दिखावे की कीमत
दीपाली के ससुराल में आजकल एक ही चर्चा चल रही थी—
रोहित का रिश्ता पक्का हो गया है।
रोहित, दीपाली का देवर था। नौकरी पुणे में करता था।
लड़की सान्या—बीकॉम कर चुकी थी, घर पर थी।
दोनों परिवार सम्पन्न थे, किसी चीज़ की कमी नहीं थी।
रिश्ता तय होते ही सब खुश थे।
लेकिन ठीक पाँच दिन बाद ही रोहित की माँ का अचानक देहांत हो गया।
घर का पूरा बोझ अब दीपाली पर आ गया।
रस्में, रिश्तेदार, फोन, घर की देखभाल—सब वही संभाल रही थी।
रोहित और सान्या कभी-कभी फोन पर बात कर लेते थे।
रोहित खुश था, लेकिन दीपाली अभी तक लड़की से ज़्यादा नहीं मिली थी।
बस एक बार शादी की बातचीत में झलक मिली थी।
साड़ी खरीदने का दिन...
रोहित के पापा ने कहा—
“दीपाली, सान्या को साथ लेकर हो जाए चुनाव। आजकल की लड़कियाँ क्या पहनना चाहती हैं, हम क्या जानें?”
दीपाली तैयार हो गई।
सान्या तेज़-तर्रार, फैशनेबल और थोड़ी दिखावटी स्वभाव वाली थी।
शोरूम पहुंचते ही उसने एक से बढ़कर एक महंगी साड़ियाँ पसंद करनी शुरू कर दीं—
कोई 45,000 की
कोई 60,000 की
कोई 80,000 की
दीपाली की समझ से बाहर था कि एक लड़की, जो रोज़ सूट और जींस पहनती है, इतनी महंगी साड़ियाँ क्यों ले रही है?
फिर सान्या ने सजने-संवरने के सामान, जूतियाँ, क्लच, और डायमंड जैसी डिज़ाइन वाले झुमके लेना शुरू कर दिए।
और अंत में…
दो लाख का लहंगा।
दीपाली घबरा गई।
धीरे से बोली—
“बिटिया, जितना जरूरी है, उतना ले लो। बाकी पैसा तुम बाद में अपनी पसंद की चीज़ें लेने में खर्च कर सकती हो। साड़ियाँ तो एक-दो बार ही पहननी हैं।”
सान्या ने हँसते हुए कहा—
“भाभी, आप समझ नहीं रहीं। मेरी सहेली प्रिया की शादी में उसके ससुराल ने ढाई लाख का लहंगा दिया था। सबने उसकी बहुत तारीफ की थी।
मैं उससे कम कैसे रहूँ? लोग क्या कहेंगे—सान्या को ससुराल वालों ने क्या दिया?”
दीपाली चुप रह गई।
बहस करने का यह समय नहीं था।
वह डर रही थी—कहीं नाराज़ न हो जाए।
घर में हंगामा...
जब बिल रोहित के पापा के हाथ में पहुँचा…
वे गुस्से से लाल हो गए।
“चार लाख रुपये!
यह साड़ियाँ हैं या सोने की चूड़ियाँ?”
उन्होंने दीपाली से पूछा—
“तुम साथ थीं, तुमने रोका क्यों नहीं?”
दीपाली बोली—
“रोका था पापाजी… पर वह सुनना ही नहीं चाहती थी। कह रही थी कि सहेलियों को दिखाना है।”
रोहित के पापा ने माथा पकड़ लिया—
“दिखावा! यही तो आजकल की बीमारी है।
बेटी को समझाना होगा कि जिंदगी दिखावे पर नहीं चलती, बजट पर चलती है।”
सान्या के पिता से बातचीत...
उन्होंने फोन मिलाया।
शांत स्वर में मगर सख़्ती से बोले—
“भाई साहब, हमें तड़क-भड़क पसंद नहीं।
हमारे घर में पैसे की कमी नहीं है, पर फिजूलखर्ची मंज़ूर नहीं।
लड़की को समझाइए—ज़िंदगी फैशन पर नहीं चलती, समझदारी पर चलती है।”
सान्या के पिता चुप रहे।
शायद उन्हें भी पता था कि उनकी बेटी दिखावे की आदी है।
बात की गंभीरता...
रात को दीपाली छत पर बैठी सोचती रही—
“आजकल की पीढ़ी दिखावे में इतना खो जाती है कि असली जरूरतें भूल जाती है।
पहले माहौल, फिर जिंदगी, फिर रिश्ते—सब महंगाई में टूट जाते हैं।”
रोहित भी परेशान था।
पर उसे उम्मीद थी कि सान्या समय के साथ बदल जाएगी।
कुछ दिन बाद—सान्या की गलती का एहसास...
सान्या के घर में भी उसकी काफी डांट पड़ी।
पिता ने सीधे कहा—
“बेटी, शादी के बाद तुम अपनी ससुराल की इज्ज़त हो।
खर्च समझदारी से करना सीखो।
दिखावा क्षणिक होता है, लेकिन जीवन बहुत लंबा।”
सान्या के अंदर कहीं एक झटका लगा।
वह समझ गई कि शायद वह सच में जरूरत से ज्यादा बहक गई थी।
अगले दिन उसने खुद दीपाली को फोन किया—
“भाभी, मुझसे गलती हुई।
कुछ साड़ियाँ मैं वापस कर दूँगी।
मुझे एहसास है कि ज़िंदगी दिखावे का मेला नहीं है।”
दीपाली मुस्कुराई—
“कोई बात नहीं बिटिया, समझ जाओ वही काफी है।”
समय के साथ सान्या ने शादी के बाद घर को अपनी समझ से चलाया।
वह अब छोटी-छोटी चीज़ें देखकर खुश हो जाती थी।
और सबसे बड़ी बात—उसने कभी अपने पति पर अनावश्यक दबाव नहीं डाला।
कहानी का सार:
दिखावा इंसान को कुछ देर खूबसूरत बनाता है,
पर जिंदगी को बदसूरत कर देता है।
खर्च अपने बजट से करें, दूसरों की चमक देखकर नहीं।
समझदारी रिश्तों को बचाती है, और फिजूलखर्ची तोड़ देती है।
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