एक पल का घमंड
दुल्हन सीमा की शादी को अभी पाँच दिन भी नहीं हुए थे। घर में चहल-पहल तो थी, लेकिन सीमा ने महसूस किया कि उसकी सास उर्मिला देवी उससे न जाने क्यों हमेशा खिंची-खिंची रहती हैं। हाथ का काम भी लेतीं, पर तारीफ़ नहीं… बस ताने।
कारण?
दहेज।
सीमा के मायके वालों ने अपनी क्षमता के अनुसार सब कुछ दिया था — फर्नीचर, इलेक्ट्रॉनिक, थोड़ा-बहुत गहना, और रोज़मर्रा की जरूरतों का सामान। पर उर्मिला देवी की नज़र हमेशा उन चीज़ों पर रहती थीं जो नहीं मिली।
कभी बोलतीं—
“अरे गैस चूल्हा तो ठीक है पर अगर डबल बर्नर होता तो कितना अच्छा होता…”
कभी—
“इतनी कम चादरें भेजी? आजकल बहुएं रिश्तेदारों के सामने अच्छा नहीं दिखाना चाहती क्या?”
सीमा सब चुपचाप सुन लेती।
पति रोहित नौकरी के सिलसिले में बाहर रहते थे, इसलिए सीमा को अकेले ही सास के तेवर झेलने पड़ते थे।
एक दिन…
सुबह-सुबह उर्मिला देवी ने फिर ताना दे दिया,
“सीमा, तुम्हारी मां ने दाल रखने का बड़ा डब्बा नहीं भेजा। बार-बार बाज़ार भागना पड़ेगा। कुछ पता भी है शादी में क्या-क्या देना चाहिए!”
सीमा ने धीरे से कहा,
“मम्मी जी, आप बोलतीं तो मैं ले आती…”
पर उर्मिला देवी को चुप होना कहाँ आता था।
“इतनी सी बात भी मुझे बोलनी पड़ेगी? ससुराल में आकर बहू को खुद समझना चाहिए। न जाने कैसे घर चलाएगी आगे!”
सीमा की आंखें भर आईं, पर उसने कुछ नहीं कहा।
शाम को बगल वाली विमला आंटी आईं। वो सब जानती थीं।
उन्होंने हँसते हुए कहा,
“उर्मिला, तुम आजकल दहेज का हिसाब ज़्यादा ही रखती हो! इतना क्यों?”
उर्मिला बोलीं,
“क्या करूं विमला, बेटी देने वाले ने आधा सामान दिया। ऊपर से मेरी बहू भी कुछ बोलती नहीं। बस पत्थर की मूर्ति बनी रहती है!”
विमला आंटी ने धीरे से कहा,
“अरे उर्मिला, दहेज की नहीं, बहू की कद्र किया करो। सामान तो आज है, कल टूट जाएगा। पर बहू होशियार हो तो पूरा घर संभाल लेती है।”
उर्मिला देवी हँसते हुए बोलीं,
“बस-बस मत समझा! अच्छी बहू वही जो सारे ताने झेले और एक शब्द भी न बोले!”
सीमा दरवाजे के पीछे सब सुन रही थी।
दिल में गाँठ और बड़ी हो गई।
रात को रोहित का फोन आया। आवाज़ सुनकर ही सीमा रो पड़ी।
“क्या हुआ, सीमा?”
“कुछ नहीं…”
“मम्मी ने कुछ कहा?”
सीमा चुप।
रोहित ने आह भरकर कहा,
“सीमा, सुनो। अगर मम्मी कुछ कहें, तो उनसे साफ बात कर लेना। चुप रहने से बात बढ़ती है।”
सीमा बोली,
“अगर एक ही बात रोज़ सुननी पड़े तो कोई कब तक ताने सह सकता है?”
रोहित की तरफ भी चुप्पी थी… शायद वो भी समझ रहा था।
चार दिन बाद…
सुबह-सुबह दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई।
सास ने देखा—
सीमा एक बड़ा सा कार्टन लेकर खड़ी है।
“ये क्या है?”
“मम्मी जी, आपकी सारी ‘कमियाँ’ पूरी कर दी हैं।”
उर्मिला देवी चौंक गईं,
“क्या मतलब?”
सीमा ने शांत आवाज़ में कहा,
“ये डबल बर्नर स्टोव, स्टील के डब्बों का पूरा सेट, चादरें, और जो-जो आप रोज़ याद दिलाती थीं… सब खरीद लाई हूँ। ताकि अब मेरी माँ-पिता को धोखेबाज़ न कहना पड़े।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
उर्मिला देवी बोलीं,
“इतना पैसा कहां से आया?”
“मैंने अपनी पहली सैलरी से खरीद लिया। कोशिश यही थी कि आपको मुझ पर बोझ न लगे।”
उर्मिला देवी के चेहरे पर थोड़ा-सा अपराध-बोध आया, पर अहंकार अभी भी बाकी था।
“और ये खरीदकर क्या सिद्ध करना चाहती हो?”
सीमा की आँखें भर आईं,
“कुछ नहीं… बस अब मैं जा रही हूँ रोहित के पास। क्योंकि आप मुझे यहाँ प्यार नहीं दे पा रहीं।”
सास चिल्लाईं,
“अरे बहू ऐसे कैसे चली जाएगी? घर तेरे बिना कैसे चलेगा?”
सीमा ने पहली बार दृढ़ स्वर में कहा,
“घर?
जिसे आपने सिर्फ दहेज रखने की जगह समझा है?”
“मैंने अपनी जॉब से छुट्टी ले ली है, ट्रांसफर करवाऊंगी और अपने पति के साथ रहूंगी। मैं यहाँ सिर्फ ताने सुनने नहीं आई थी, मम्मी जी।”
इतने में उसके ससुर जी अंदर आए और बोले,
“सीमा बिल्कुल सही कर रही है। उर्मिला, तुम बस उन्हीं चीज़ों की गिनती करती रह गई जो नहीं मिली। जो बहू घर में आई है, उसकी कीमत नहीं समझी।”
उर्मिला देवी ने आक्रोश में कहा,
“तो क्या मैं गलत हूँ?”
ससुर बोले,
“बहुत गलत हो। बहू दहेज नहीं, बेटी बनकर आती है। और तुमने अपनी बहू को सामान से छोटा समझ लिया।”
उर्मिला चुप।
सीमा ने अपना बैग उठाया।
सास कमरे के दरवाज़े पर खड़ी थीं।
पहली बार उनकी आवाज़ नरम थी।
“सीमा… अगर चाहो तो…”
सीमा मुस्कुराई,
“मम्मी जी, अगर कभी आपका दिल सच में बदल जाए… तो मैं बेटी बनकर लौट आऊँगी।
लेकिन जहाँ हर दिन ताने मिलें, वहाँ बहू तो क्या—एक बेटी भी नहीं रह पाती।”
बात खत्म।
वो चली गई।
कुछ महीनों बाद…
रोहित और सीमा अब दूसरे शहर में खुशी से रह रहे थे।
सीमा जॉब भी कर रही थी।
उधर उर्मिला देवी?
हर दोपहर, वही सेट किया हुआ डबल बर्नर, वही स्टील के डब्बे…
सब आँखों के सामने होते, पर बहू नहीं।
ससुर हल्के व्यंग में कहते,
“अरे उर्मिला, तुझे तो यही सब चाहिए था न?
अब पूरा घर दहेज से भरा है,
बहू तो थी ही बेकार!”
उर्मिला चुप हो जातीं।
दिल के भीतर एक गहरी चुभन उठती, जैसे किसी ने भीतर ही भीतर ज़ख्म दे दिया हो।
और मन ही मन सोचतीं—
“काश मैंने सामान में कमी ढूँढने के बजाय बहू की अच्छाई ढूँढ ली होती… आज घर सूना न होता।”
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