रसोई में कटौती और समझदारी की सीख
सुबह के सात बज रहे थे। रसोई से बर्तनों की खड़खड़ाहट आ रही थी। बड़ी बहू अनु चाय चढ़ा रही थी और छोटी बहू राधिका आटे में पानी डालकर उसे गूँध रही थी। तभी पीछे से तेज़ आवाज आई—
“बहुओ! ये चीनी कितनी तेज़ी से खत्म हो रही है! क्या तुम लोग चाय में चीनी डालती हो या रसगुल्ले उबालती हो?”
ये आवाज थी सास उमा देवी की।
अनु ने चाय के भगोने को धीमा करते हुए कहा,
“मम्मी जी, चीनी तो पहले जितनी ही डालती हूँ…”
“अरे रहने दो! मुझे सब पता है। कल से आधी चीनी इस्तेमाल करोगी। और सुनो, चाय भी सबके लिए आधा कप बनेगी। महंगाई इतनी बढ़ गई है! घर चलाना कोई बच्चों का खेल है!”
राधिका ने हल्के से आंखें फैलाते हुए अनु को देखा।
“फिर शुरू हो गईं…” राधिका ने धीरे से बुदबुदाया।
उमा देवी ने वहीं से एक और “फरमान” सुना दिया—
“और हाँ, कल से बिस्कुट बंद। हर बार बिस्कुट बिस्कुट… अरे हमारे जमाने में तो लोग नमक के साथ चाय पी लेते थे!”
अनु ने मुस्कुराने की कोशिश की,
“ठीक है मम्मी जी…”
पर मन ही मन सोच रही थी—
“चीनी कम कर दो, चाय आधी कर दो, बिस्कुट बंद… कटौती हमेशा हमारे हिस्से में ही क्यों आती है?”
दोपहर को उमा देवी घर लौटते हुए बोलीं,
“बहुओ, आज मैंने बाजार में देखा—तेल के दाम तो डबल हो गए हैं। इसलिए आज से तेल भी कम इस्तेमाल होगा। पराठे नहीं बनेंगे, सिर्फ सूखी रोटी और सब्जी।”
ये सुनकर राधिका ने चौंकते हुए कहा,
“मम्मी जी, पर पापा जी को परांठे बहुत पसंद हैं…”
उमा देवी ने हाथ नचाते हुए कहा,
“हाँ हाँ, उनके लिए बनाना, तुम्हारे लिए नहीं। उन्हें दफ़्तर जाना होता है, ताकत चाहिए। तुम लोग तो घर पर ही हो, तुम्हें क्या ज़रूरत?”
राधिका गुस्से में होंठ काटकर चुप हो गई।
अनु ने उसकी तरफ देखा और संकेत किया—“शांत रहो…”
शाम को जब परिवार खाने पर बैठा, तो रोज़ की तरह राधिका रोटी सेंक रही थी और अनु सबको सर्व कर रही थी।
आज उमा देवी के चेहरे पर बड़ा सुकून था—
“देखो कटौती से कितना फायदा होगा।”
लेकिन अनु और राधिका ने आज कुछ और ही प्लान किया था।
अनु ने सबकी प्लेट में दाल-सब्जी परोसी।
पापा जी, दोनों बेटे, राधिका—सबको अच्छा-खासा खाना मिला।
उमा देवी की प्लेट में सिर्फ एक रोटी और दो चम्मच दाल रखी।
उमा देवी ने चौंक कर पूछा,
“अरे बहु, ये क्या? मेरे लिए बाकी सब्जी कहाँ है?”
अनु ने सीधी आवाज़ में कहा,
“मम्मी जी, कटौती चल रही है न… इसलिए हमने सोचा कि सबसे पहले कटौती उन पर होनी चाहिए जो ‘घर की लक्ष्मी’ हैं… मतलब आप।”
राधिका ने तुरंत कहा,
“मम्मी जी, आपने ही तो सिखाया था कि घर की लक्ष्मी कम में भी बरकत करना जानती है। तो हमने सोचा—आपसे बेहतर कौन?”
उमा देवी का चेहरा उतर गया।
“पर मेरी सब्जी क्यों कम?”
राधिका ने मासूम चेहरा बनाते हुए कहा,
“मम्मी जी, आप तो कहती हैं बहुएँ घर में ही रहती हैं, उन्हें ताकत की क्या जरूरत…
तो सोचा—आपके रूम में तो एसी भी है, आराम भी रहता है, इसलिए खाना भी थोड़ा ही चलेगा।”
बाकी सब हँसी रोकने की कोशिश कर रहे थे।
इतने में पापा जी ने चम्मच रखकर कहा,
“उमा, ये सब क्या सुन रहा हूँ मैं? कटौती करनी है तो हिसाब से करो।
यहाँ तो तुम बहुओं को आधा खाना खिला रही हो और खुद पूरा!”
उमा देवी चुप।
“और सबसे बड़ी बात—जब बहुएँ बीमार पड़ जाएँगी, तो घर कौन संभालेगा? तुम?
अरे तुम्हें तो एक सीढ़ी चढ़ना हो तो पहले पंखा चालू कर लेती हो!”
राधिका और अनु ने निगाहें झुका लीं, पर अंदर से मुस्कुरा रही थीं।
उमा देवी धीरे से बोलीं,
“पर महंगाई बहुत बढ़ गई है न…”
पापा जी ने तुरंत जवाब दिया—
“महंगाई बढ़ी है तो कमाई भी बढ़ी है। तीन कमाने वाले हैं घर में।
कटौती करनी है तो फिजूल की चीजों पर करो, खाने पर नहीं।
इंसान पहले पेट भर खाएगा, तभी काम करेगा।”
उमा देवी को अपनी गलती समझ आ गई।
उन्होंने धीमे से कहा,
“ठीक है… आगे से किसी के खाने में कटौती नहीं होगी।”
अनु और राधिका ने एक-दूसरे को आंख मारते हुए चुपचाप मुस्कुराया।
आज बहुएँ जीत गई थीं—वो भी बिना लड़ाई किए, सिर्फ समझदारी से।
#GharKiSachchai #SaasBahuRealStory

Post a Comment