बाबूजी का कमरा

 

An emotional close-up of an elderly Indian father with teary eyes, silently listening to his family’s taunts in a small home. Detailed facial expression showing pain, loneliness, and sadness.


रामकिशोर बाबू ने अपने कमरे के कोने में खड़े-खड़े चारों ओर देखा—एक लोहे का बक्सा, दो पुराने सूटकेस, एक अलमारी, और दीवार पर टँगा हुआ कैलेंडर, जिस पर कुछ तारीखों पर लाल पेन से निशान लगा था।

आज उनका आख़िरी दिन था इस सरकारी कार्यालय में। चालीस साल की नौकरी पूरी कर चुके थे। जिन्हें कभी वह बच्चों सा दुलारते थे, वही आज उनके विदाई समारोह में झेंपते हुए मिठाई खिला रहे थे।


घर जाने की खुशी चेहरे पर थी, पर अंदर कहीं एक हल्का-सा खालीपन भी… जैसे कोई सालों पुराना अध्याय बंद हो रहा हो।


कार्यालय से निकलते ही उनके चपरासी लक्ष्मण ने पूछा—

“बाबूजी, ये छोटा सा पैकेट मेरी घरवाली ने भेजा है। कह रही थी—‘रामकिशोर बाबू को मीठा बहुत पसंद है, ज़रा अपने हाथ के लड्डू भेज दूँ।’


पैकेट खोलते ही गरमा-गरम बेसन के लड्डुओं की खुशबू उठी।

रामकिशोर बाबू की आँखें चमक उठीं—

“अरे वाह लक्ष्मण! तेरी घरवाली ने तो अपनापन रख लिया!”


लक्ष्मण ने आँखें झुका लीं—

“अब आप जा रहे हैं बाबूजी… कौन पूछेगा हम गरीबों को…”


रामकिशोर बाबू की आँखें भीग गईं।

“लक्ष्मण, ज़रूरत हो तो चिट्ठी लिख देना। मैं हूँ न।”


रिक्शा मुड़ा और वह अपने घर की ओर निकल पड़े।



घर पहुँचने की खुशी — और पहला झटका...


घर पहुँचे तो अंदर से ठहाकों की आवाज़ें आ रही थीं।

उनके तीनों बच्चे—सुमन, रमेश और मोना—हँसते हुए बातें कर रहे थे। बहू उन्मुक्त हँसी हँस रही थी।

रामकिशोर बाबू ने जैसे ही खाँसकर आवाज़ दी, सब अचानक चुप हो गए।

बहू ने जल्दी से आँचल ठीक किया, रमेश ने मोबाइल नीचे रख दिया, और मोना सिमटकर बैठ गई।


रामकिशोर बाबू के मन में हल्की-सी बेचैनी उठी—

“मेरे आने से ऐसा क्या बदल गया…?”


उन्होंने सुमन से कहा—

“चाय पिलाएगी बिटिया?”


सुमन ने हड़बड़ा कर कहा—

“अभी अम्मा पूजा में हैं। थोड़ा रुको बाबूजी।”

फिर वह फुर्र से उठकर रसोई में चली गई।


चाय फीकी थी।

उन्होंने प्याला रखते हुए कहा—

“चीनी कम है।”

सुमन ने घबराकर कहा—

“अभी डालती हूँ बाबूजी।”

“रहने दो। तुम्हारी अम्मा बना देंगी।”

उन्होंने कहा। और चुप हो गए।



पत्नी से पहला सामना.. 


पत्नी पूजा कर हाथ धोकर आईं और बोलीं—

“अरे, आप अकेले बैठें हैं! बच्चे कहाँ हैं?”


“अपने-अपने काम में।”

रामकिशोर बाबू बोले—

और इस एक शब्द ने उनके अंदर कुछ कचोट दिया।


पत्नी ने रसोई देखकर नाक-भौं चढ़ाई—

“सारा घर जूठे बर्तनों से भरा है। कोई हाथ भी नहीं बँटाता। सब हमें ही करना है।”


पति ने संभलकर पूछा—

“बहू क्या करती है?”


“करती क्या है? जैसे-तैसे दिन काटती है। सुमन को कॉलेज जाना होता है। बाकी सब? भगवान भरोसे।”


रामकिशोर बाबू चुप रहे।



कमरे का सच...


घर छोटा था।

तीन कमरे थे—एक अमर और बहू का, दूसरा सुमन और मोना का, तीसरा छोटा-सा स्टोर, और बैठक।


बैठक में ही लकड़ी की दो कुर्सियाँ, टीवी और बच्चों का सामान फैला था।

रामकिशोर बाबू के लिए जगह? बस एक पतली चारपाई…

दीवार से सटी हुई… बिल्कुल मेहमान जैसा इंतज़ाम।


उनका मन जैसे बैठ गया।

सोचा था—

अब तो बच्चों के साथ रहूँगा, हँसी-खुशी का समय आएगा।

पर माहौल कुछ और ही था—

अंदर की दुनिया उनकी कल्पना से बहुत अलग।



शाम का आदेश—और नाराज़गी...


अपनी आदत से मजबूर, उन्होंने घर में थोड़ी व्यवस्था बनाने की सोची।

सुमन बाहर जाने लगी, तो बोले—


“रुक। आज से शाम का खाना तुम बनाओगी। सुबह का बहू।”


सुमन ने ठुनककर कहा—

“बाबूजी! पढ़ाई भी करनी होती है!”


उन्होंने समझाया—

“तुम्हारी माँ बूढ़ी हो रही है। दो लोग मिलकर काम करेंगे तो आसानी होगी।”


पर सुमन चुपचाप नाक चढ़ाकर चली गई।

बहू अंदर चली गई।

पत्नी ने कहा—

“बहू कोई काम करती है तो थक जाती है। सुमन को शीला के घर जाने से ही फुरसत नहीं।”


रामकिशोर बाबू बोले कुछ नहीं।



धीरे-धीरे बदलता माहौल...


खाना इतना बेस्वाद था कि रमेश ने थाली सरकाकर कहा—

“मैं नहीं खाऊँगा ये!”


बहन बोली—

“तो मत खा! क्या मेरे लिए बना रही हूँ?”


पत्नी ने रमेश को मनाकर अलग से खाना बनाया।

रामकिशोर बाबू यह सब देखते रहे… चुपचाप।


अगली शाम

सुमन पड़ोस जाने लगी तो उन्होंने रोका—

“अंदर जाकर पढ़ाई करो।”


सुमन रोठकर कमरे में चली गई और कई दिन उनसे बोली नहीं।


पत्नी शिकायत कर बैठीं—

“आप कुछ भी कह देते हैं। बच्चा है न, मुँह फुलाए बैठी है।”


धीरे-धीरे घर के माहौल में उनकी जगह और भी छोटी होने लगी।

जैसे वह सदस्य नहीं, केवल साया हों।



सबसे बड़ा आघात—बैठक से बेदखली..


एक दिन सुबह घूमकर लौटे तो देखा—

बैठक में उनकी चारपाई गायब।


पूछने गए तो पत्नी की कोठरी में छोटी-सी जगह घेरकर उनकी चारपाई लगा दी गई थी—

चारों तरफ़ अचार के मर्तबान, कनस्तर, बोरी और पुराने डिब्बे रखे थे। ऊपर अलगनी पर कपड़े लटके हुए थे, मानो कमरा स्टोररूम बन गया हो।


उन्होंने बिना बोले कोट खिसकाकर टाँग दिया।

कोई पूछने नहीं आया—

क्या चाहिए?

कैसे सोए?

ठीक हैं या नहीं?


उनका मन भारी हो गया।

याद आया—

सरकारी क्वार्टर कितना खुला… कितना अपना था…

और यहाँ?

अपने ही घर में मेहमान की तरह।



पत्नी शिकायत कर रही थीं—

“नौकर कामचोर है। बहुत खाता है।”


रामकिशोर बाबू ने कहा—

“छुड़ा दो। काम इतना भी नहीं कि नौकर रखें।”


उन्होंने नौकर का हिसाब कर दिया।

बस इस एक फैसले ने पूरे घर में हलचल मचा दी।


अंदर से आवाज़ें आईं—

रमेश—

“अबगेहूँ पिसाने मैं जाऊँगा क्या?”


सुमन—

“मैं कॉलेज जाऊँ or झाड़ू लगाऊँ?”


अमर—

“बाबूजी बूढ़े हो गए हैं… हर चीज़ में टांग अड़ाते हैं।”


बहू—

“बैठे-बैठे बस आदेश देते हैं…”


सब एक साथ जैसे उनके खिलाफ हो गए।


रामकिशोर बाबू चुपचाप अंधेरे में लेटे रहे।

कोई नहीं जान पाया कि वह सुन रहे हैं।



मुश्किल फैसला—फिर से नौकरी...


अगली सुबह वह एक चिट्ठी हाथ में लेकर पत्नी के पास आए।

“सेठ की चीनी मिल में नौकरी मिल गई है।

सोचा था आराम करूँगा, पर… घर में पैसे आएँगे तो ठीक रहेगा।”


पत्नी तुरंत बोलीं—

“मैं नहीं जा सकती। यहाँ इतनी बड़ी गृहस्थी… सयानी लड़की…”


शब्द पूरा होने से पहले ही वह बोल पड़े—

“ठीक है। तुम मत चलो।”


और चुप हो गए।



परसों सुबह उनका बिस्तर बँधा।

एक छोटा बक्सा, एक डलिया जिसमें घर की बची मठरियाँ रख दी गईं।


नरेंद्र ने रिक्शा रोका।

बाबूजी बैठे।

एक बार परिवार की ओर देखा—

सब खड़े थे, पर सबकी आँखों में जल्दी लौटने की हड़बड़ाहट झलक रही थी, अपनापन नहीं।


रिक्शा चल पड़ा।

रामकिशोर बाबू ने धीरे से मुँह मोड़ लिया।


पीछे से बहू ने कहा—

“अमर, सिनेमा

 चलोगे आज?”


सुमन हँसकर बोली—

“भइया, हम भी चलेंगे!”


पत्नी चौके में चली गईं और बोलीं—

“अरे नरेंद्र, बाबूजी की चारपाई निकाल दे कमरे से। चलने को जगह नहीं बची।”


कमरा खाली हो गया…

लेकिन रामकिशोर बाबू के दिल में जो खालीपन रह गया था, वह फिर कभी नहीं भर पाया।

सीख:

जब अपने ही घर में बुज़ुर्गों को सम्मान और स्थान नहीं मिलता, तब टूटता केवल उनका मन नहीं—टूट जाती है पूरी पारिवारिक संस्कृति, क्योंकि परिवार वहीं पनपता है जहाँ बड़े बोझ नहीं, बल्कि अपनापन और आधार समझे जाते हैं।



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