इज़्ज़त की कीमत

 

सास के भेदभाव के बीच बहू और पति का स्वाभिमान दिखाती भावनात्मक पारिवारिक कहानी


सुबह के साढ़े दस बजे थे। पूजा गली के कोने वाले आँगन में कपड़े सुखा रही थी। तभी बाहर सड़क पर साइकल की घंटी बजी। पूजा ने झाँककर देखा—उसका पति मोहित सब्जियाँ लिए आ रहा था।

मोहित जैसे ही अंदर आया, मुस्कुराकर बोला—

“पूजा, आज सब्ज़ी वाला ताज़ी फरसबी लाया था… तुम्हें पसंद है न?”


पूजा मुस्कुराई—

“हाँ, पर आप क्यों लेकर आए? मैं तो बाजार ही जाने वाली थी।”

मोहित हँसते हुए बोला—

“तुम्हें दो मिनट चैन से बैठा नहीं देख सकता था, इसलिए ले आया।”


मोहित की ये छोटी-छोटी बातें पूजा का मन खुश कर देती थीं।

लेकिन उसी खुशी पर जैसे किसी ने मिट्टी डाल दी जब थोड़ी ही देर में आँगन के गेट से एक तेज़ आवाज आई—

“अरे बहू! कोई है इस घर में? या फिर सबके सब सोकर पड़े हैं?”

पूजा चौंक गई। वो जानती थी ये आवाज़ किसकी है—

उसकी सास, लता देवी।


लता देवी हाथों में थैले लटकाए, कंधे पर भारी पर्स टाँगे, ऐसे इतराते हुए आँगन में प्रवेश करती हैं मानो पूरा घर उनके आने का इंतज़ार कर रहा हो।

ओढ़नी झटकते हुए बोलीं—

“हूँ… ये कैसा घर है? बाहर आते ही धूप लग गई मुझे। तुम लोग पंखा तो कम से कम आँगन में लगवा दो।”


पूजा ने आदर से कहा—

“माँ जी, आइए… बैठिए। मैं पानी लेकर आती हूँ।”


लता देवी ने चारों ओर देखते हुए ताना मारा—

“और क्या! मेरी छोटी बहू किरण का घर तो महल जैसा है। वहाँ तो एसी, कुलर, सब है। और यहाँ? दो कमरे… बस! मोहित को देखो—उम्र हो गई लेकिन अकल नहीं आई… कुछ कमाने-खाने की सोचता नहीं।”


मोहित अभी-अभी कमरे में गया था, पर माँ की बातें सुनकर वह चुपचाप वहीं रुक गया और बाहर आने की हिम्मत नहीं जुटा पाया।

पूजा ने महसूस किया कि उसका पति अंदर कहीं चुपचाप बैठा है।

लेकिन वह भी जानती थी—मोहित की मेहनत कभी कम नहीं होती, बस किस्मत साथ नहीं दे रही।



थोड़ी देर बाद…


लता देवी ने अपने बैग से चमकीले पैकेट निकालकर पूजा के सामने रख दिए।


“ये ले बहू। किरण ने भेजा है तेरे लिए। पाँच साड़ियाँ हैं—सब ब्रांडेड।

कह रही थी—भाभी पहन लेंगी तो अच्छा लगेगा। आखिर हमारी फैमिली की इज़्ज़त है।”


पूजा ने हाथ जोड़ते हुए कहा—

“माँ जी, मेरी साड़ियाँ बिल्कुल ठीक हैं। मुझे इनकी ज़रूरत नहीं है।”


लता देवी की भौंह सिकुड़ गई—

“अरे! क्या मतलब? जरूरत नहीं है?

अपने मायके में यही सस्ती-कपड़े पहनती थी न?

अब कुछ अच्छा-बुरा समझना तो चाहिए तुम्हें!”


पूजा चुप हो गई।

उसकी सास ने फिर ताना मारा—

“और सुनो, अगले हफ्ते राहुल और किरण की तीसरी शादी की सालगिरह है। बड़ा कार्यक्रम है। होटल में! तुम ये हल्की रंगों वाली साड़ियाँ मत पहनना। लोगों में हंसी उड़ जाएगी। इसलिए किरण ने इतनी मँहगी साड़ियाँ भेजी हैं।”


पूजा ने कहना चाहा—

“माँ जी… पर—”


“पर-वर कुछ नहीं। जो कहा है, वही करना!”


माहौल फिर भारी हो गया।



थोड़ी देर बाद, जब माहौल थोड़ा शांत हुआ, मोहित कमरे से बाहर आया।

पूजा ने उसे सारी बात बताई।

मोहित ने साड़ियों के पैकेट खोलकर देखा।

उसकी आँखों में निराशा उतर आई।


“ये…? ये तो किरण की पहले पहनी हुई हैं।

उसने इनके फोटो भी डाले थे इंस्टाग्राम पर।”


पूजा चौंक गई—

“क्या? सच?”


मोहित ने मोबाइल पर दिखाया।

वही साड़ी… वही कलर… वही बॉर्डर…


पूजा के होंठ सूख गए।

उसे तभी समझ आया कि क्यों लता देवी बार-बार बोल रही थीं—

‘ब्लाउज़ तो कहीं गुम ही गया है… मिल नहीं रहा। तुम किसी अपना वाले से मैच कर लेना, वही पहन लेना।’


मोहित ने गुस्से में कहा—

“पूजा, मैं गरीब हूँ, ठीक है। लेकिन अपनी पत्नी को दूसरों के पुराने कपड़े पहनने नहीं दूँगा। ये इज़्ज़त से बढ़कर कुछ नहीं।”


उसने तुरंत पैकेट उठाया और बाहर आँगन में चली माँ के पास पहुँचा।



“माँ,”

मोहित ने शांत पर कड़े स्वर में कहा,

“ये साड़ियाँ आप वापस ले जाइए।”


लता देवी तुरंत भड़क गईं—

“अरे! लेना नहीं है तो मत लो, पर इतना नाटक क्यों?

किरण ने इतनी महंगी साड़ियाँ दी हैं।

इस बहू ने तो कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा ऐसा पहनना!”


मोहित बोला—

“माँ, महंगी का मतलब नया नहीं होता।

किरण ये साड़ियाँ पहले खुद पहन चुकी है, माँ… पूजा किसी की उतरन नहीं लेगी।”


लता देवी एक पल के लिए अटक गईं।

फिर बोलीं—

“उतरन है तो क्या? ब्रांडेड तो है! और तुम लोगों की औकात?”


बस… इतना सुनते ही मोहित का सब्र टूट गया।


“माँ, हमारी औकात भले कम हो, पर हमारी इज़्ज़त बहुत बड़ी है।

हम दूसरों का फेंका नहीं पहनते।

और हाँ… अगले हफ्ते की सालगिरह में हम नहीं आएँगे।

क्योंकि आपको हमारा जाना शर्मिंदगी लगता है।”


लता देवी तिलमिलाईं, चिल्लाईं, पैर पटककर बोलीं—

“ठीक है! मत आना! जिनको इज़्ज़त की कदर नहीं, मैं बुलाती भी नहीं!”


कहकर वो तेज़ी से बाहर निकल गईं।



अगले हफ्ते...

पूजा रात को खिड़की से बाहर देख रही थी।

मोहित पास आया और बोला—

“क्या सोच रही हो?”


पूजा धीमे से हँस पड़ी—

“सोच रही थी… पार्टी में नहीं गए, फिर भी कितना सुकून है।”


मोहित ने हल्के से उसका हाथ पकड़ लिया—

“क्योंकि हम इज़्ज़त से समझौता नहीं करते।”


पूजा ने मोहित

 के कंधे पर सिर रख दिया।


उनके पास कम था, पर खुशी पूरी थी।

उनका घर छोटा था, पर इज़्ज़त बड़ी थी।


और यही उन्हें दूसरों से अलग बनाता था।

#ParivarKiIzzat #SelfRespectKiKahani



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