माँ, आपने मेरी दुनिया संभाल ली…
शहर के एक दो कमरे के छोटे से फ्लैट में रहने वाला परिवार…
पिता महेश जी एक प्राइवेट कंपनी में जॉब करते थे और
माँ सरोज छोटी-छोटी सिलाई के काम से घर चलाने में हाथ बँटाती थीं।
उनका बेटा आयुष…
तेज़-तर्रार, समझदार, पर थोड़ा गुस्सैल।
आयुष बारहवीं में था और इस साल बोर्ड की तैयारियों में लगा हुआ था।
घर में माहौल लगातार तनाव से भरा रहता था—
क्योंकि खर्चा बढ़ रहा था और आयुष की कोचिंग फीस भी भारी थी।
माँ रात-दिन सिलाई करती,
और आयुष को लगता—
“माँ से इतनी छोटी-मोटी चीज़ें क्या समझ आएंगी?”
एक दिन शाम को…
आयुष अपनी कोचिंग से लौटा।
देखा, माँ मशीन पर झुकी हुई थी, आँखों में थकान साफ दिख रही थी।
माँ ने प्यार से पूछा—
“बेटा, खाना लगा दूँ? तुम थक गए होगे…”
आयुष चिढ़कर बोला—
“माँ, प्लीज़! ये सिलाई मशीन की आवाज़ बंद करो न!
मैं हर वक्त पढ़ाई नहीं कर पाता!
और आप है कि दिन-रात इस पर लगी हुई रहती हैं…”
माँ कुछ बोलना चाहती थीं, पर बिना कुछ कहे मशीन बंद कर दी।
चेहरे पर हल्की सी मायूसी उतर आई।
पिता, जो कमरे में ही थे, सब देख रहे थे।
पर उन्होंने कुछ कहा नहीं।
अगले दिन…
कोचिंग से लौटकर आयुष ने देखा—
बैग में एक नया नोटबुक और हाईलाइटर रखा था।
वह चौंका—
“ये तो महंगा वाला है… किसने लिया?”
माँ ने धीरे से कहा—
“बेटा, तेरी पढ़ाई में मदद हो जाएगी न… इसलिए ले आई।”
आयुष झल्लाकर बोला—
“माँ! आपको क्या ज़रूरत है ऐसे महंगे सामान लाने की?
आपको क्या पता कौन-सा अच्छा होता है, कौन-सा नहीं?”
माँ चुप…
उसने हल्की-सी फीकी मुस्कान दी और बिना कुछ कहे धीमे कदमों से रसोई की ओर लौट गई।
पिता ने बस एक लंबी साँस ली।
और फिर… एक ऐसा दिन आया जिसने उनके पूरे घर का माहौल ही बदल कर रख दिया।
आयुष की कोचिंग में एक मॉडल टेस्ट हुआ।
बहुत ही कठिन पेपर था।
आयुष का रिज़ल्ट सिर्फ 38/100 आया।
वह घर पहुँचा—खुद से नाराज़, खुद से निराश।
उसे लगा—
“मैं तो हमेशा टॉप करता था… आज ये क्या?”
वह थककर सोफे पर गिर गया।
माँ पानी का गिलास रखकर बोली—
“बेटा, सब ठीक है?
चेहरा उतरा हुआ लग रहा है…”
आयुष झल्लाकर बोला—
“माँ, आप कुछ समझ नहीं सकतीं…
मेरा टेस्ट खराब गया है!”
माँ ने धीमे से पूछा—
“38 आया क्या…?”
आयुष चौंका—
“आपको कैसे पता?”
माँ हिचकिचाई—
“मैंने कोचिंग सेंटर जाकर बस ऐसे ही पूछ लिया था…
तुम सुबह ठीक नहीं लग रहे थे, तो…”
आयुष की आँखें बड़ी हो गईं—
“आप… अकेले… इतनी दूर गई थीं?”
माँ ने हल्की सी थकी आवाज़ में कहा—
“हाँ बेटा…
तू परेशान न हो, इसलिए जानना चाहती थी कि क्या हुआ…”
और तभी पिता ने पहली बार बोलना शुरू किया
“आयुष…
तुझे लगता है तेरी माँ को पढ़ाई-लिखाई की समझ नहीं है?
पर असल में ये घर…
तेरी पढ़ाई…
तेरी कोचिंग…
सब कुछ…
तेरी माँ समझती है, संभालती है।”
आयुष सुनता रहा।
पिता बोले—
“तू जानता है, ये हर दिन क्यों सिलाई करती है?
क्योंकि उसकी कमाई से ही महीने की आधी फीस भरती है।
तुझे याद है नया नोटबुक?
उसके लिए तेरी माँ ने दो दिन तक रात को भी हाथ चलाए थे।
और जिस आवाज़ को तू शोर समझ लेता है… वही आवाज़ तेरे सपनों की नींव बनाती है, बेटा।”
पिता की आवाज़ भारी हो गई—
“पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बन जाएगा,
ये तो दुनिया सिखा देगी…
पर माँ का दिल समझने का विद्या
कम ही लोगों को आती है।”
आयुष के हाथ से पानी का गिलास छूटते-छूटते बचा।
वह भागकर माँ के पास गया।
माँ रसोई में दाल में तड़का लगा रही थी।
आयुष ने पीछे से जाकर माँ को कसकर पकड़ लिया—
“माँ… मैं कितना गलत था।
आपको पढ़ाई नहीं आती,
पर आप मेरा हर दुख पढ़ लेती हैं।
आपने मेरी कॉपी नहीं देखी,
पर मेरी जिंदगी ठीक-ठीक देख ली…”
माँ पिघल गईं—
“अरे पगले… तू उदास था, इसलिए चिंतित थी… बस…”
आयुष रोता हुआ बोला—
“माँ, आप नहीं होतीं…
तो मैं ये सपने भी नहीं देख सकता था।
आपने मेरी किताब नहीं पढ़ी,
पर आपने मेरी दुनिया पढ़ ली।”
माँ ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—
“चल, अब खाना खा…
आज तेरा पसंद का आलू-चना बनाया है।”
उस दिन आयुष पहली बार समझा—
माँ सिर्फ सिलाई नहीं करती,
वह घर के हर टुकड़े में भविष्य बुनती है।
और पढ़ाई सिर्फ किताबों की नहीं होती—
प्यार, त्याग और माँ की उँगलियों के निशान भी पढ़ने पड़ते हैं।

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