काग़ज़ों से आगे का न्याय

 

An emotional Indian mother holding her young daughter near a sunlit window, expressing strength, care, and a hopeful new beginning in a quiet home setting.


एडवोकेट वर्मा ने अपनी स्कूटी अदालत के सामने रोकी।

पीछे बैठी नीरा चुपचाप उतर गई।

धन्यवाद कहने के लिए उसके होंठ हिले ही थे कि वर्मा साहब गंभीर स्वर में बोले—


“देखो बेटी, भावुक मत बनना।

जिस आदमी ने तुम्हें और तुम्हारी बच्ची को बीच रास्ते छोड़ दिया,

उसे क़ानून की पूरी सज़ा मिलनी चाहिए।

न्याय सिर्फ़ माफ़ कर देने से नहीं होता।”


नीरा ने कुछ नहीं कहा।

सिर्फ़ सिर झुकाया और सीढ़ियाँ चढ़ने लगी।


आज उसे हर सीढ़ी भारी लग रही थी,

पर मन किसी अजीब हल्केपन से भरा था।

जैसे किसी लंबे, घुटन भरे कमरे से बाहर निकल आई हो।


घर पहुँचते ही वह सीधे अपने कमरे में चली गई।


आँगन में उसकी माँ सरोज तुलसी के पास दीपक जला रही थीं।

पास ही पाँच साल की गुंजन अपने खिलौनों से अस्पताल बना रही थी।


नीरा बिना कुछ बोले कमरे में जाते देख गुंजन बोली— “नानी, मम्मी आज भी मेरे डॉक्टर वाले खिलौने नहीं लाई।

ज़रूर भूल गई होंगी।

आज भी ऑपरेशन कैंसिल!”


सरोज हल्की मुस्कान के साथ बोलीं— “अरे आ जाएगी बिटिया, मम्मी आज थकी होंगी।”


नीरा बिस्तर पर बैठ गई।

आँखें बंद कीं तो अदालत, जज, वकील,

और अमित का चेहरा घूमने लगा।


अमित…

जिसने कहा था—


“नीरा, अलग होना है तो हो जाओ,

पर बच्ची मेरे पास रहेगी।

तुम अकेली औरत क्या कर लोगी?

हर खर्च कैसे उठाओगी?”


तभी माँ कमरे में आईं।


“क्या हुआ बेटी?

फ़ैसला हो गया?”


नीरा ने धीरे से कहा— “हाँ माँ… गुंजन मेरे पास रहेगी।

काग़ज़ों में मैं जीत गई…

पर मन में कुछ अटका हुआ है।”


माँ समझ गईं।

उन्होंने कुछ नहीं पूछा।


शाम को वर्मा साहब आए।


“नीरा, अदालत ने तुम्हारे और बच्ची के लिए मासिक भरण-पोषण तय कर दिया है।

अमित को हर महीने पैसा देना होगा।”


नीरा चुप रही।


“तुम खुश नहीं हो?”

वर्मा साहब ने पूछा।


नीरा ने पहली बार साफ़ कहा— “मैं पैसे नहीं चाहती,

पर मैं यह भी नहीं चाहती कि वह आसानी से छूट जाए।”


वर्मा साहब चौंके— “तो तुम चाहती क्या हो?”


नीरा बोली— “मैं चाहती हूँ कि वह हर महीने अदालत आए।

सबके सामने पैसा दे।

ताकि उसे याद रहे—

ज़िम्मेदारी काग़ज़ पर खत्म नहीं होती।”


वर्मा साहब मुस्कराए— “ठीक है। यही होगा।”


अदालत में पहला दिन था।


अमित ने चेक बढ़ाया।

नीरा ने उसे लिया…

और सबके सामने फाड़ दिया।


अदालत में सन्नाटा छा गया।


जज ने पूछा— “ये क्या कर रही हैं आप?”


नीरा शांत स्वर में बोली— “माननीय न्यायाधीश,

यह मेरा अधिकार है।

पर मेरा आत्मसम्मान इससे नहीं खरीदा जा सकता।”


अमित का चेहरा लाल पड़ गया।

वह अपमान से भर उठा।


हर महीने यही हुआ।


अमित टूटने लगा।

उसका अहंकार,

उसकी ‘मैं’—

सब चूर होने लगा।


आख़िर उसने आवेदन दिया— “मुझे मनीऑर्डर से पैसा भेजने की अनुमति दी जाए।”


जज ने नीरा से पूछा— “पता बताइए।”


नीरा बोली— “शहर का महिला आश्रय गृह।”


पूरा कोर्ट सन्न रह गया।


नीरा ने कहा— “यह पैसा उन औरतों के लिए हो

जो आज भी किसी अमित के डर में जी रही हैं।

ताकि उसे हर महीने यह याद रहे—

उसकी ज़िम्मेदारी सिर्फ़ मुझ तक नहीं,

पूरे समाज तक है।”


अदालत ने अनुमति दे दी।


नीरा बाहर निकली।

धूप तेज़ थी,

पर आज वह जल नहीं रही थी।


घर लौटकर उसने गुंजन को गोद में उठाया।


“मम्मी, आज ऑपरेशन होगा?”

गुंजन ने पूछा।


नीरा मुस्कराई— “हाँ बेटा…

आज ज़िंदगी का ऑपरेशन पूरा हो गया।”


माँ दूर से देख रही थीं।

उनकी आँखों में आँसू थे—

पर इस बार गर्व के।



सीख :

न्याय सिर्फ़ पैसा पाना नहीं,

गलत को उसका बोझ महसूस कराना भी है।

औरत जब खड़ी होती है,

तो सिर्फ़ अपने लिए नहीं—

कई औरतों के लिए रास्ता बनाती है।



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