स्वाद की छोटी-सी आज़ादी
नीरा सुबह से ही भागदौड़ में लगी थी। रोहन और बच्चे—मयंक व नायरा—औफिस और स्कूल के लिए निकल चुके थे। घर अचानक शांत हो गया तो नीरा चाय लेकर बालकनी में बैठ गई। मोबाइल स्क्रॉल करते-करते उसकी नज़र एक नई ओट्स-चीला पिज्जा रेसिपी पर रुक गई। फोटो देख ही उसके मन में खलबली-सी मच गई—वाह, ये तो मज़ेदार है!
सामग्री चेक की—सब घर में मौजूद। नीरा मुस्कुरा पड़ी।
उसे नई-नई चीजें बनाना बेहद पसंद था। खाना उसका स्ट्रेस-बस्टर था। वैसे वो खुद भी फिटनेस का ध्यान रखती थी—सुबह की वॉक, योगा और हल्का वर्कआउट।
ना कोई शारीरिक परेशानी, ना कोई बीमारी।
बस एक दिल की ख्वाहिश—कभी-कभी कुछ टेस्टी खाने की।
पर घर में पिछले कुछ महीनों से “सादे खाने का अभियान” सा चल पड़ा था।
रोहन को अचानक लगा था कि अब उम्र थोड़ी बढ़ रही है, इसलिए कैलोरीज, कार्ब्स, फैट—सब पर ध्यान रखना जरूरी है।
बच्चे भी पापा की हाँ में हाँ मिलाने लगे थे। स्कूल-कॉलेज में चिप्स-पास्ता खाते थे, पर घर आते ही ज्ञान देना शुरू—“मम्मा, घर में हेल्दी खाना ही बनना चाहिए…”
नीरा को हंसी भी आती और गुस्सा भी।
“अरे भाई, हेल्दी कौन नहीं खाना चाहता, पर कभी-कभी खा लेने से कौन-सा पहाड़ टूट जाएगा?”
पर नहीं…
सभी की एक ही रट—
“मम्मा, कम तेल!
मम्मा, फ्राइड नहीं!
मम्मा, सादा बनाओ…”
और मज़ेदार बात?
औफिस में सब कुछ खाकर आते थे।
रोहन कभी पावभाजी तो कभी मंचूरियन।
बच्चे कैंटीन में पिज्जा-पास्ता।
और घर में—खिचड़ी मोड!!
नीरा के मन में जलन-सी उठती—
“मैं भी तो इंसान हूँ… मैं भी तो चाहती हूँ कुछ अलग खाऊँ…”
कभी जब वीकेंड पर बाहर जाते, वो कितनी उम्मीद से मेन्यू कार्ड खोलती।
उसकी आँखें मलाई कोफ्ता, दाल मखनी, पनीर टिक्का पर टिकती रहतीं।
पर रोहन तुरंत बोलते—
“नहीं नहीं, बस सूप और सलाद ले लेते हैं। बाहर का खाना बहुत हैवी होता है।”
सूप ठीक था, लेकिन
सलाद??
वो भी बाहर खाने आए हों तो?
नीरा का दिल वहीं बैठ जाता।
बच्चों को भी जब अपने पापा की आदत लग गई, तो वो भी कहते—
“मम्मा, प्लीज, आज हैवी मत खाना।”
अरे, हैवी मैं नहीं… मेरा मन हो रहा है!!
एक दिन तो हद हो गई।
नीरा ने छोले भिगोए, सोचा—दो-चार भटूरे ही बना लेगी।
घर में साल भर हो गया था भटूरे बनाए।
पर जैसे ही छोले कटोरे में दिखे, तीनों की आवाज़ें—
“मम्मा, भटूरे मत बनाना प्लीज!”
“बहुत ऑयली होता है।”
“रोटी ही बना देना।”
नीरा का मन हुआ भिगोए छोले उसी के सिर पर पलट दे जिसने सबसे पहले मना किया था!
“घर में भी लोग सादा खाना ही क्यों खाएँ? कभी तो कुछ बन सकता है न!”
उसका मन दुख से भर गया।
उस दिन नीरा ने फैसला किया—
अगर घर में सब सादा खाएँगे तो ठीक है, मैं अपने लिए कभी-कभी कुछ टेस्टी खाऊँगी। भले बाहर से मंगाकर।
पाँच दिन बाद…
शनिवार को नीरा को फिर वही ओट्स-चीला पिज़्ज़ा वाला पोस्ट याद आ गया।
वह रसोई में कूद पड़ी।
सबसे पहले उसने ओट्स बैटर बनाया, फिर उसे पैन में फैला कर क्रिस्प किया।
ऊपर से सब्जियाँ, चीज़ और इटैलियन हर्ब्स डाले।
ओवन में रखते ही खुशबू ने पूरा घर महका दिया।
मन हुआ—“बस एक स्लाइस खा लूँ…”
पर उसने इंतजार किया कि सब आएँ और साथ खाएँ।
रोहन, मयंक, नायरा आए—टेबल पर नज़र गई, और सबका चेहरा एक जैसा!
“मम्मा! चीज़?”
“मम्मा… पिज्जा? ये क्या?”
“मम्मा, सैचुरेटेड फैट होता है इसमें!”
नीरा के भीतर जैसे कोई तंत्रिका फट गई, पर उसने कुछ कहा नहीं।
बस शांत स्वर में बोली—
“ये ओट्स बेस्ड है, बेक्ड है, चीज़ भी मॉडरेट है। ट्राय करो…”
तीनों एक-दूसरे को देखने लगे।
मयंक ने कहा, “मैं सिर्फ सलाद खाऊँगा।”
नायरा बोली, “मम्मा, आज कैंटीन में चीज़ सैंडविच खा लिया था, मैं नहीं खा सकती।”
रोहन बोला, “मैं भी हल्का खाऊँगा, बस।"
नीरा ने धीरे से मुस्कुराया—एकदम मजबूर-सी मुस्कान।
सब सलाद खाते रहे।
नीरा गरमा-गरम ओट्स-पिज़्ज़ा खाती रही—शांति से, धीरे-धीरे, हर बाइट का स्वाद लेते हुए।
पहले कौर ने ही उसकी आँखें नम कर दीं।
“वाह… मैं सच में भूल गई थी कि स्वाद कैसा लगता है…”
वो जितनी देर खाती रही, आनंद में खोई रही।
उसे घरवालों के कमेंट्स की परवाह ही नहीं रही।
उस रात उसने फैसला किया…
अब मैं सबके अनुसार खाना बनाऊँगी—
पर अपने मन का खाना खुद भी खाऊँगी।
कभी पास्ता, कभी नूडल्स, कभी टिक्की—
जो मन करे, मँगवा लूँगी।
किसी के मूड के हिसाब से अपनी जीभ को क्यों रोकूँ?
और वही उसने किया।
महीने में एक-दो बार, सबके सादा खाने के बीच, नीरा चुपचाप अपना पसंदीदा खाना मँगवा लेती।
कभी-पिज्जा, कभी पनीर टिक्का, कभी चाट।
सब घर वाले खुश रहे कि घर में “हेल्दी मिशन” चल रहा है,
और नीरा खुश रही—क्योंकि उसे स्वाद की अपनी छोटी-सी आज़ादी मिल गई थी।
अब वह मैदा, तेल, नमक का लेक्चर सुनकर हँस देती।
कभी उन्हें ढोंगी समझकर मुस्कुरा देती…
कभी प्रेम से देखती—
“ठीक है, तुम लोग खुद को बहुत हेल्दी समझ लो… मुझे तो पता है तुम बाहर क्या खाते हो।”
पर अब मन में कोई शिकायत नहीं थी।
क्योंकि उसने समझ लिया था—
खाना सिर्फ पेट भरने के लिए नहीं,
कभी-कभी मन भरने के लिए भी होता है।

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