अधूरा सवाल
“मैडम, चाय रख दूँ?”
संगीता ने आवाज़ लगाई तो मैं जैसे विचारों के भँवर से बाहर आई।
“हाँ… रख दो,” मैंने धीमे से कहा।
सुबह से मन अजीब-सा भारी था। न कोई स्पष्ट कारण, न कोई बड़ी परेशानी—बस एक अनजाना बोझ। मैं बालकनी में कुर्सी खींचकर बैठ गई। सामने सड़क पर रोज़ की तरह लोग आ-जा रहे थे, पर मुझे सब कुछ धुँधला लग रहा था।
संगीता चाय रखकर चली गई। कुछ ही देर में मेरा मोबाइल वाइब्रेट हुआ। स्कूल के व्हाट्सएप ग्रुप में मैसेज आया था—
“आज स्कूल बंद रहेगा। कारण: शोक।”
मैंने तुरंत नीचे स्क्रॉल किया।
नाम पढ़ते ही हाथ काँप गए।
“कक्षा 11 का छात्र — आर्यन वर्मा — अब हमारे बीच नहीं रहा।”
एक पल के लिए साँस जैसे अटक गई। मोबाइल हाथ से छूटते-छूटते बचा।
आर्यन…
वही लड़का, जो पिछले छह महीनों से मेरी कक्षा में सबसे आगे बैठता था।
मैं इस स्कूल में एक साल पहले ही आई थी। नया शहर, नया माहौल, नए चेहरे।
शुरुआत में सब कुछ ठीक था। बच्चे अनुशासित थे, पढ़ाई में रुचि दिखाते थे। मैं भी पूरी मेहनत से पढ़ाती थी—सिर्फ़ किताबें नहीं, जीवन के छोटे-छोटे उदाहरण भी समझाती।
आर्यन शुरू से ही अलग था।
न ज़्यादा बोलता, न हँसी-मज़ाक करता।
पर उसकी आँखों में हमेशा सवाल होते थे।
वह अक्सर क्लास के बाद रुक जाता।
“मैडम, ये हिस्सा थोड़ा और समझा दीजिए।”
मैं समझा देती।
धीरे-धीरे यह आदत बन गई।
कभी-कभी वह लाइब्रेरी में भी मुझसे मिल जाता।
“मैडम, क्या मैं गलत हूँ अगर ऐसा सोचूँ?”
उसके सवाल पढ़ाई से आगे निकल जाते थे।
मैंने कई बार सोचा—
शायद घर में कोई परेशानी है।
पर मैंने कभी ज़्यादा टोकना ठीक नहीं समझा।
एक दिन स्टाफ रूम में मेरी सहकर्मी ने कहा,
“आप आर्यन पर कुछ ज़्यादा ध्यान देती हैं।”
मैं चौंक गई।
“वो पढ़ने में अच्छा है, बस इसलिए।”
उन्होंने हल्की मुस्कान के साथ बात बदल दी,
पर उस दिन के बाद मैं थोड़ा सतर्क हो गई।
मैंने आर्यन से दूरी बना ली।
उसके सवालों के जवाब छोटे हो गए।
क्लास के बाद रुकने से मना करने लगी।
उसने पूछा भी—
“मैडम, क्या मैंने कुछ गलत किया?”
मैंने कहा,
“नहीं, पर अब तुम्हें खुद समझने की कोशिश करनी चाहिए।”
उसकी आँखों में कुछ टूटता हुआ-सा लगा,
पर मैंने ध्यान नहीं दिया।
एक दिन वह मेरे केबिन के बाहर खड़ा मिला।
“मैडम, दो मिनट बात करनी थी।”
मेरे पास समय नहीं था।
“कल बात करेंगे,” कहकर मैं निकल गई।
वह वहीं खड़ा रह गया।
अगले दिन वह स्कूल नहीं आया।
उसके बाद भी नहीं।
और आज…
यह ख़बर।
शाम को मैं स्कूल पहुँची।
प्रिंसिपल ऑफिस के बाहर आर्यन की माँ बैठी थीं—पत्थर-सी शांत।
उनकी आँखें सूखी थीं,
शायद रो-रोकर आँसू भी थक गए थे।
उन्होंने मुझे देखा।
धीमे से बोलीं,
“मैडम, आर्यन आपकी बहुत इज़्ज़त करता था।”
मेरे गले में कुछ अटक गया।
उन्होंने बैग से एक डायरी निकाली।
“ये उसने छोड़ी है। शायद आप पढ़ लें।”
मैंने काँपते हाथों से डायरी ली।
अंदर लिखा था—
“मैडम मुझे पसंद करती हैं या नहीं, ये ज़रूरी नहीं।
पर जब मैं बात करता था, तो मुझे लगता था कोई मुझे समझ रहा है।
अब ऐसा नहीं लगता।
शायद गलती मेरी ही है।”
आगे आख़िरी पंक्तियाँ—
“मैं कुछ गलत नहीं कहना चाहता था।
बस पूछना चाहता था—
क्या मैं इतना बुरा हूँ कि कोई मेरी बात भी न सुने?”
डायरी मेरे हाथ से गिर गई।
आँखों के सामने अँधेरा छा गया।
मैं सोचती रही—
अगर उस दिन मैं रुक जाती…
अगर मैंने सुना होता…
अगर मैंने सिर्फ़ “बोलो” कहा होता…
शायद आज अख़बार में यह ख़बर न होती।
रात भर नींद नहीं आई।
एक ही सवाल मन में घूमता रहा—
क्या हम बच्चों को केवल पढ़ा रहे हैं,
या सच में उनकी बात भी सुन पा रहे हैं?
आज की पीढ़ी भटकी हुई नहीं है—
बस अनसुनी है।
उसे डाँट नहीं,
दिशा चाहिए।
शायद किसी महापुरुष की नहीं,
बस एक संवेदनशील इंसान की ज़रूरत है—
जो समय पर “मैं सुन रहा हूँ” कह सके।
काश…
मैं वह इंसान बन पाती।
सिख:
कुछ सवाल किताबों के नहीं होते,
कुछ उत्तर शब्दों से नहीं मिलते।
कभी-कभी किसी को बचाने के लिए
सिर्फ़ इतना कहना काफ़ी होता है—
“मैं सुन रहा हूँ।”

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