“मिट्टी की खुशबू”
सुबह के सात बजे थे।
गाँव की गलियों में हल्की-हल्की धूप उतर आई थी।
कहीं बकरियाँ चरने जा रही थीं, कहीं बच्चे स्कूल की तैयारी में लगे थे।
इस कहानी की नायिका सुधा थी — जो दो साल पहले ही ब्याह कर आई थी।
उसका ससुराल बड़ा था — चार कमरे, गोशाला, आँगन और बीच में एक बड़ा नीम का पेड़।
सुधा भोली-भाली, सीधी-सादी लड़की थी। मायके में तो कभी कोई बात सुननी नहीं पड़ी, लेकिन ससुराल में कदम रखते ही ताने-बाने का सिलसिला शुरू हो गया था।
“आजकल की लड़कियाँ तो बस नाम की संस्कारी हैं… काम के नाम पर हाथ जोड़ लेती हैं।”
सास शांति देवी अक्सर यही कहा करतीं।
सुधा बस मुस्कुराकर रह जाती।
वो जानती थी कि जवाब देने से बात और बिगड़ेगी।
लेकिन मन ही मन सोचती — “क्या मैं कभी इनका दिल जीत पाऊँगी?”
एक दिन ...
उस दिन घर में शादी की तैयारी थी — छोटे देवर की सगाई थी।
सास जी ने सबको काम बाँट दिया था।
किसी को फूल सजाने थे, किसी को रसोई का ध्यान रखना था।
सुधा को कहा गया —
“अरे बहु, तुम बस चाय-नाश्ता देख लेना। बड़ी रसोई में तो मत घुसना।”
दिल पर चोट लगी, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।
चुपचाप रसोई के कोने में जाकर काम करने लगी।
तभी उसने देखा — पुराने मिट्टी के बर्तन रखे थे, जिनसे हल्की-हल्की मिट्टी की खुशबू आ रही थी।
उसे अपनी माँ की बात याद आई —
> “बेटी, मिट्टी का बर्तन खाने में वो स्वाद लाता है जो किसी स्टील या ताँबे का नहीं ला सकता।”
सुधा ने तय किया — “आज मैं कुछ अलग ही बनाऊँगी।”
मिट्टी के बर्तन में चावल की जादूगरी...
घर में सब लोग सगाई की तैयारी में लगे थे, उधर सुधा ने मिट्टी के बर्तन में थोड़ा देसी घी डाला, प्याज, लहसुन, हरी मिर्च और गाँव के उगाए टमाटर डालकर भूनने लगी।
फिर उसने पुराने तरीके से मसाले पीसे — मूसल में।
हल्दी, धनिया, थोड़ा गरम मसाला और चुटकी भर प्यार।
उसने उसमें बचे हुए चावल, सब्ज़ी के टुकड़े डाल दिए।
धीरे-धीरे महक पूरे घर में फैलने लगी।
सास जी जो बाहर मंडप सजा रही थीं, नाक सिकोड़कर बोलीं —
“ये कैसी महक है? फिर कुछ अजीब सा बना रही है क्या?”
सुधा ने मन में कहा — “जो भी है, आज तो मैं अपने दिल से खाना बनाऊँगी।”
पहला कौर और सबकी हैरानी...
जब सब लोग दोपहर में थके हुए बैठे, तो सुधा ने अपनी डिश सबके सामने रखी।
“अरे, ये क्या है?” देवर ने पूछा।
सुधा बोली — “मिट्टी के बर्तन में बना देसी तड़का चावल।”
पहला कौर लेते ही देवर बोल पड़ा —
“वाह भाभी! ये तो गाँव के मेले वाला स्वाद है!”
फिर ससुर जी ने कहा —
“अरे शांति, देख तो, बहु ने तो गजब का खाना बनाया है।”
शांति देवी ने भी चखा।
पहले तो चेहरा गंभीर रहा, फिर बोलीं —
“अरे, इसमें तो पुरानी मिट्टी की खुशबू है… जैसे मेरे जमाने में बनता था।”
सुधा मुस्कुरा दी।
कुछ दिन बाद गाँव में किसान मेला लगा।
सुधा के पति ने कहा —
“अरे सुधा, तुम्हारे मिट्टी वाले चावल तो सबको पसंद आए। क्यों न मेले में बेचकर देखें?”
सुधा हँस पड़ी —
“हमारी सास जी तो डाँटेंगी।”
लेकिन आश्चर्य हुआ जब सास जी बोलीं —
“जा बहु, बना ले। आखिर तू भी तो हमारे घर की इज़्जत है।”
सुधा ने मिट्टी के बर्तनों में चावल, सब्ज़ी और देसी मसालों से तैयार डिश बनाई —
‘मिट्टी की खुशबू वाला फ्राइड राइस’।
लोगों की भीड़ लग गई।
कोई कहता — “भाई, इस स्वाद में बचपन लौट आया।”
तो कोई कहता — “ये तो हमारी दादी के हाथों जैसा स्वाद है।”
सुधा ने तीन दिन में ही अच्छी-खासी कमाई कर ली।
जब मेला खत्म हुआ, शांति देवी बोलीं —
“बहु, तूने तो पूरे गाँव में हमारे खानदान का नाम रौशन कर दिया।”
फिर उनके आँखों से आँसू टपक पड़े —
“मुझे माफ़ कर दे, मैंने तुझे कभी समझा ही नहीं।”
सुधा ने आगे बढ़कर उनके पैर छू लिए —
“माँजी, अगर आपकी डाँट न मिलती तो मैं इतना कुछ सीख ही नहीं पाती।”
अंत..
उस दिन के बाद से सास और बहु के बीच दीवारें नहीं रहीं।
सुधा अब पूरे गाँव की “मिट्टी की खुशबू वाली बहु” बन गई थी।
लोग उसे आदर से बुलाते, और उसकी सास हर बार गर्व से कहतीं —
“हमारी बहु है, हाथों में जादू है इसके।”
घर
में अब ताने नहीं, हँसी-खुशी का माहौल था।
और सुधा हर रोज मिट्टी के बर्तन में सिर्फ खाना नहीं, बल्कि रिश्तों की मिठास पकाती थी।

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