भगवान की चाल
“कब तक यूँ ही अख़बार में विज्ञापन देखते रहोगे? लड़की 24 की हो गई है, अब तो कहीं जाकर देख ही आओ!”
कमला सुबह-सुबह फिर टोका-टोकी शुरू कर चुकी थी।
रामदयाल ने चश्मा ठीक करते हुए शांत स्वर में कहा,
“अरे कमला… सब समय पर होगा। भगवान की कृपा है। चिंता मत कर।”
“भगवान ही आकर बताने वाले हैं क्या रिश्ते? चार पैसे जेब में होंगे तभी किसी के घर जाओगे! जितना मिलता है, आधा तो मंदिर में चढ़ा आते हो।”
रामदयाल हल्की मुस्कान के साथ बोले,
“जो दान करता है, उसके घर खुद बरकत आती है।”
“बरकत आती होगी, पर बेटी की शादी कौन करेगा?”
कमला बुदबुदाती हुई रसोई में घुस गई।
रामदयाल ने गहरी सांस ली। उन्हें मालूम था कि कमला गलत नहीं कह रही, पैसे का बंदोबस्त करना मुश्किल हो रहा था। फिर भी मन में भगवान का भरोसा था।
“ज़रा सब्ज़ियाँ ले आओ,” कमला ने थैला पकड़ा दिया।
“और हाँ! जिस लड़के के बारे में मेरी चचेरी बहन ने बताया है, उसके घर परसों जाना है। पैसे का इंतज़ाम कर लेना… एफडी तो तोड़ोगे नहीं… अपने दोस्तों से ही मांग लो।”
रामदयाल थैला लेकर निकल पड़े। रास्ते में मन भारी था—
“क्या कम से कम अपनी बेटी के लिए भी मैं कहीं माँगने जाऊँगा…?”
सोचा, पहले अपने दोस्त मोहन से बात कर लेता हूँ। वही दुकानों की सप्लाई का ठेका करता है।
दोस्त से मुलाकात..
मोहन ने दूर से देखते ही आवाज़ लगाई,
“अरे रामू! कहाँ रहे इतने दिन?”
रामदयाल हिचकते हुए बोले,
“बस यार… एक काम था… पैसों की ज़रूरत है… अपने ही पैसे हैं, बस वापस चाहिए थे…”
मोहन ने उनके कंधे पर हाथ रख दिया,
“देखता हूँ साहब से बात करता हूँ। तू चिंता मत कर।”
“और तेरा बेटा, कार्तिक? उसकी कोचिंग कैसी चल रही?”
मोहन गर्व से बोला,
“अरे बढ़िया! हर महीने 6000 कमा लेता है, अपनी पढ़ाई का खर्च खुद उठाता है।”
रामदयाल के होंठों पर हल्की मुस्कान आई,
“मेरी कृति भी सब संभाल लेती है… बस शादी की जिम्मेदारी रह गई है।”
मोहन के ऑफिस से बाहर निकलते ही, सामने काँच के काउंटर पर एक खूबसूरत कृष्ण जी की श्याम रंगी मूर्ति देखी।
रामदयाल ठहर गए—दिल जैसे रुक गया हो।
कितनी मनोहर मुस्कान… कितना कोमल चेहरा…
जैसे उन्हें बुला रही हो।
मोहन ने हंसकर कहा,
“ये विदेशी ऑर्डर है। मालिक ने खुद के लिए बनवाई है—तीन मूर्तियाँ।”
रामदयाल बहुत देर तक उसे देखते रहे। मन में एक ही ख्वाहिश…
“काश ये मेरे घर में होती…”
मूर्ति का खयाल मन में ताजा ही था कि घर पहुँचते ही देखा—दरवाजे के पास भीड़। एक बड़ी सी लक्ज़री कार।
“अरे ये कौन आया है?”
रामदयाल ने पूछा।
कमला मुस्कुराते हुए बोली,
“बस, तुम अंदर तो आओ!”
ड्राइंग रूम में एक सुशिक्षित, सूट-बूट में सजे हुए सज्जन बैठे थे।
रामदयाल को देखते ही वे सम्मान से खड़े हो गए।
“नमस्ते रामदयाल जी… मैं आपको नहीं जानता, पर आपकी बेटी… आपने जैसे संस्कार दिए हैं… तारीफ़ करनी पड़ेगी।”
रामदयाल चकराए,
“जी? बात क्या है?”
कहानी सुनकर सब चौंक गए
वो बोले,
“चार दिन पहले मैं मॉर्निंग वॉक पर था। अचानक मुझे सीने में दर्द हुआ और मैं सड़क पर गिर पड़ा। बोलने की भी ताकत नहीं थी… आसपास कोई नहीं था।”
“तभी आपकी बेटी कृति आई। उसने स्कूटी रोकी… दुकान से मदद लाई… मुझे उठा कर अपनी स्कूटी पर बैठाया और अस्पताल ले गई। डॉक्टर ने कहा, अगर पाँच मिनट और देर होती तो…”
कमरा एकदम शांत हो गया।
साहब आगे बोले,
“मैं आज उसे शुक्रिया कहने आया हूँ… और अगर आपका आशीर्वाद मिले, तो अपने बेटे के लिए उसका हाथ मांगने भी आया हूँ। ऐसी बेटी जो अनजान की जान बचा सकती है, वह घर संभालना तो उससे भी आसान समझेगी।”
कमला की आँखों में आँसू थे।
रामदयाल की सांस अटक गई।
वो सज्जन मुस्कुराते हुए बोले,
“और यह छोटा-सा उपहार… बस स्वीकार कीजिए।”
उन्होंने बैग खोला।
अंदर वही कृष्ण जी की मूर्ति चमक रही थी—वही मूर्ति जिसे रामदयाल कुछ समय पहले अपलक देख रहे थे।
रामदयाल की आँखें नम हो गईं।
“आज समझ आया… जो चीज़ दिल में सच्चे भाव से माँगी जाए, भगवान उसे किसी न किसी रूप में दे ही देते हैं।”
उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर कहा,
“आपने बेटी नहीं… हमारा हृदय जीत लिया है।”
कमला पहली बार बिना बोले सब समझ गई।
उसे महसूस हुआ—
कभी-कभी भगवान किसी लड़की के लिए लड़का नहीं भेजते… बल्कि उसके अच्छे कर्म उसे योग्य घर तक पहुंचा देते हैं।
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