एक दिन अम्मा को समझ आया

 

रसोई में खड़ी भावनाओं से भरी बहू, जिसकी आँखों में मायके की चिंता है, और सामने बैठी सास अपने अहंकार में खोई हुई — दो पीढ़ियों के बीच समझ और बदलाव की एक मार्मिक झलक।


सुबह के साढ़े पाँच बज रहे थे।

रसोई से बर्तनों की खटपट और गैस पर चढ़े चायपत्ती की खुशबू पूरे घर में फैल चुकी थी।

नीरा आज फिर जल्दी उठ गई थी। वैसे तो रोज़ उठती ही थी, लेकिन आज मन कुछ बेचैन था।


कारण?

कल रात फिर अम्मा जी से थोड़ी कहा-सुनी हो गई थी।


"इतनी देर रात तक मोबाइल पर कौन बात करता है? घर का ध्यान नहीं, बस फोन फोन फोन,"

अम्मा जी ने अपनी ऊँची आवाज़ में कहा था।


नीरा ने धीमे से जवाब दिया था —

"अम्मा जी, मम्मी की तबीयत ठीक नहीं थी, उसी के बारे में बात कर रही थी।"


"अरे, मम्मी की तबीयत, मम्मी की तबीयत... ये घर कोई हॉस्पिटल है क्या? इधर भी कोई बीमार पड़े तो कौन संभालेगा?"


नीरा चुप रह गई।

कहने को बहुत कुछ था पर चुप रहना ही उसने बेहतर समझा।

रोज़ की वही बातें, वही ताने, वही नाराज़गी —

और उसके बीच वो, जो हर हाल में घर संभालने की कोशिश करती थी।


सुबह जब सूरज की पहली किरणें कमरे में आईं तो उसके पति विजय की आँख खुली।

वो बोला,

"अरे नीरा, तुम इतनी सुबह से काम में लगी हो, थोड़ी देर और सो जातीं!"


नीरा मुस्कुरा दी,

"अगर मैं सो जाऊँ तो नाश्ता कौन बनाएगा?"


विजय ने बस इतना कहा,

"कभी-कभी खुद को भी थोड़ा आराम दे लिया करो।"


वो जानता था — उसकी पत्नी दिनभर कैसे सब संभालती है,

माँ की डाँट, बेटे की पढ़ाई, घर की सफाई, सब कुछ।



थोड़ी देर बाद अम्मा जी भी अपने कमरे से निकलीं।

सफेद बाल, माथे पर लाल बिंदी, और हमेशा की तरह तनी हुई भौंहें।


"नीरा, चाय बनी?"


"जी अम्मा, बस ला रही हूँ।"


"और नाश्ते में क्या बना रही है?"


"पोहे बनाए हैं अम्मा, और साथ में चाय।"


"अरे रोज़-रोज़ वही, कुछ नया नहीं बना सकती? लगता है बहुओं को अब घर के स्वाद की परवाह ही नहीं रही!"


नीरा ने मुस्कुराते हुए कहा,

"अम्मा, आज आपका मनपसंद पराठा बना देती हूँ, आप बैठिए।"


"रहने दे, जब मन नहीं होता तो कोई स्वाद नहीं आता!"

कहकर अम्मा जी टीवी चालू कर देती हैं।



दिन ऐसे ही निकलते गए।

अम्मा जी को हर बात में कमी नजर आती —

कभी नमक ज़्यादा, कभी देर से रोटी, कभी बातों में जवाब।


विजय बीच-बचाव करता लेकिन अम्मा जी का गुस्सा तो जैसे उनकी पहचान बन चुका था।


एक दिन दोपहर को नीरा को फोन आया।

फोन के उस पार उसकी छोटी बहन थी —

"दीदी, पापा की तबीयत अचानक बहुत बिगड़ गई है। मम्मी बहुत परेशान हैं। जल्दी आओ ना!"


नीरा का चेहरा उतर गया।

उसने तुरंत विजय को फोन किया।

"विजय, पापा की हालत ठीक नहीं है, मुझे जाना पड़ेगा।"


"अरे हाँ, मैं आकर छोड़ देता हूँ।"


वो दोनों तुरंत तैयार हुए और अम्मा जी के कमरे में पहुँचे।


विजय ने कहा,

"अम्मा, नीरा के पापा की तबीयत बहुत खराब है। कुछ दिन के लिए उसे मायके जाना होगा।"


अम्मा जी ने चश्मा उतारा,

"क्या? इतनी जल्दी में जाने की क्या जरूरत है? सब ठीक हो जाएगा।

घर का काम कौन करेगा?"


"अम्मा, नीरा के पापा ICU में हैं। वो बहुत चिंतित है।"


"अरे, हर बार बहाने! कभी माँ बीमार, कभी बाप बीमार। ये बहुएँ तो सास के घर आई हैं, अपने मायके की चिंता करने नहीं!"


नीरा के आँसू छलक पड़े,

लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।

सामान पैक किया, और जाने लगी।


जब वो दरवाज़े तक पहुँची तो अम्मा जी ने फिर ताना मारा,

"जा, अपने मायके ही बस जा! यही दिन देखना बाकी रह गया था कि बहू ससुराल छोड़ जाए!"


नीरा रुकी।

उसने शांत स्वर में कहा,

"अम्मा, मैं ससुराल छोड़ नहीं रही, बस अपने माँ-बाप की हालत देखने जा रही हूँ।

कभी आप भी माँ रही हैं, तो सोचिए — अगर आपके बेटे की पत्नी आपकी तबीयत खराब होने पर ऐसे ही मना कर देती तो आपको कैसा लगता?"


अम्मा जी कुछ पल को चुप रह गईं।

उनके चेहरे पर जैसे सोच की लकीरें उतर आईं।


नीरा ने आगे कहा,

"मैं आपकी बहू हूँ, पर किसी की बेटी भी। और बेटी को अपने माँ-बाप के लिए वक्त पर पहुँचना ज़रूरी होता है।"


ये कहकर नीरा निकल गई।



अगले दो दिन घर में सन्नाटा रहा।

अम्मा जी को पहली बार अहसास हुआ कि नीरा के बिना घर कितना सूना है।

रोटी खुद बनानी पड़ी, बर्तन खुद धोने पड़े।

टीवी चलाने तक का मन नहीं हुआ।


तीसरे दिन जब विजय चाय लेकर आया तो अम्मा बोलीं,

"बेटा, नीरा से बात हुई क्या?"


"अरे अम्मा, कल रात ही बात हुई थी। पापा अब ठीक हैं। शायद कल लौट आएँगी।"


"हम्म... अच्छा किया जो गई थी। माँ-बाप के लिए तो जाना चाहिए था..."

कहते हुए अम्मा जी का स्वर खुद नम पड़ गया।



अगले दिन नीरा लौट आई।

जैसे ही अंदर आई, अम्मा जी ने धीरे से कहा,

"कैसे हैं तेरे पापा?"


"अब ठीक हैं अम्मा, मां भी बेहतर हैं।"



अम्मा जी ने धीमे से कहा,

"अच्छा किया जो गई थी... मैं ही ग़लत सोच रही थी।"


नीरा मुस्कुरा दी।

इतने सालों बाद पहली बार अम्मा जी ने ऐसा कहा था।


रात को जब नीरा ने खाना परोसा तो अम्मा जी ने प्यार से कहा,

"आज तेरे हाथ का खाना बड़ा स्वादिष्ट लग रहा है।"


नीरा की आँखों में नमी थी।

शायद आज अम्मा जी को सच में समझ आया था —

कि रिश्ते मकान से नहीं,

दिल से बनते हैं।


कहानी का संदेश:

माँ, सास, बहू — ये सब रिश्ते तभी खिलते हैं जब उनमें “समझ” और “सम्मान” दोनों हों।

घर ईंटों से नहीं, आपसी अपनापन से बनता है।

#ParivarikKahani #RishtonKiSeekh




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