बाबू जी का नया ठिकाना
“अरे भट्ट साहब… ये क्या सुन रहा हूँ! सब कुछ बेच बेचाकर लखनऊ छोड़कर पुणे जा रहे हो? वो भी इस उम्र में?”
मिश्रा जी ने अपनी पुरानी कुर्सी से उठते हुए कहा, “आप भी नादानी में कोई कसर नहीं छोड़ते।”
भट्ट साहब हँस दिए, “मिश्रा… आदमी बूढ़ा हो जाए, पर दिल तो बच्चों के पास ही लगता है। अब ये जो बची-खुची उम्र है, वो अपने बेटे-बहू और दो मासूम पोतियों के साथ बिताना चाहता हूँ।”
“ये सब बातें किताबों में अच्छी लगती हैं,” मिश्रा जी ने चश्मा ठीक करते हुए कहा,
“देखो, बच्चे बड़े हो जाते हैं, उनकी दुनिया अलग हो जाती है। तुम सपने लेकर जा रहे हो, लेकिन टूटते देखना मत। ये ‘बुजुर्गों को सम्मान’ वाली बातें अब बस टीवी के विज्ञापन में ठीक लगती हैं।”
भट्ट साहब के चेहरे पर एक क्षण को छाया उतर आई, लेकिन फिर मुस्कुरा कर बोले,
“मुझे अपने राघव पर भरोसा है। नौकरी लगने के बाद उसी ने कहा था— ‘पापा, मेरी हर सफलता के पीछे आपका त्याग है। आप और माँ मेरे साथ नहीं रहेंगे तो ये ऊँचा फ्लैट भी छोटा लगेगा।’
ऐसा लड़का माता-पिता को कैसे भूल सकता है?”
“तो ठीक है,” मिश्रा जी ने हाथ झटकते हुए कहा,
“मुझसे रोना मत… जब वापस लौटोगे किराए का मकान ढूँढते हुए। तुम्हारे जैसे दो-चार मैंने देखे हैं।”
भट्ट साहब ने बस इतना कहा,
“अगर मेरे संस्कार सच्चे हैं… तो मेरा बेटा मुझे कभी शर्मिंदा नहीं करेगा।”
और वह अपनी पत्नी सुशीला के साथ पुणे के लिए निकल पड़े।
पुणे में नई शुरुआत...
एक साल बीत गया।
राघव और उसकी पत्नी नंदिनी दोनों मल्टीनेशनल कंपनियों में ऊँची पोस्ट पर थे।
सुशीला और भट्ट साहब अपने पोतियों— आरोही और श्रेया—के साथ हँसते-खेलते दिन बिताते।
कभी स्कूल छोड़ना, कभी कहानी सुनाना, और शाम को छत पर बैठकर पुराने गीत गाना—
उन्हें लगता जैसे जिंदगी की थकान उतर रही है।
एक दिन…
“पापा! एक बड़ी खबर है!”
राघव ने ऑफिस से लौटते ही कहा।
“क्या हुआ बेटा?” भट्ट साहब ने चाय रखते हुए पूछा।
“मुझे कंपनी की तरफ से दो महीने के लिए सिंगापुर भेजा जा रहा है! बहुत बड़ा प्रोजेक्ट है… कंसिडर किया जाना ही सम्मान है।”
भट्ट साहब की आँखें चमक उठीं।
“अरे वाह! हमारा बेटा विदेश जाएगा… ये तो गर्व की बात है। जा बेटा, हम सब हैं यहाँ।”
राघव चला गया।
नंदिनी पूरी जिम्मेदारी से घर संभालती रही।
समय यूँ ही बहता रहा।
दो महीने बाद… फोन
“पापा, याद है बचपन में सामने वाले मेले में एक छोटा सा हवाई झूला लगा था?”
फोन पर राघव की आवाज़ में नमी थी।
“हाँ बेटा… खूब रोया था तू। बैठना था उस झूले में,” भट्ट साहब हँस पड़े।
“हँसी तो अब आती है पापा…
तब तो मैं सोचता था आपने मेरे साथ क्यों नहीं बैठा।
बाद में समझ आया कि आपके लिए उस समय पाँच रुपये भी बड़ा खर्च था…
और फिर भी आपने मुझे झुला तो दिलाया।”
भट्ट साहब चुप रह गए।
“पापा…”
राघव ने गहरी साँस लेते हुए कहा,
“मैं सच का हवाई जहाज आपके साथ चढ़ना चाहता हूँ।
इस बार आपकी कमी नहीं रहने दूँगा।
आप, माँ, नंदिनी और बच्चियाँ—सबके टिकट मैं करवा रहा हूँ।
पापा… आप बस सिंगापुर आ जाइए।
वापसी का सफर इस बार हम सब साथ में करेंगे।”
भट्ट साहब के आँसू टपक पड़े।
उन्होंने फोन नंदिनी को पकड़ाया और मंदिर की ओर चल दिए।
सिंगापुर की रोशनी में एक सुबह...
अगले महीने पूरा परिवार सिंगापुर पहुँच गया।
रात भर थके हुए थे।
सुबह-सुबह बालकनी में खड़े होकर भट्ट साहब आसमान में उठती रोशनी देख रहे थे।
उन्होंने मोबाइल निकाला।
“मिश्रा, कैसे हो?”
उधर से भारी आवाज़ आई,
“हूँ… बोलो। सब ठीक?”
भट्ट साहब ने मुस्कुराते हुए कहा—
“सब ठीक है। अभी अपने बेटे के साथ सिंगापुर में खड़ा हूँ…
यहाँ पूर्व दिशा में ही सूरज उगता है,
पर आज मुझे लग रहा है कि मेरी दुनिया पश्चिम में भी रोशन हो सकती है।”
मिश्रा जी चुप रह गए।
भट्ट साहब ने आगे कहा—
“देखो मिश्रा…
संस्कार अगर सच्चे हों…
तो बच्चे कभी बूढ़े माँ-बाप को बोझ नहीं समझते…
चाहे दुनिया कितनी ही बदल जाए।”
बालकनी पर हवा चल रही थी।
नीचे
शहर की हलचल थी।
और एक बूढ़ा पिता…
अपने बेटे के प्यार में खुद को दुनिया का सबसे अमीर इंसान महसूस कर रहा था।
कहानी की सीख:
✔ अगर संस्कार सच्चे हों, तो दूरियाँ भी दिलों को अलग नहीं कर पातीं।
✔ बच्चों पर भरोसा करना कभी गलत नहीं—अच्छी परवरिश अपनी परीक्षा खुद पास कर लेती है।
✔ बुढ़ापे का सहारा संपत्ति नहीं, बच्चे का सम्मान और प्रेम होता है।
✔ दुनिया कहीं भी हो, माता-पिता के लिए हमेशा जगह होती
है।

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