एक जोड़ी चूड़ियों का वादा

 

Elder daughter-in-law holding traditional pink bangles while younger sister-in-law apologetically returns them, with mother-in-law watching in an emotional Indian family setting.


सुबह के आठ बजे थे। पूजा रसोई में खड़ी चाय बना रही थी। तभी पीछे से उसकी ननद ने आवाज़ लगाई—


“भाभी, एक बार मेरा कमरा देख लें न, मेरी पसंद की गुलाबी चूड़ियाँ नहीं मिल रही हैं। आज कॉलेज में कार्यक्रम है।”


पूजा ने मुस्कुराकर कहा, “अच्छा, चलो मैं ढूँढ देती हूँ।”


पर जैसे ही अलमारी खोली, पूजा के हाथ वहीं थम गए।

चूड़ियों का वही डिब्बा सामने पड़ा था—जो उसकी सास, मालती देवी, दो महीने पहले उससे बोली थीं—


“पूजा, ये चूड़ियाँ मेरी माँ ने मुझे दी थीं। जब तुम चाहोगी, मैं तुम्हें दूँगी… बड़ी बहू को ही दूँगी।”


तब पूजा ने पहली बार अपने लिए अपनापन महसूस किया था। उसे लगा था कि मालती देवी उसे सिर्फ़ बहू नहीं, बल्कि बेटी मानने लगी हैं।


पर आज… आज तो यह डिब्बा खुला हुआ था, और चूड़ियाँ जगह पर नहीं थीं।


वह एक पल को चुप रह गई, फिर धीरे से पूछा—

“नेहा… तुम्हें चूड़ियाँ किसने दी?”


नेहा बोली, “अरे भाभी, माँ ने दी हैं। कहा— नेहा को पहनने दो, आज उसके कॉलेज का बड़ा दिन है।”


पूजा बस मुस्कुरा दी, लेकिन उस मुस्कान में बहुत कुछ छिपा था।



पूजा चाय बनाने में व्यस्त हो गई। उसके हाथ काँप रहे थे।


उसने मन में सोचा—


“क्यों माँ ने खुद मुझे नहीं बताया?

क्या मैं सिर्फ़ काम करने वाली हूँ?

क्या मुझसे किया वादा बस यूँ ही था?”


उसे याद आया—


शादी के पाँच सालों में उसने क्या-क्या नहीं किया था!


सुबह की चाय से लेकर रात की दाल तक वही बनाती।


सबकी पसंद याद रखती—सास की हल्की दाल, ससुरजी का गाढ़ा दूध, पति रोहन की अदरक वाली चाय, और नेहा की खिचड़ी।


घर की हर पूजा, हर त्योहार, हर जिम्मेदारी उसी के सिर पर होती।



फिर भी… कभी उसकी तारीफ नहीं।

कभी एक बात नहीं—“पूजा, तुमने अच्छा किया।”


और आज…

आज तो वो चूड़ियाँ तक उससे छीन ली गईं, जिनसे उसे पहली बार अपना हक मिला था।


उसे लगा कुछ टूट गया है अंदर।



रोहन की अनदेखी...


उसी समय उसका पति रोहन कमरे से निकला।


फोन कान पर था, हाथ में बैग।


“पूजा, आज मीटिंग है, मुझे टिफ़िन दे दो जल्दी।”


पूजा चाहती थी वह पूछ ले—

“तुम ठीक तो हो?”

“कुछ परेशान लग रही हो?”


पर रोहन ने बिना देखे टिफ़िन उठाया और निकल गया।


पूजा एक पल खड़ी रही।

उसकी आँखों में पानी आ गया, पर उसने खुद को संभाला।



चूड़ियों की बात सास तक पहुँची...


दोपहर में मालती देवी ने आवाज़ लगाई—


“पूजा, जरा मेरे कमरे में आना।”


पूजा वहाँ पहुँची तो मालती देवी बोलीं—


“सुना है तुम चूड़ियाँ ढूँढ रही थीं?”


पूजा ने सिर झुकाकर कहा—“हाँ, पर अब जरूरत नहीं है।”


मालती देवी हँसकर बोलीं—


“अरे, तुम भी भावुक हो जाती हो।

नेहा का कॉलेज में कार्यक्रम था, इसीलिए दे दी।

तुम बड़ी हो, समझ सकती हो न?”


पूजा बस इतना ही बोल सकी—


“हाँ माँ… पर अगर आप मुझसे कह देतीं… तो मैं खुद नेहा को दे देती।”


मालती देवी चुप हो गईं।

फिर बोलीं—“तुम्हें देखा नहीं था सुबह, इसलिए नेहा को ही दे दी। कोई बड़ी बात नहीं है।”


पूजा समझ गई—यह सिर्फ़ बहाना था।



नेहा की बेचैनी...


नेहा दोपहर से ही अजीब सी असहज थी।

उसे पता था कि माँ ने चूड़ियों का वादा पूजा को किया था।

वह बार-बार भाभी की तरफ देखती।


शाम को वह पूजा के पास आई—


“भाभी… अगर आप कहें तो चूड़ियाँ आपको दे दूँ। मैंने पहनकर कॉलेज नहीं गई। बस घर ले आई थी।”


पूजा ने तुरंत कहा—

“नहीं नेहा… अब तुम्हारे पास हैं तो ठीक है।”


नेहा की आँखें भर आईं—


“भाभी, मैं नहीं चाहती कि आपके साथ गलत हो।

आपने इस घर के लिए कितना किया है…

मुझे पता है माँ ने वो चूड़ियाँ आपको देने की बात कही थी।”


पूजा ने बस मुस्कुरा दिया—


“बात चूड़ियों की नहीं नेहा… बात उस वादे की है।”



शाम—पूजा और रोहन की शादी की सालगिरह...


आज उनकी शादी की 5वीं सालगिरह थी।

घर में छोटी-सी पार्टी रखी गई थी।


सजावट नेहा कर रही थी।

पूजा किचन में मिठाई बना रही थी।


रोहन लौटकर बोला—


“पूजा, आज तो खुश रहो। तुम सुबह से उदास क्यों हो? नेहा ने बताया कि चूड़ियों की वजह से…?”


उसकी आवाज़ में ताना भी था और एक तरह की नाराज़गी भी थी।


पूजा पल भर रुकी—


“मैंने कोई शिकायत नहीं की रोहन। बस मन थोड़ा… भारी था।”


रोहन ने बिना समझे कहा—


“एक जोड़ी चूड़ियों के लिए इतना बड़ा ड्रामा? कम ऑन, पूजा!”


उसके शब्द तीर की तरह लगे।


पूजा चुप रही।

पहली बार उसने खुद को अकेला महसूस किया।



रात को पार्टी शुरू हुई।

मेहमान आए, सब हँस रहे थे।


तभी अचानक नेहा सबके सामने खड़ी हो गई—


“मैं एक बात कहना चाहती हूँ।”


सब शांत हो गए।


नेहा बोली—


“आज जो चूड़ियाँ मुझे मिलीं… वे नानी की निशानी थीं।

माँ उन्हें पूजा भाभी को देने वाली थीं।

आज अनजाने में भाभी का दिल दुखा है।

मैं चाहती हूँ कि यह चूड़ियाँ अपने सच्चे हक़दार तक पहुँचें।”


उसने चूड़ियों का डिब्बा सबके सामने पूजा को थमा दिया।


पूरा घर स्तब्ध रह गया।



सास और पति का बदलना...


मालती देवी आगे आईं—


“पूजा… शायद मैं तुम्हें हमेशा परीक्षा की नजर से देखती रही।

नेहा ने आज मुझे मेरी गलती दिखा दी।

ये चूड़ियाँ तुम्हारी थीं, और रहेंगी।

आज से मैं ध्यान रखूँगी कि किसी का हक न टूटे।”


उनकी आँखें भर आईं।

पूजा के लिए यह पहली बार था जब सास ने गलती स्वीकार की।


रोहन भी आगे आया, सिर झुकाकर—


“पूजा… मैं समझ नहीं पाया था कि तुम कितनी आहत हो।

मुझे तुमसे ऐसे बात नहीं करनी चाहिए थी।

माफ कर दो मुझे।”


पूजा की आँखों से आँसू गिर पड़े।

इस बार चोट के नहीं… बल्कि अपनापन मिलने के थे।



पूजा ने चूड़ियाँ अपने पास रख लीं।

अब वे सिर्फ़ दादी की निशानी नहीं थीं।

वे उसके आत्म-सम्मान, उसके हक और उसके अस्तित्व का प्रतीक बन गईं।


रात खत्म हुई, लेकिन पूजा के दिल में एक नया सवेरा जन्म ले चुका था—

इस घर में अब शायद उसका अपना स्थान बनने लगा था।




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