आख़िरी रुपए वाला लड़का

 

बारिश में भीगा भूखा लड़का अदालत में खड़ा है और जज दयालु फैसला सुनाने वाली हैं।


एक बार का ज़िक्र है…

शहर की एक भीड़भाड़ वाली सब्ज़ी मंडी के पास एक छोटा सा पुल था, जिसके नीचे 15 साल का लड़का आरव अपनी दादी के साथ रहता था। दादी की उम्र ज़्यादा हो गई थी, ऊपर से ठंड के कारण वह कई दिनों से बीमार पड़ी थीं।


आरव कभी होटल में बर्तन धो देता, कभी किसी सब्ज़ी वाले का सामान उठाने में मदद कर देता—उसी से दो वक्त का खाना चल जाता था।

लेकिन इस बार लगातार बारिश के कारण दो दिनों से उसे कोई काम नहीं मिला था।


दादी की दवा खत्म हो गई थी।

पेट पिछले 24 घंटे से भूखा था।

और जेब में केवल आख़िरी 5 रुपए बचे थे।


उसके सामने दो सवाल थे—

दादी की दवा… या दोनों का खाना?


वह दवा की दुकान तक गया, दवाई का नाम लिया।

दुकानदार बोला, "65 रुपए की है बेटा।"

आरव ने धीरे से कहा,

“मेरे पास बस पाँच रुपए हैं… थोड़े पैसे कम कर दीजिए… दादी बहुत बीमार हैं…”


दुकानदार ने चश्मा नीचे करते हुए कहा,

“पैसे नहीं तो दवा नहीं। यहाँ दया से दुकान नहीं चलती।”


आरव चुपचाप बाहर आ गया।

बारिश अब और तेज़ हो चुकी थी।



भूख और लाचारी..

बारिश से बचते-बचाते वह एक बेकरी की दुकान के सामने रुका।

अंदर से रोटी की गर्म खुशबू आ रही थी।

उसके हाथ अपने आप काँप रहे थे।


उसने दुकानदार से पूछा,

“भइया, आधी ब्रेड कितने की होगी?”


दुकानदार ने हँसते हुए कहा,

“यहाँ आधी नहीं मिलती। 30 रुपए।”


आरव ने पाँच रुपए दिखाए,

“बस इतनी है…”


दुकानदार ने उसे झिड़क दिया,

“अरे चलो-चलो, फालतू टाइम मत खराब करो।”


उसने काफी देर दुकान के बाहर खड़े रहने के बाद धीरे से एक ब्रेड उठाई… और निकलने लगा।

तभी गार्ड ने पीछे से उसका हाथ पकड़ लिया।


“चोरी करते हुए पकड़ा है इसे!”


लोग इकट्ठा हो गए।

किसी ने मोबाइल निकाल लिया,

किसी ने कहा—“ऐसे बच्चों को सुधरना चाहिए।”

किसी ने उसे धक्का दिया।


आरव रोते हुए बोला,

“मैंने दादी के लिए ली थी… दो दिन से कुछ नहीं खाया।”


लेकिन भीड़ ने उसकी एक न सुनी।

गार्ड उसे पुलिस चौकी ले गया, और मामला अदालत तक पहुँच गया।



जज साहब एक सख्त मगर समझदार महिला थीं—जज निधि सरीन।

उन्होंने आरव को देखा—गीले कपड़े, कांपता शरीर, डरी आँखें।


जज ने पूछा,

“क्या तुमने ब्रेड चुराई?”


आरव ने धीरे से कहा,

“जी… मैंने ली थी।”


जज: “क्यों?”

आरव: “दादी बीमार हैं… और दो दिन से कुछ नहीं खाया था।”


जज: “काम क्यों नहीं करते?”

आरव: “करता था… बारिश ने सब काम रोक दिया।”


जज: “किसी से मदद माँगी?”

आरव: “जी… बहुतों से… किसी ने विश्वास नहीं किया।”


जज ने एक लंबी साँस ली।

पूरा कमरा खामोश था।




जज साहब ने फैसला पढ़ना शुरू किया—


“चोरी… खासकर खाने की चीज़ की चोरी…

एक अपराध है।

लेकिन उससे भी बड़ा अपराध यह है कि हमारा समाज एक बच्चे को भूखे रहने पर मजबूर कर देता है।”



पूरा कोर्ट देखता रह गया।


जज ने आगे कहा—


“इस लड़के ने ब्रेड इसलिए नहीं चुराई क्योंकि वह बुरा है…

बल्कि इसलिए क्योंकि हम सब अच्छे नहीं निकले।”


फिर उन्होंने हथौड़ा मारकर कहा —


1️⃣ फैसला नंबर एक


“यहाँ मौजूद हर शख्स पर 500 रुपए जुर्माना लगाया जाता है।

क्योंकि जब यह बच्चा 50 लोगों से मदद माँग रहा था, हम सब कहीं न कहीं वही लोग थे…

जो चुप थे, अंधे थे।”


उन्होंने सबसे पहले अपने पर्स से 500 रुपए निकालकर रख दिए।




2️⃣ फैसला नंबर दो


“मैं बेकरी दुकान पर 15,000 रुपए का जुर्माना लगाती हूँ,

क्योंकि उन्होंने एक भूखे बच्चे के साथ अमानवीय व्यवहार किया

और बिना समझे उसे पुलिस के हवाले किया।

अगर 48 घंटे में जुर्माना जमा नहीं किया गया

तो दुकान को सील करने का आदेश दिया जाएगा।”




3️⃣ फैसला नंबर तीन


“जुर्माने की पूरी रकम इस लड़के के नाम एक फिक्स्ड अकाउंट में जमा की जाएगी।

साथ ही सरकार की तरफ से

इस बच्चे की दादी के इलाज और उसकी शिक्षा की पूरी जिम्मेदारी उठाई जाएगी।”



जज साहब ने कहा—

“अंत में… अदालत इस बच्चे से माफी मांगती है।

क्योंकि उसे मजबूरी में अपराध की राह पर धकेलने वाले हम ही हैं।”


पूरा कोर्ट तालियों से गूंज उठा।

आरव की आँखों में आँसू थे—

लेकिन पहली बार वे डर के नहीं…

आस के थे।


जज साहब चुपचाप अपनी फाइल बंद करके कोर्ट रूम से बाहर चली गईं।

उनकी आँखों में भी नमी थी।



क्या हमारा समाज ऐसे फैसले के लिए तैयार है?


शायद नहीं…

लेकिन अगर एक जज चाहे,

एक समाज चाहे,

तो बहुत कुछ बदल सकता है।


#InsaaniyatKaFaisla #BhookAurNyay




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