सावित्री की दूसरी सुबह
वाराणसी की एक शांत गली में रहने वाली सावित्री देवी सुबह से ही घबराई हुई थीं। बदन टूट रहा था, सिर भारी लग रहा था और आँखें बार-बार बंद होने को हो रही थीं। उन्होंने सोचा—
“शायद कल ज्यादा काम कर लिया… या दो दिन की नींद पूरी नहीं हुई।”
रसोई में जाकर खिचड़ी बनाने लगीं, पर हाथ काँप रहे थे। जैसे-तैसे थोड़ा सा खाकर अपने पुराने लकड़ी के पलंग पर लेट गईं।
कुछ ही देर में तेज ठंड लगने लगी। उन्होंने रजाई ओढ़ ली, पर फिर भी शरीर काँपता रहा। माथे पर हाथ रखा तो लगा जैसे आग जल रही हो।
थर्मामीटर लगाया—
104°F बुखार।
सावित्री घबरा गईं।
“इतना तेज बुखार… अब क्या करूँ? घर में तो मैं अकेली ही हूँ…”
उन्हें अचानक अपने स्वर्गीय पति शिवप्रसाद याद आ गए।
“अगर वो होते तो अपने हाथों से तुलसी की चाय बनाकर पिलाते… माथा सहलाते… डॉक्टर तक लेकर जाते…”
सोचते-सोचते आँखें भर आईं।
उन्होंने काँपते हाथों से फोन उठाया और बेटे अंशुल का नंबर मिलाया।
उधर से आवाज आई—
“हाँ मम्मी? बोलिए…”
“बेटा, मुझे बहुत तेज बुखार है… अगर आ सको तो…” सावित्री ने धीमी आवाज में कहा।
अंशुल ने तुरंत जवाब दिया—
“मम्मी, आज सच में नहीं आ पाऊँगा। ऑफिस में बहुत ज़रूरी क्लाइंट आया है। आप थोड़ी देर आराम कर लीजिए… शायद तबीयत ठीक हो जाए। और हाँ, पानी ज्यादा पीना। मुझे टाइम मिले तो रात में कॉल करूँगा।”
कॉल कट।
सावित्री कुछ देर मोबाइल को देखती रहीं। उनका गला भर आया था।
इस बार उन्होंने बेटी रचना को फोन लगाया।
“रच… बेटी, मुझे बहुत… बुखार…”
“मम्मी!” रचना ने बात काट दी, “आज बिल्कुल नहीं आ सकती। भाभी की पूजा है, मेहमान आ रहे हैं। मैं निकल नहीं पाऊँगी। आप अंशुल भैया को बुला लीजिए।”
बात पूरी होने से पहले ही फोन कट गया।
सावित्री के हाथ ढीले पड़ गए।
पूरा कमरा जैसे घूमने लगा।
रात तक हालत और बिगड़ गई।
उन्होंने पड़ोस में रहने वाली अपनी नौकरानी शांति को बुलाया।
शांति ने बिना समय गँवाए कहा—
“अम्मा, अब अस्पताल चलना पड़ेगा। मैं अभी ऑटो बुलाती हूँ। आप अकेली कैसे सहेंगी?”
ऑटो आया और सावित्री को अस्पताल ले जाया गया।
डॉक्टर ने चेकअप कर कहा—
“प्लेटलेट कम हो रहे हैं… डेंगू है। आपको अस्पताल में भर्ती रहना होगा।”
सावित्री चुपचाप सिर हिलाती रहीं।
वो अकेली थीं… बहुत अकेली।
दूसरे दिन सुबह एक बुजुर्ग सज्जन उनके कमरे में आए।
सामने फलों की टोकरी और फूलों का गुलदस्ता।
“नमस्ते बहनजी,” उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “मैं रामनाथ सिंह। आपके घर के पास वाले चौहान साहब की बिल्डिंग में रहता हूँ। शांति ने बताया कि आप अस्पताल में हैं, तो सोचा मिलने आ जाऊँ।”
सावित्री ने आश्चर्य से पूछा—
“पर… आपको क्यों तकलीफ करनी पड़ी?”
रामनाथ जी हँस पड़े—
“अरे बहनजी, तकलीफ कैसी? इंसान ही इंसान का सहारा होता है।”
उस दिन से वे रोज दो बार आते।
कभी फल, कभी घर का बना दलिया, कभी बस पाँच मिनट की बातचीत।
उनकी मधुर आवाज और शांत स्वभाव में अजीब सा भरोसा था।
दस दिन बाद सावित्री को छुट्टी मिल गई।
शाम को वे घर लौटी ही थीं कि दरवाजे पर दस्तक हुई।
रामनाथ जी हाथ में डिब्बा लिए खड़े थे—
“आज आपकी पसंद का आलू-पोहे बनाए हैं। हल्का खाने से आपको आराम मिलेगा।”
सावित्री हल्का सा मुस्कुराईं—
“आप रोज... इतना क्यों करते हैं?”
रामनाथ जी ने धीमी आवाज में कहा—
“क्योंकि… मैं जानता हूँ अकेलापन कैसा होता है।”
फिर कुछ क्षण चुप रहने के बाद बोले—
“मेरी पत्नी विद्या को गुज़रे पाँच साल हो गए। बच्चे बाहर रहते हैं। मैं भी अकेला हूँ। जिंदगी बस… खाली हो गई थी।”
सावित्री के मन में कुछ पिघलने लगा।
हाँ, वे भी अकेले थीं… बहुत अकेले।
एक शाम रामनाथ जी बोले—
“क्यों न हम मिलकर एक कोचिंग सेंटर खोलें? आप अंग्रेजी अच्छी पढ़ाती हैं और मैं गणित। खाली समय भी कट जाएगा और कुछ आमदनी भी हो जाएगी।”
सावित्री ने तुरंत कहा—
“क्यों नहीं! मेरे पति भी चाहते थे मैं कुछ करूँ।”
कुछ ही दिनों में “सावित्री शिक्षण केंद्र” खुल गया।
बच्चे आने लगे।
हँसी-खुशी फैलने लगी।
रामनाथ जी अकसर घर आ जाते—
कभी पढ़ाई की योजना पर चर्चा करने, कभी चाय पीने, कभी यूँ ही बात करने…
धीरे-धीरे दोनों के बीच एक अपनापन पनपने लगा।
एक ऐसा रिश्ता जो दो अकेले दिलों को जोड़ रहा था।
समाज की बातें और बच्चों की नाराज़गी...
इसी दौरान रिश्तेदारों और पड़ोसियों में कानाफूसी शुरू हो गई—
“अरी, सावित्री तो रामनाथ से मिलने लगी है…”
“इस उम्र में क्या जरूरत…”
“अब बच्चे क्या कहेंगे…”
कुछ दिनों में ये बात अंशुल और रचना तक पहुँची।
एक दिन दोनों गुस्से में घर आ धमके।
“मम्मी!” अंशुल चिल्लाया, “आप हमें क्या मुँह दिखाएँगी? ये सब क्या चल रहा है?”
रचना बोली—
“लोग मज़ाक उड़ाएँगे! हमारी इज़्ज़त मिट्टी में मिल जाएगी!”
सावित्री ने सिर उठाकर दोनों को देखा।
उनकी आवाज में वर्षों का दर्द था—
“जब मैं अस्पताल में अकेली पड़ी थी… तब तुम्हें मेरी इज्जत की चिंता नहीं थी।
जब मैं मरने जैसी हालत में थी, तब तुम्हें समाज याद नहीं आया।
आज जब एक इंसान ने मेरे अकेलेपन को समझा… मेरा हाथ पकड़ कर खड़ा किया…
तो तुम्हें समाज की पड़ी है?”
बच्चों के चेहरे झुक गए।
सावित्री ने दृढ़ आवाज में कहा—
“मैं भी इंसान हूँ… मेरे भी दिल है… मेरी भी भावनाएँ हैं।
अगर ज़िंदगी मुझे दूसरी सुबह दे रही है… तो मैं उसे अपनाऊँगी।”
अंशुल की आँखें भर आईं।
“मम्मी… हमें माफ कर दो।
हम आपकी ज़रूरतें समझ ही नहीं पाए…”
रचना भी रो पड़ी—
“हमें आपकी खुशी से क्या परेशानी हो सकती है?
आप अपना फैसला खुद लीजिए… हम आपके साथ हैं।”
सावित्री ने दोनों को गले से लगा लिया।
उनकी आँखों से खुशी के आँसू बह रहे थे।
कुछ महीनों बाद सावित्री और रामनाथ जी ने सरल सा पंजीकरण करके
एक साथी, एक हमसफर के रूप में नई जिंदगी शुरू कर दी।
उनके आस-पास लोग चाहे जो सोचें
—
पर उनके दिलों में फिर एक नई सुबह,
एक नई उम्मीद,
एक नया जीवन खिल चुका था।
सीख:
बुढ़ापा एक ठहरा हुआ पानी नहीं होता।
थोड़ा सा स्नेह डालो—
तो उसमें भी जीवन की लहरें उठने लगती हैं।

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