बहू ने बदल दी सोच
“मांजी, मैंने आपके लिए कामवाली लगा दी है। अब आपको अकेले इतना काम करने की जरूरत नहीं है।”
राधिका ने अपनी सास कमला देवी से बहुत प्यार से कहा।
कमला देवी ने तुरंत उसकी तरफ देखा और बोलीं, “मुझे किसी कामवाली की जरूरत नहीं है बहू। मैं अभी इतनी भी बूढ़ी नहीं हुई हूं कि अपने घर का काम करने के लिए किसी दूसरे के भरोसे बैठ जाऊं।”
राधिका चुप हो गई।
वह जानती थी कि सास से बहस करने का कोई फायदा नहीं होगा।
राधिका की शादी को आठ साल हो चुके थे। उसका पति विकास एक निजी कंपनी में नौकरी करता था। दोनों की एक बेटी थी, पीहू, जो स्कूल में पढ़ती थी।
शादी के बाद से राधिका ने कमला देवी को हमेशा घर के काम में लगे हुए ही देखा था।
कमला देवी सुबह से लेकर रात तक घर संभालती थीं। खाना बनाना, कपड़े धोना, सफाई करना, बर्तन मांजना, आंगन साफ करना और फिर परिवार के बाकी छोटे-बड़े काम देखना उनकी आदत बन चुकी थी।
विकास कई बार अपनी मां से कह चुका था,
“मां, अब आप आराम किया करो। मेरी तनख्वाह अच्छी है। हम कामवाली रख लेंगे।”
लेकिन कमला देवी हर बार एक ही जवाब देतीं,
“बेटा, पैसे पेड़ पर नहीं लगते। घर का काम घर के लोग ही करें तो अच्छा रहता है।”
विकास मुस्कुरा देता, लेकिन उसके मन में अपनी मां के लिए चिंता रहती।
राधिका भी कई बार समझाती,
“मांजी, आप इतना काम मत किया कीजिए। आपके घुटनों में भी दर्द रहता है। मैं मदद कर दूंगी।”
कमला देवी कहतीं,
“बहू, तुम भी तो नौकरी और घर दोनों संभालती हो। मैं तुम्हें परेशान नहीं करना चाहती।”
राधिका को यह सुनकर अच्छा लगता, लेकिन अगले ही पल कमला देवी फिर सारे काम में लग जातीं।
एक दिन राधिका ने देखा कि कमला देवी भारी बाल्टी उठाकर कपड़े धोने वाली जगह तक ले जा रही हैं।
राधिका दौड़कर आई और बोली,
“मांजी, रहने दीजिए, मैं कर देती हूं।”
कमला देवी ने बाल्टी छोड़ते हुए कहा,
“तुम्हें ऑफिस के लिए देर हो जाएगी। जाओ, अपना काम करो।”
राधिका ने चिंता से कहा, “लेकिन आपकी कमर में दर्द है।”
कमला देवी हल्की मुस्कान के साथ बोलीं, “दर्द तो उम्र के साथ होता ही है बहू। इसका मतलब यह थोड़े ही है कि घर का काम छोड़ दूं।”
राधिका ने कुछ नहीं कहा।
उस दिन ऑफिस जाते समय उसके मन में यही बात चलती रही।
वह सोच रही थी कि आखिर कमला देवी कामवाली रखने से इतना क्यों डरती हैं?
कुछ दिनों बाद विकास ने फिर अपनी मां से कहा,
“मां, मैं सच में चाहता हूं कि आप आराम करें। मैंने एक अच्छी कामवाली से बात की है। वह घर की सफाई, बर्तन और कपड़े संभाल लेगी।”
कमला देवी नाराज हो गईं।
“तुम दोनों को बस पैसे खर्च करने की पड़ी रहती है। कामवाली आएगी, दो दिन काम करेगी और तीसरे दिन बहाना बनाकर छुट्टी कर लेगी।”
विकास ने कहा,
“तो दूसरी रख लेंगे।”
कमला देवी ने चिंता जताते हुए कहा,
“और अगर वह घर से कुछ उठा ले गई तो?”
विकास ने अपनी मां को समझाते हुए कहा,
“मां, हर इंसान चोर नहीं होता।”
कमला देवी ने तुरंत जवाब दिया,
“तुम्हें क्या पता? दुनिया देखी नहीं है तुमने।”
विकास चुप हो गया।
राधिका दूर खड़ी सब सुन रही थी।
उसने देखा कि विकास की आंखों में अपनी मां के लिए चिंता थी, लेकिन वह मां से ज्यादा बहस नहीं करना चाहता था।
कुछ दिन ऐसे ही निकल गए।
एक दिन राधिका को अपने मायके जाना था। उसके पिता की तबीयत ठीक नहीं थी।
विकास ने कहा,
“तुम दो-तीन दिन मायके होकर आ जाओ। मां और पीहू का मैं संभाल लूंगा।”
राधिका मायके चली गई।
लेकिन उसके जाने के बाद कमला देवी पर काम का बोझ बढ़ गया।
विकास ऑफिस चला जाता और पीहू स्कूल।
कमला देवी अकेले खाना बनातीं, बर्तन साफ करतीं और कपड़े धोतीं।
एक दिन भारी कपड़ों की टोकरी उठाते समय उनका पैर फिसल गया।
वह जमीन पर गिर पड़ीं।
दर्द से उनकी आवाज निकल गई।
पीहू स्कूल से लौटी तो उसने दादी को जमीन पर बैठे देखा।
“दादी!”
पीहू दौड़कर उनके पास गई।
“क्या हुआ आपको?”
कमला देवी ने दर्द छिपाते हुए कहा,
“कुछ नहीं हुआ बेटा। पैर थोड़ा मुड़ गया है।”
लेकिन पीहू ने तुरंत विकास को फोन किया।
विकास ऑफिस से भागता हुआ घर आया।
डॉक्टर ने जांच के बाद कहा,
“हड्डी तो नहीं टूटी है, लेकिन काफी चोट लगी है। कुछ दिनों तक ज्यादा चलना-फिरना ठीक नहीं रहेगा।”
विकास की आंखें भर आईं।
वह मां के पास बैठ गया और बोला,
“मां, मैंने आपसे कितनी बार कहा था कि कामवाली रख लेते हैं।”
कमला देवी चुप रहीं।
विकास ने आगे कहा,
“आप पैसे बचाने के चक्कर में अपनी सेहत क्यों खराब कर रही हैं?”
कमला देवी ने कोई जवाब नहीं दिया।
तभी राधिका भी मायके से लौट आई।
घर में आते ही उसने देखा कि कमला देवी बिस्तर पर थीं।
“मांजी!”
राधिका उनके पास बैठ गई।
“आपको चोट कैसे लगी?”
कमला देवी ने बात बदलते हुए कहा,
“बहू, तुम अपने बाबूजी को देखकर आ गई?”
“हां मांजी, लेकिन आप बताइए आपको चोट कैसे लगी?”
पीहू ने सब बता दिया।
राधिका की आंखें नम हो गईं।
उसने कमला देवी का हाथ पकड़कर कहा,
“आप हमें इतना परेशान क्यों करती हैं मांजी?”
कमला देवी ने आश्चर्य से उसकी तरफ देखा।
“मैंने क्या किया?”
राधिका बोली,
“आपको लगता है कि कामवाली रखने से हमारा पैसा बर्बाद होगा। लेकिन अगर आपकी तबीयत खराब हो जाए और आपको अस्पताल जाना पड़े, तो उसमें कितना खर्च होगा? क्या वह पैसा बचाना ज्यादा जरूरी है या आपका स्वस्थ रहना?”
कमला देवी चुप रहीं।
राधिका ने उनका हाथ दबाते हुए कहा,
“हम कामवाली आपके ऊपर काम डालने के लिए नहीं रख रहे हैं। हम इसलिए रख रहे हैं ताकि आपको आराम मिल सके।”
कमला देवी ने धीरे से कहा,
“बहू, तुम्हें पता है मुझे कामवाली से डर क्यों लगता है?”
राधिका ने सिर हिला दिया।
कमला देवी की आंखें भर आईं।
“जब तुम्हारे ससुर की नौकरी चली गई थी, तब हमारे पास बहुत कम पैसे थे। घर चलाना मुश्किल हो गया था। मैंने दूसरों के घरों में काम किया था। कई लोगों ने काम करवाया और पैसे देने में बहाने बनाए। कुछ लोगों ने मुझे बहुत बुरा-भला कहा। तब मैंने मन में ठान लिया था कि अपने घर का काम मैं खुद करूंगी और किसी के सामने हाथ नहीं फैलाऊंगी।”
राधिका ध्यान से उनकी बात सुन रही थी।
कमला देवी बोलीं,
“फिर धीरे-धीरे हालात ठीक हुए। लेकिन वह डर मेरे मन से कभी नहीं गया। मुझे लगता रहा कि अगर मैं कामवाली रखूंगी तो मैं अपने पैरों पर खड़ी नहीं रह पाऊंगी।”
राधिका ने उनकी आंखों से आंसू पोंछ दिए।
“मांजी, घर का काम खुद करना आत्मनिर्भरता नहीं है। अपनी जरूरत समझना भी आत्मनिर्भरता है।”
कमला देवी ने बहू की तरफ देखा।
राधिका मुस्कुराई।
“और एक बात कहूं?”
कमला देवी ने उसकी तरफ देखते हुए पूछा,
“क्या बहू?”
राधिका ने प्यार से कहा,
“जिस तरह कभी किसी ने आपके साथ गलत व्यवहार किया था, उसी वजह से आज हर काम करने वाली महिला को गलत समझना भी ठीक नहीं है।”
कमला देवी कुछ बोल नहीं पाईं।
उसी समय विकास कमरे में आया।
उसने कहा,
“मां, मैंने आपके लिए एक कामवाली से बात कर ली है। वह सिर्फ सफाई और बर्तन करेगी। बाकी काम आपकी इच्छा से होगा।”
कमला देवी ने कुछ सोचकर कहा,
“अगर वह ठीक से काम न करे तो?”
विकास मुस्कुराया।
“तो बदल देंगे।”
राधिका ने हंसते हुए कहा,
“और अगर बहुत अच्छा काम करे तो?”
कमला देवी भी पहली बार मुस्कुराईं।
“तो उसे जाने नहीं दूंगी।”
पीहू जोर से हंस पड़ी।
“दादी मान गईं!”
कमला देवी ने पीहू को अपने पास बुलाकर कहा,
“हां, तेरी दादी मान गई।”
कुछ दिनों बाद कामवाली सरोज घर आने लगी।
सरोज बहुत मेहनती महिला थी।
वह बर्तन साफ करती, घर में झाड़ू-पोछा करती और कमला देवी से हर काम के बारे में पूछकर करती।
एक दिन कमला देवी ने देखा कि सरोज अपनी छोटी बेटी को स्कूल छोड़कर काम करने आई थी।
कमला देवी ने पूछा,
“तुम्हारी बेटी पढ़ती है?”
सरोज ने कहा,
“हां माताजी। मैं चाहती हूं कि मेरी बेटी खूब पढ़े और मेरी तरह दूसरों के घरों में काम न करे।”
कमला देवी कुछ पल उसे देखती रहीं।
उन्हें अपना पुराना समय याद आ गया।
उन्होंने सरोज से कहा,
“बेटी, अपनी बच्ची को खूब पढ़ाना। अगर कभी फीस की परेशानी हो तो मुझे बताना।”
सरोज की आंखों में आंसू आ गए।
“माताजी, आप बहुत अच्छी हैं।”
कमला देवी ने कहा,
“नहीं बेटी, मैं देर से अच्छी बनी हूं।”
सरोज समझ नहीं पाई कि कमला देवी क्या कहना चाहती हैं।
लेकिन राधिका समझ गई।
अब कमला देवी का व्यवहार धीरे-धीरे बदलने लगा।
वह कामवाली को नौकर नहीं समझती थीं।
वह उसे परिवार की मदद करने वाली एक मेहनती महिला मानती थीं।
राधिका भी कमला देवी के इस बदलाव को देखकर खुश थी।
कुछ महीनों बाद कमला देवी पूरी तरह स्वस्थ हो गईं।
अब वह अपनी इच्छा से थोड़ा बहुत काम करतीं, लेकिन भारी काम सरोज संभाल लेती।
एक दिन विकास ऑफिस से घर आया तो उसने देखा कि मां आराम से कुर्सी पर बैठी हैं और सरोज रसोई साफ कर रही है।
विकास मुस्कुराकर बोला,
“मां, अब तो आप बहुत आराम करने लगी हैं।”
कमला देवी ने कहा,
“हां बेटा, क्योंकि अब समझ आ गया है कि घर का काम करवाने से घर छोटा नहीं होता और पैसे खर्च करने से परिवार गरीब नहीं होता।”
विकास ने हंसते हुए कहा,
“फिर तो मेरी मां समझदार हो गईं।”
कमला देवी ने उसे हल्की सी डांट लगाई।
“बहुत बोलने लगा है तू।”
राधिका पास खड़ी मुस्कुरा रही थी।
तभी कमला देवी ने राधिका को अपने पास बुलाया।
“बहू।”
“जी मांजी?”
कमला देवी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“उस दिन अगर तुम मुझे समझाने की जगह मुझसे लड़ने लगतीं, तो शायद मैं कभी नहीं बदलती।”
राधिका ने कहा,
“मांजी, आप मेरी मां जैसी हैं। मां से लड़कर नहीं, प्यार से समझाया जाता है।”
कमला देवी की आंखें नम हो गईं।
उन्होंने राधिका को गले लगा लिया।
“मुझे बहू नहीं, बेटी मिली है।”
राधिका भी रो पड़ी।
उसी समय पीहू दौड़कर आई और बोली,
“दादी, अब आप मम्मी को कभी काम करने के लिए परेशान मत करना।”
कमला देवी हंस पड़ीं।
“अब तेरी दादी किसी को परेशान नहीं करेगी।”
विकास ने मजाक करते हुए कहा,
“अच्छा, यह बात लिखकर दे दो।”
कमला देवी ने उसकी तरफ तकिया फेंक दिया।
पूरा घर हंसी से भर गया।
कुछ समय बाद त्योहार आया।
इस बार कमला देवी ने खुद राधिका से कहा,
“बहू, तुम बच्चों के साथ आराम से बैठो। सरोज और मैं मिलकर खाना बना लेंगे।”
राधिका ने आश्चर्य से पूछा,
“आप सरोज के साथ?”
कमला देवी मुस्कुराईं।
“हां। काम बांटने से कोई छोटा नहीं होता।”
फिर उन्होंने सरोज से कहा,
“और बेटी, त्योहार है। तू भी अपने घर जाकर बच्चों के साथ समय बिताना। बाकी काम मैं देख लूंगी।”
सरोज ने कहा,
“माताजी, आपका घर है, मैं कर लूंगी।”
कमला देवी बोलीं,
“घर मेरा है, लेकिन जिंदगी तेरी भी है।”
राधिका ने यह बात सुनी तो उसकी आंखें खुशी से भर आईं।
उसे लगा जैसे उसकी सास सिर्फ अपनी सोच नहीं बदल रही थीं, बल्कि अपने साथ जुड़े लोगों की जिंदगी को भी समझना सीख रही थीं।
रात को कमला देवी ने विकास और राधिका को पास बुलाया।
उन्होंने कहा,
“बेटा, एक बात समझने में मुझे बहुत देर लगी।”
विकास ने मां की तरफ देखते हुए पूछा,
“क्या मां?”
कमला देवी ने भावुक होकर कहा,
“बच्चे जब अपने माता-पिता के लिए कुछ करना चाहते हैं, तो उनकी बात को हमेशा जिद समझना नहीं चाहिए। कभी-कभी उनकी चिंता के पीछे बहुत सारा प्यार छिपा होता है।”
विकास ने मां के पैर छू लिए।
“मां, बस अब आप हमेशा खुश रहो।”
कमला देवी ने राधिका की तरफ देखा।
“और बहू, तू भी कभी यह मत सोचना कि तू इस घर में अकेली है।”
राधिका ने मुस्कुराकर कहा,
“जब सास मां बन जाए, तो बहू को घर अपना ही लगता है।”
कमला देवी ने उसे गले लगा लिया।
उस दिन के बाद घर में काम सिर्फ कम नहीं हुआ था, बल्कि रिश्तों का बोझ भी कम हो गया था।
कमला देवी ने समझ लिया था कि पुरानी सोच से जुड़े रहना हमेशा संस्कार नहीं होता। कभी-कभी समय के साथ अपनी सोच बदलना भी परिवार के प्रति जिम्मेदारी होती है।
और राधिका ने समझ लिया था कि किसी की जिद के पीछे छिपे पुराने दर्द को समझ लिया जाए, तो रिश्ते बदलने में ज्यादा समय नहीं लगता।
क्योंकि रिश्ते जीतने के लिए बहस नहीं, समझ और प्यार चाहिए।

Post a Comment