❝ दो वक्त की रोटी और माँ ❞
सुबह के नौ बज रहे थे। घर में काम करने वाली बाई छुट्टी पर थी, और पूनम जल्दी-जल्दी रसोई में हाथ चला रही थी। तभी उसकी सास, कमला देवी, धीरे-धीरे दीवार पकड़कर रसोई में पहुँचीं।
“पूनम बेटा, ज़रा मेरे कपड़े धुलने रख देना… दो दिन से चक्कर आ रहे हैं, हाथ-पैर काम ही नहीं कर रहे।”
पूनम जो पहले से ही काम के बोझ से चिड़ी हुई थी, बिना सोचे झल्लाकर बोली—
“मम्मी जी, आप अपने कपड़े हाथ से धो लीजिए। मैं बच्चों के कपड़े भी इसी मशीन में धोती हूँ। आप तो रोज़-रोज़ बीमार पड़ती रहती हो, कहीं कुछ हमें भी न लग जाए!”
ये सुनते ही कमला देवी वहीं रुक गईं। हाथ में उनके दो पुराने सलवार-कुर्ते थे, जिन्हें वो मशीन में डालने आई थीं। चेहरे पर हल्की सी ठेस, पर आवाज़ उतनी ही नरम—
“पर बेटा… मशीन में आज कोई कपड़ा भी नहीं है, तो सोच रही थी कि दो मेरे डाल दूँ। हाथों में दर्द रहता है, इसलिए…”
पूनम ने बीच में ही बात काट दी—
“नहीं मम्मी जी। जब आपकी तबीयत ठीक हो जाएगी, तब धो लीजिएगा। अभी तो बिल्कुल नहीं। मेरे बच्चों को इंफेक्शन हो गया तो?”
कमला देवी चुपचाप खड़ी रहीं, फिर धीरे से पलटकर अपने कमरे में चली गईं।
कमरा जैसे रोता हुआ…
कमरे में घुसते ही उन्हें धूल की मोटी परत दिखी। मेज़ पर दवाई की बोतलें पड़ी थीं। कोने में डिस्पोज़ल प्लेटें और ग्लास रखे थे—पिछले पाँच-छह दिनों से कोई सफ़ाई नहीं हुई थी।
वो पलंग पर बैठ गईं और सामने अलमारी पर लगे आईने में खुद को देखा—
सूखी त्वचा, बिखरे बाल, दूबले कंधे, और गंदे कपड़े…
आँसू अपने-आप ढलक पड़े।
अभी कुछ महीनों पहले सब ठीक था।
बड़ा परिवार—बेटा रवि, बहू पूनम और दो बच्चे आयुष-आस्था।
रवि इलेक्ट्रॉनिक दुकान में काम करता था। पूनम स्कूल में क्लर्क थी।
घर की ज़िम्मेदारी कमला देवी ही संभालती थीं—खाना, बच्चों का ध्यान, सब कुछ।
पर तीन महीने पहले रवि को अचानक हार्ट अटैक आया। अस्पताल में खूब कोशिशें हुईं… पर वो नहीं बच सके।
उसी दिन से घर टूट गया… और कमला देवी भी।
पूनम की नौकरी भी छुट गई क्योंकि बच्चों और घर की देखभाल वही कर रही थी। आर्थिक तंगी बढ़ती गई और घर का पूरा बोझ पूनम पर आ गया। दिनभर थकान, काम, चिड़चिडाहट—और उसी का असर सास पर भी दिखने लगा।
कमला देवी बीमार होती चली गईं, और अब पिछले तीन दिनों से तो वो बिस्तर से भी मुश्किल से उठ पाती थीं।
शाम को रवि का भाई—रोहित आया...
ये सब रोहित को ज़्यादा पता नहीं था। वो तो दूसरी सिटी में नौकरी करता था। उस दिन छुट्टी लेकर अचानक मम्मी से मिलने आ गया।
घर आया, सबको नमस्ते किया, फिर सीधा माँ के कमरे में गया।
कमरा देखा… और दंग रह गया।
कोनों में धूल, बिस्तर उलझा हुआ, डिस्पोज़ल का ढेर, कपड़ों की गंदी गठरी…
और माँ—कमज़ोर, थकी, गंदे कपड़ों में लेटी हुई।
उसका दिल कसकर भर आया।
“मम्मा…”
उसकी आवाज़ काँप गई।
कमला देवी धीरे से उठ बैठीं—
“रोहित बेटा… तू आया? अच्छा हुआ… बहुत थक गई थी, तुझे देखने का मन करता था…”
रोहित ने उनका हाथ पकड़ा—
“मम्मा, ये क्या हाल बना रखा है अपना? कपड़े इतने गंदे क्यों?”
कमला देवी ने धीमे से कहा—
“बेटा… हाथ में बहुत दर्द रहता है। कपड़े धोने को पूनम ने मना कर दिया। कहती है कि उसे और बच्चों को इंफेक्शन हो जाएगा…”
बस, रोहित की आँखें भर आईं… पर वो चुप रहा।
अगली सुबह—घर में हलचल...
सूरज भी ठीक से नहीं निकला था कि रोहित उठकर सीधे मम्मी के कमरे में गया।
जाड़ू-पोंछा, सफ़ाई, सब कुछ खुद करने लगा।
कमला देवी घबरा गईं—
“अरे बेटा, क्या कर रहा है? छोड़ दे, रहने दे!”
“नहीं मम्मा। ये मेरा घर है, मेरा फ़र्ज़ है।”
उनके गंदे कपड़े उठाकर हल्के हाथों से अलग रख दिए, कमरे की खुशबू बदल दी, सब चीज़ें करीने से रख दीं।
जब पूनम उठकर बाहर आई तो उसने देखा—
रोहित आँगन में मम्मी के कपड़े धोकर सुखा रहा था।
वो घबरा गई—
“रोहित! तुम क्या कर रहे हो? अगर तुम्हें भी कुछ हो गया तो? मम्मी जी बीमार रहती हैं ना!”
रोहित ने कपड़ा फैलाते हुए बिना पलटे कहा—
“अगर मम्मी को छूने से इंफेक्शन होता है ना भाभी—तो याद रखना, तुम्हें भी एक दिन बुज़ुर्ग होना है। उस दिन तुम्हारी बहू भी यही बोलेगी—‘दूर रहो, तुम्हारा बुढ़ापा हमें न लग जाए।’
लेकिन उम्मीद है, तुम्हारा बेटा—आयुष—मुझसे ये सीखेगा कि माँ की सेवा डरकर नहीं, दिल से की जाती है।”
पूनम के हाथ से प्लेट लगभग गिरते-गिरते बची।
रोहित आगे बोला—
“तुम्हारी मुश्किलें मैं समझता हूँ। नौकरी, घर, बच्चे, सब तुम अकेले संभाल रही हो।
पर इसका मतलब ये नहीं कि माँ को कोने में छोड़ दिया जाए।
माँ घर का बोझ नहीं होतीं…
माँ तो वो दीवार होती हैं, जिस पर घर टिका होता है।”
ये सुनकर पूनम की आँखें भर आईं।
वो चुपचाप कमरे में गई, कमला देवी के पास बैठकर उनका हाथ पकड़ा और बोली—
“मम्मी… मुझे माफ कर दीजिए। मैं बहुत गलत हो गई थी। आपको डर की वजह से दूर रख दिया… पर दुख कितना दिया, ये सोचा ही नहीं…”
कमला देवी ने मुस्कराकर उसका हाथ थपथपा दिया—
“बेटा, माँ को मन से दूर मत किया करो। बीमार मैं नहीं, अकेली मैं पड़ गई थी।”
उस दिन से घर फिर से बदल गया।
पूनम ने सफाई की, कपड़े धोए, मम्मी के कमरे में बैठी, बच्चों को उनसे मिलने दिया।
और रोहित ने जाते-जाते कहा—
“घर तब ही चलता है, जब सब मिलकर चलें। दुख में तो और भी मिलकर रहना चाहिए।”
कमला देवी ने पहली बार कई दिनों बाद शांति से साँस ली।

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