बहू का धैर्य और घर की सच्चाई
श्यामकुंज मोहल्ले में रहने वाली अनुष्का की शादी को अभी डेढ़ साल ही हुआ था। उसका पति राहुल रेल विभाग में नौकरी करता था और अक्सर बाहर पोस्टिंग रहती थी। इसलिए अनुष्का ज्यादातर अपनी सास सरोज देवी, देवर रवि और ननद कृतिका के साथ ही रहती थी।
शादी के शुरुआती दो–तीन महीने ठीक रहे, पर धीरे–धीरे घर का माहौल बदलता गया।
शुरुआत—जहाँ रिश्ते बाहर से मीठे और अंदर से कड़वे थे...
सरोज देवी हर बात पर अनुष्का को ही टोक देती थीं—
“बहू, इतना देर से क्यों उठी?”
“सबके काम निपटाकर ही खाना खाया करो।”
“घर की बहुएँ ऐसे कपड़े नहीं पहनतीं।”
लेकिन अनुष्का को सबसे ज्यादा दुख रवि और कृतिका के व्यवहार से होता।
दोनों उससे पाँच–छह साल बड़े थे, पर हर बात ऐसे कहते जैसे वो बच्ची हो—
“भाभी ये गलत है।”
“भाभी ऐसे नहीं, वैसे करिए।”
“राहुल भैया तो कुछ बोलते नहीं, हम ही संभाल रहे हैं घर।”
अनुष्का कई बार चुप रहती, लेकिन दिल में तड़प बढ़ती जा रही थी।
एक दिन...
सुबह का समय था। अनुष्का आटा गूँध रही थी कि तभी कृतिका रसोई में घुसकर बोली—
“वाह भाभी! सुबह–सुबह मोबाइल लेकर बालकनी में हँस–हँस कर बात कर रही थीं, किससे? राहुल भैया से या फिर… किसी और से?”
उसके स्वर में ताना भी था और शक भी।
अनुष्का सहम गई—
“तुम क्या बोल रही हो कृतिका? मैं पापा को दवा की लिस्ट पूछ रही थी।”
कृतिका मुस्कुराकर बोली—
“अरे भाभी, मज़ाक था। पर सच बोलूँ तो आपको काम के बीच मोबाइल कम इस्तेमाल करना चाहिए।”
सरोज देवी भी वहीं आ पहुँचीं—
“हाँ बहू, बच्ची है अभी… इसके मज़ाक को दिल पे मत लो। तुम समझदार हो, तुम ही थोड़ा झुक जाओ।”
यह सुनकर अनुष्का का सब्र टूट गया।
अनुष्का की आवाज़ पहली बार ऊँची हुई
वह थक चुकी थी, रोज–रोज की तानो से, तमीज़ के नाम पर सुनाई देने वाली बातों से…
उसने धीमी लेकिन सख़्त आवाज़ में कहा—
“अम्मा जी, हर बार मुझसे ही क्यों उम्मीद की जाती है कि मैं ही झुकूँ?
इन बच्चों को कभी क्यों नहीं समझातीं कि तमीज़ क्या होती है?”
कृतिका तमतमा गई—
“हम बच्चे? हम तो आपसे बड़े हैं!”
रवि भी कमरे में आ गया—
“भाभी, आपको घर के नियम मानने चाहिए, नहीं तो भैया से बात करनी पड़ेगी।”
अनुष्का का दिल जल उठा—
“रूल्स लागू करने का शौक है तो पहले खुद सीखो, कि किसी को कैसे ट्रीट करते हैं।”
घर में तूफान जैसा माहौल हो गया।
तीनों—सास, देवर, ननद—पीछे बैठकर अनुष्का की खूब बुराई करने लगे।
और अनुष्का के कानों में सब बातें साफ़–साफ़ पहुँच रही थीं।
घर की जिन ‘दिखावटी जिम्मेदारियों’ का ढिंढोरा पीटा जाता था, उनकी असलियत अब सामने आ रही थी।
कृतिका बोली—
“अम्मा, आपने बहू को बहुत सिर चढ़ा रखा है।”
रवि ने जोड़ा—
“अम्मा मैं हूँ ना! आप क्यों इसकी बातों में आकर दुखी होती हैं?
कल मेरी शादी होगी, मैं और मेरी पत्नी आपका पूरा ख्याल रखेंगे।”
अनुष्का यह सुनकर रसोई में ही हँस दी—
जो लड़का खुद चाय का कप तक नहीं उठाता, वह अम्मा की सेवा करेगा?
कितनी विडंबना थी।
राहुल घर लौटता है...
उस दिन शाम को राहुल का फोन आया। अनुष्का रोते–रोते उसे सब बताया।
राहुल ने कहा—
“बस, इस बार मैं आऊँगा तो तुम्हें हमेशा के लिए साथ ले जाऊँगा।”
दोनों ने फैसला कर लिया।
अगले हफ्ते...
राहुल घर आया।
अनुष्का ने साफ़ कहा—
“राहुल, मैं कम सुविधा में रह लूँगी
पर इस माहौल में अब बिल्कुल नहीं रह पाऊँगी।”
राहुल ने बिना एक शब्द बोले उसका हाथ पकड़ा और बोला—
“ठीक है… हम अभी चलते हैं।”
सरोज देवी ने रोका नहीं।
रवि और कृतिका भी मुँह बनाकर चुप ही रहे।
अनुष्का सामान लेकर चली गई।
पर जाते समय उसने किसी को कुछ नहीं कहा—
ना दोष, ना ताना… बस चुपचाप चली गई।
जब बहू नहीं रही— तब असली हालत पता चली
दो हफ्ते भी नहीं हुए कि घर की हालत बिगड़ने लगी—
रसोई में कोई ठीक से काम नहीं करता
कपड़े धूल जाते, पर कोई तह नहीं करता
घर बिखरा रहता
सरोज देवी की दवा तक सही समय पर नहीं दी जाती
रवि और कृतिका रोज़ छोटी–छोटी बात पर आपस में झगड़ने लगे।
सरोज देवी को तब समझ आया—
जो बहू दिन–रात बिना बोले सब सम्भाल रही थी, वही घर की असली नींव थी।
उन्होंने कई बार राहुल को फोन किया—
“बेटा, बहू को कुछ दिन के लिए भेज दे… घर संभाल लेगी।”
पर अनुष्का ने विनम्र पर स्पष्ट जवाब दिया—
“अम्मा जी, मैं मिलने आ सकती हूँ…
लेकिन अब वहाँ रहने वापस नहीं आऊँगी।”
और वह अपने फैसले पर अडिग रही।
समय बीतता गया।
अनुष्का की नई जगह पर जिंदगी धीरे–धीरे सँभल गई।
राहुल को भी एहसास हो गया कि उसने पत्नी को अकेला छोड़कर कितनी गलती की थी।
और सरोज देवी को भी समझ आ गया कि
बहू को सिर चढ़ाने और सम्मान देने में
बहुत फर्क होता है।
पर अब देर हो चुकी थी।
अनुष्का ने एक बात सीख ली—
रिश्ते वही अच्छे होते हैं जहाँ सम्मान हो।
जहाँ रोज़ अपमान हो, वहाँ चुप रहकर रहना भी गलत है।
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