रावी ने उसकी तरफ देखा।
राशी बोली—
“बहू चाहे गांव की हो या शहर की… थकान तो दोनों को होती है।”
रावी की आंखों से आंसू निकल पड़े।
रात को सब खाना खाने बैठे।
राशी ने खाना परोसा।
शारदा देवी ने पहला निवाला खाते हुए कहा—
“आज खाना अच्छा बना है।”
कमला देवी ने हंसते हुए कहा—
“राशी है ही ऐसी। काम करने में माहिर है।”
रावी चुपचाप बैठी थी।
उसने पहली बार बिना अपराधबोध के खाना खाया।
लेकिन राशी की नजर अपनी सास पर थी।
कमला देवी खाना खाकर उठीं तो राशी ने उनके पीछे जाकर धीरे से कहा—
“माँजी, एक बात पूछूं?”
कमला देवी ने उसकी तरफ देखते हुए पूछा,
“क्या?”
राशी ने थोड़ी हिम्मत जुटाकर कहा,
“अगर मैं भी रोज सुबह से रात तक काम करके थक जाऊं, तो क्या मुझे भी कभी आराम मिल सकता है?”
कमला देवी कुछ पल चुप रहीं।
“तुम्हें किसने कहा कि तुम्हें आराम नहीं मिलता?”
राशी मुस्कुराई।
“किसी ने नहीं कहा माँजी। बस आज रावी को देखकर लगा कि शायद हम बहुओं को खुद ही अपनी थकान छिपाने की आदत हो गई है।”
कमला देवी ने उसकी तरफ देखा।
राशी आगे बोली—
“मैं आपसे शिकायत नहीं कर रही। बस इतना चाहती हूं कि घर में बहू को काम करने वाली समझने के बजाय घर का सदस्य समझा जाए।”
कमला देवी कुछ नहीं बोलीं।
अगली सुबह राशी जल्दी उठ गई।
लेकिन उसने देखा कि रावी उससे भी पहले उठ चुकी थी।
रावी रसोई में जाने लगी तो राशी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“कहां जा रही हो?”
रावी ने सहजता से जवाब दिया,
“दीदी, नाश्ता बनाने जा रही हूं।”
राशी ने मुस्कुराते हुए कहा,
“आज नाश्ता बनाने की जरूरत नहीं है।”
रावी हैरानी से राशी की तरफ देखने लगी और बोली,
“लेकिन दीदी, घर में सबके लिए नाश्ता तो बनाना पड़ेगा ना?”
राशी ने प्यार से उसका हाथ दबाते हुए कहा,
“आज हम दोनों मिलकर काम करेंगे। तुम अकेले सब कुछ नहीं करोगी।”
दोनों हंस पड़ीं।
राशी ने सब्जियां काटीं और रावी ने आटा लगाया।
कुछ ही देर में दोनों ने मिलकर नाश्ता तैयार कर लिया।
तभी कमला देवी वहां आ गईं।
उन्होंने दोनों को साथ काम करते देखा।
“क्या बात है? आज बड़ी दोस्ती हो गई दोनों में?”
रावी कुछ बोलती, उससे पहले राशी ने कहा—
“माँजी, दोस्ती नहीं… साझेदारी है।”
कमला देवी ने पूछा—
“कैसी साझेदारी?”
राशी ने मुस्कुराकर कहा—
“घर चलाने की।”
कमला देवी ने कोई जवाब नहीं दिया।
पूजा के बाद राशी का परिवार वापस गांव लौट आया।
रास्ते में राशी बहुत शांत थी।
मोहन ने पूछा—
“क्या सोच रही हो?”
राशी ने कहा—
“कुछ नहीं।”
मोहन मुस्कुराया और बोला, “नहीं, जरूर कुछ सोच रही हो। तुम्हारे चेहरे से साफ पता चल रहा है।”
राशी ने धीरे से कहा—
“मोहन, क्या मैं सोमवार को मंदिर से लौटने के बाद एक घंटे आराम कर सकती हूं?”
मोहन ने तुरंत कहा—
“क्यों नहीं?”
राशी ने आश्चर्य से पति की तरफ देखा।
“सच?”
मोहन ने मुस्कुराकर कहा, “हां। तुम पूरे घर के लिए इतना करती हो। एक घंटा अपने लिए नहीं निकाल सकती?”
राशी की आंखों में खुशी आ गई।
उसे लगा जैसे किसी ने उसके मन का बोझ हल्का कर दिया हो।
अगले सोमवार राशी मंदिर गई।
पूजा की।
सहेलियों से मिली।
थोड़ी देर बातें कीं।
और जब वापस घर आई तो कमला देवी दरवाजे पर खड़ी थीं।
राशी थोड़ा डर गई।
उसे लगा आज फिर कोई बात सुननी पड़ेगी।
लेकिन कमला देवी ने कहा—
“राशी, पहले पानी पी ले।”
राशी ने आश्चर्य से पूछा—
“माँजी?”
कमला देवी बोलीं—
“सुबह से काम कर रही होगी। थक गई होगी।”
राशी की आंखें भर आईं।
कमला देवी ने आगे कहा—
“और हां… मंदिर में अगर सहेलियां मिलें तो थोड़ी देर बैठ लिया कर।”
राशी कुछ बोल नहीं पाई।
कमला देवी ने उसका सिर सहलाया।
“घर संभालने वाली बहू अगर खुश रहेगी, तभी तो घर भी खुश रहेगा।”
राशी ने सास के पैर छुए।
उस दिन पहली बार उसे लगा कि शायद चुप रहने से भी रिश्ते सुधर सकते हैं, लेकिन कभी-कभी अपने मन की बात प्यार से कहना भी जरूरी होता है।
कुछ दिनों बाद रावी का फोन आया।
“दीदी, याद है आपने कहा था—हम दोनों एक ही नाव में सवार हैं?”
राशी हंसते हुए बोली—
“हां, याद है।”
रावी बोली—
“अब उस नाव में कुछ और लोग भी सवार हो गए हैं।”
राशी ने पूछा—
“कौन?”
रावी ने हंसकर कहा—
“मेरी सासू मां।”
राशी ने आश्चर्य से पूछा, “क्या?”
रावी ने मुस्कुराकर कहा, “हां दीदी। अब वो कभी-कभी खुद कहती हैं—‘रावी, ऑफिस से आई हो तो पहले आराम कर लो।’”
राशी की आंखों में खुशी आ गई।
रावी बोली—
“आपने उस दिन सिर्फ मेरे हाथ से काम नहीं लिया था दीदी… आपने मुझे यह एहसास दिलाया था कि मैं अकेली नहीं हूं।”
राशी ने मुस्कुराकर कहा—
“रावी, बहू को बहू ही समझकर अगर बहू का दर्द समझ लिया जाए, तो आधे घर अपने आप खुश हो जाएंगे।”
दोनों कुछ देर चुप रहीं।
फिर रावी बोली—
“दीदी, सच में… ससुराल तो हर किसी का अपना होता है।”
राशी ने कहा—
“हां।”
फिर दोनों एक साथ हंस पड़ीं।
क्योंकि अब उन्हें समझ आ गया था—
ससुराल में हर बहू को किसी ऐसे इंसान की जरूरत होती है जो उसके काम में हाथ बंटाए, उसके दर्द को समझे और उसे यह महसूस कराए कि वह इस घर में अकेली नहीं है।
रिश्ते तब खूबसूरत बनते हैं, जब हम यह पूछना छोड़ देते हैं कि ‘तुमने मेरे लिए क्या किया?’ और यह पूछना शुरू करते हैं—‘तुम थक तो नहीं गई?’

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