मेरी पत्नी कोई बोझ नहीं है
रात के 9 बजकर 42 मिनट हो रहे थे।
बाहर हल्की-हल्की ठंडी हवा चल रही थी, और अंदर…
एक ऐसा सच मेरे सामने आने वाला था, जिसने मेरे दिल को अंदर तक हिला दिया।
मैं ऑफिस से थका-हारा घर पहुँचा।
सोचा—आज रिद्धि (मेरी पत्नी) को सरप्राइज दूँगा।
क्योंकि दो दिन पहले ही डॉक्टर ने उसे स्ट्रिक्ट बेड रेस्ट की सलाह दी थी।
दरवाज़ा धीरे से खोला,
लाइट ऑफ थी,
बस रसोई से बर्तन बजने की हल्की-सी आवाज़ आ रही थी।
मेरा दिल धक से रह गया।
“रिद्धि?”
मैंने आवाज़ लगाई।
कोई जवाब नहीं।
मैं सीधे रसोई में पहुँचा—
और जो देखा…
वह मेरे पैरों तले ज़मीन खिसका देने जैसा था।
मेरी पत्नी…
जिसे डॉक्टर ने कहा था कि ज़रा-सा भी झुकना नहीं, ज्यादा चलना नहीं…
वह एक हाथ से पेट संभालकर
और दूसरे हाथ से भारी भगौना उठाए
सिंक के पास खड़ी थी।
उसके चेहरे पर दर्द साफ़ दिखाई दे रहा था।
साँसें तेज़।
पसीने की बूंदें कनपटियों पर चमक रही थीं।
वह मुझे देखकर सकपका गई।
“तुम यहाँ? मैंने सोचा तुम देर से आओगे…”
उसकी आवाज़ काँप रही थी।
मैंने तुरंत भगौना उसके हाथ से ले लिया।
“रिद्धि! यह क्या कर रही हो? डॉक्टर ने मना किया था!”
वह अचानक चुप हो गई।
अचानक उसकी आँखें झुक गईं,
जैसे किसी चोरी में पकड़ ली गई हो।
मैंने उसका चेहरा ऊपर किया—
आँसू रुके नहीं, सीधे बह निकले।
“रिद्धि, सच बताओ।”
एक पल के लिए उसने कुछ नहीं कहा।
फिर धीरे-धीरे बोली—
“अगर मैं खाना नहीं बनाती…
अगर मैं बर्तन नहीं धोती…
अगर मैं तुम्हारी माँ और बड़े भाई की बात न मानूँ…
तो पूरे दिन ताने मिलते हैं।
कहते हैं—
‘बहू हो तो काम करो, गर्भवती हो तो क्या हुआ?
हमारी औरतों ने भी बच्चे पैदा किए थे!’ ”
मेरे अंदर कुछ जलने लगा।
पहली बार नहीं, कई बार मैंने हल्का-फुल्का तनाव देखा था,
लेकिन इतनी तकलीफ़?
इतना दबाव?
मैं गुस्से में भड़का—
पर आवाज़ हल्की रखनी पड़ी, क्योंकि मुझे सच्चाई चाहिए थी, बहस नहीं।
“और तुमने मुझे बताया क्यों नहीं?”
वह रोते हुए बोली—
“क्योंकि मैं नहीं चाहती थी कि आप अपने घरवालों से उलझें।
सोचा.. बच्चा होने तक सब सह लूँगी…
पर आज… आज बहुत दर्द हो रहा था।”
मैंने उसे कसकर पकड़ लिया।
उसकी पीठ ठंडी थी, शायद डर के मारे।
तभी पीछे से आवाज़ आई—
“क्या नाटक चल रहा है?”
मेरी माँ और बड़ा भाई दरवाज़े पर खड़े थे।
चेहरे पर नाराज़गी ऐसे जैसे कोई अपराध पकड़ लिया हो।
माँ बोलीं—
“बहू थोड़ी बहुत मदद कर दे, तो इसमें गलत क्या है?
हमने भी तो इतने काम किए हैं!”
मेरे भाई ने जोड़ दिया—
“सारा दिन घर में रहती है, दो बर्तन नहीं धो सकती?”
अब मैं फट पड़ा।
“बस!
अब एक शब्द भी नहीं।”
घर में पहली बार मेरी आवाज़ इतनी ऊँची गई थी।
मैं उनकी तरफ बढ़ा और बोला—
“जिस लड़की को आप ‘बहू’ कहते हैं,
वह मेरे बच्चे की माँ बनने वाली है।
डॉक्टर ने कहा है—एक छोटा सा भी दबाव उसकी सेहत को नुकसान पहुँचा सकता है।
और आप लोग उसे मजबूर कर रहे हैं काम करने के लिए?”
माँ चिल्लाईं—
“तो हम क्या गलत कर रहे हैं? पहले भी तो बहुएँ करती आई हैं!”
मैंने सीधा जवाब दिया—
“पहले गलत था तो क्या अब भी वही गलत दोहराऊँ?
मेरी पत्नी घर का हिस्सा है, नौकरानी नहीं।”
वातावरण भारी हो गया।
चुप्पी जम गई।
मैंने फैसला सुना दिया—
“माँ, भाई…
आप दोनों को जितना प्यार, जितनी इज्ज़त मैंने दी,
उसका मतलब यह नहीं कि आप रिद्धि पर हक़ जमाएँ।
आज से रिद्धि कोई घर का काम नहीं करेगी।
अगर आप दोनों का यही रवैया रहा…
तो मैं रिद्धि को लेकर अलग घर चला जाऊँगा।”
दोनों चौंक गए।
भाई ने कुछ कहना चाहा, पर मैं बीच में बोल पड़ा—
“एक और शब्द…
और मैं अभी इसी वक्त निकल जाऊँगा।”
उन दोनों के चेहरे उतर गए।
माँ ने धीरे से कहा—
“हमें पता नहीं था कि उसकी तबियत इतनी खराब है…”
मैंने कहा—
“जानने की कोशिश भी तो नहीं की।”
माँ चुप हो गईं।
भाई भी।
उस रात मैंने रिद्धि को कमरे में ले जाकर कंबल ओढ़ाया।
खाना मैंने खुद गर्म किया।
खुद उसे खिलाया।
दवा दी।
और उसके पास बैठा रहा।
वह धीरे से बोली—
“मुझे लगा था… तुम भी मेरी बात नहीं समझोगे…”
मैंने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा—
“रिद्धि,
तुम कोई बोझ नहीं हो।
तुम घर की नींव हो।
तुम मेरे बच्चे की माँ हो।
और अगर आज मैंने तुम्हारी तकलीफ़ नहीं समझी…
तो शायद मैं कभी कुछ समझ ही न पाता।”
उसकी आँखों में एक भरोसा लौट आया।
अगला दिन—सब बदल गया...
सुबह माँ मेरे कमरे में आईं।
रिद्धि को देखकर उनका चेहरा शांत था।
उन्होंने कहा—
“बहू, तुम आज से कोई काम नहीं करोगी।
हम सब मिलकर घर संभाल लेंगे।
तुम बस अपने बच्चे को स्वस्थ रखो।”
रिद्धि की आँखें भर आईं।
और पहली बार माँ ने उसके सिर पर हाथ रखा।
कुछ महीने बाद…
रिद्धि ने एक प्यारी-सी बेटी को जन्म दिया।
जब मैंने उसे गोद में उठाया,
मुझे एक ही बात समझ आई—
अगर उस रात मैं देर से आता…
अगर चुप रहता…
अगर रिद्धि की थकान को ‘सामान्य’ समझ लेता…
तो शायद आज मेरी बेटी इस दुनिया में नहीं आती।
डॉक्टर ने बताया भी—
“थोड़ा भी तनाव और ज्यादा काम—complication हो सकती थी।”
मैंने अपनी बेटी को चूमकर कहा—
“तुम्हारी माँ ने तुम्हें सुरक्षित रखा है।
अब मेरी बारी है उन्हें हमेशा सुरक्षित रखने की।”
रिद्धि मुस्कुरा रही थी—
थकी हुई, पर संतुष्ट।
और उस मुस्कान ने एक बात साफ़ कर दी—
एक पत्नी को घर नहीं चाहिए…
उसे सिर्फ़ एक ऐसा पति चाहिए
जो हर मुश्किल में उसके साथ खड़ा हो।

Post a Comment